शशिकांत गुप्ते
कुछ दिनों से सामाचारों की सुर्खियों में इत्र से खुशबू, बजाए शाब्दिक बदबू फैल रही है। इत्र की शाब्दिक बदबू इस संभावना पर आधरित थी, सम्भवतः इत्र का ब्रांड साइकल छाप होगा? अदने से लेकर सर्वोच्च पद पर विराजमान सियासतदान तक और कुछ आँखों से अंधे पर नाम नयनसुख समर्थकों ने साइकल को हर तरह से कोसना शुरू कर दिया।यहाँ तक की समाजवादी विचारों की आलोचना करने में कोई कमी नहीं रखी।
जांच अधिकारियों को अपनी गलती का तब एहसास हुआ जब पता चला कि इत्र तो फूलछाप विशाल कम्पनी हो सकता है। जैसे ही यह सम्भवना, यथार्थ में बदलने लगी,जांच की प्रक्रिया ने एकदम टर्न ले लिया,और घर की दरों दीवार से जिस धन का वमन हुआ वह धन, कालेधन के अभिशाप से बचकर टर्नओवर में बदल गया।
Turnover का मतलब वाणिज्य के निपुन समझा सकतें हैं।
एक व्यंग्यकार को टर्न मतलब,उलटना ही समझ में आता है, और over ओवर का मतलब अत्यधिक समझ में आता है। कोई भी मानव उसकी अपनी पाचनशक्ति से अधिक आहार खाता है,इसे बोलचाल की भाषा में Over eating कहतें हैं। ऐसा करने से हाजमा खराब होता है, और मानव वमन करता है।
बहरहाल मुद्दा तो इत्र के कारोबार का है।इत्र की बदबू सियासी दबाव में खुशबू में परिवर्तित हो गई, ऐसा आरोप विपक्षी लगा रहें हैं या लगा सकतें हैं?
विपक्षियों को ध्यान में रखना चाहिए कि सन 2016 के नवम्बर माह की 8 तारीख के बाद देश में कालेधन का नामोनिशान नहीं है।
यह दावा लेखक नहीं कर रहा है बाकायदा पचास दिन की समयावधि मांगते हुए, एक शारीरिक रूप से मजबूत प्रधान सेवक ने किया था।
उक्त मुद्दों पर वैचारिक बहस होंनी चाहिए।विचारविहीन राजनीति में वैचारिक बहस की गुंजाइश ही नहीं रहती है। इसीलिए राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है।
ऐसी स्थिति पर एक सुविचार का स्मरण होता है।
गिरते हैं ख्याल तो गिरता है आदमी
जिसने इन्हें संभाल लिया वो खुद संभल गया
वर्तमान में विचारविहीन की पराकाष्ठा दिखाई दे रही है।खुले आम हिंसक,विचार सार्वजनिक मंचो से प्रकट किए जा रहें हैं।
राजनीतिशास्र को शास्त्र ही रहने दो,राजनीति में फिरकापरस्ती की बदबू फैलाने से बाज आना चाहिए।
सर्वत्र कीचड़ फैलाने के बजाए इत्र की खुशबू ही सर्वत्र महकने दो। यही निवेदन है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





