सच में हर एक की जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं जिन्हें वो हमेशा के लिये कहीं संजों लेते हैं, उन यादों से पीछा छुड़ाना मुश्किल नही होता हम पीछा छुड़ाना ही नही चाहते हैं। हमारे यहां घरों में खानदानी हार और कंगन तक होते हैं। जिन्हें हम खानदानी धरोहर मानकर सुरक्षित रखते हैं समय समय पर पॉलिशिंग कराते हैं और पहनते भी हैं पर न तो उसे तुड़वाते हैं न कोई फेरबदल कराते हैं।
इसी तरह देश के पास भी उसके शहरों और गांवो में कुछ जगहें होती हैं यादगार जो ऐतिहासिक धरोहरों के नाम पर संरक्षित की जाती हैं। और उनसे छेड़छाड़ करने वाले भविष्य में आक्रांताओं के रुप में जाने जाते हैं ।
आज तक की हमारी सरकारों ने तो अंग्रेजों की बनाई ईमारतें हों या मुगलों की या फिर किसी भी तरह का कोई ऐतिहासिक स्थल संरक्षित ही किया था कोई बदलाव नही ।
आपको पता होगा कि गांधी परिवार ने वो गुलाबी खादी की साड़ी आज तक सुरक्षित रखी हुई है जो बापू ने अपने हाथों से बुनकर इंदिरा जी को शादी में भेंट की थी ,और उसी साड़ी को पहनकर इंदिरा जी की शादी हुई ,बाद में सोनिया ,मेनका और प्रियंका ने भी उसे ही अपनी शादी में पहना था ।
यूरोपियन देश अपना इतिहास, हो या संस्कृति सब सहेजे हुये हैं उन्होंने अपने पुराने ऐतिहासिक शहरों को बिल्कुल संरक्षित करके रखा हुआ है, और हमारे यहाँ अपना गौरवशाली इतिहास ही मिटाने पर तुले हैं भले ही विज्ञापनों पर प्रतिदिन करोड़ों रुपये फूंके जा सकते हैं पर शहीदों की याद में ज्योति जलाने को पैसा नही है।
यही कार्य अगर कांग्रेस सरकार के द्वारा किया जाता तो ये तथाकथित एवं स्वघोषित राष्ट्रवादी पार्टी के लोग पूरा भारत बंद करवा देते और सरकार को बस बदनाम कर रहे होते ।
अमर जवान ज्योति की स्थापना उन भारतीय सैनिकों की याद में की गई थी, जो 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए थे.. इस युद्ध में भारत की जीत हुई थी और बांग्लादेश का गठन हुआ था।
श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने 26 जनवरी 1972 को इसका उद्घाटन किया था ।
1971 के युद्ध में शहीद जवानों के अदम्य साहस व शौर्य की प्रतीक अमर जवान ज्योति की लौ जो 50 साल से जल रही थी। हमारा दुर्भाग्य होगा आज के बाद हम उसे नही देखेंगे।
हम मंदिर वहीं बनायेंगे पर शहीदों की याद में जल रही ज्योति से कोई वास्ता नही !
ईश्वर न करे कल को अमर जवान ज्योति की जगह के लिये भी कोई नया झगड़ा न शुरु हो जाये। या फिर इसी तरह और भी संरक्षित जगहों को न बदला जाये …
वो तो अच्छा हुआ कि जलियांवाला बाग में बस लीपापोती कर के उसे बख्श दिया नही तो उसे भी ट्रांसफर कर देते कहीं और बाग में पेड़ पौधे लगवा देते कि पर्यावरण के लिये ये भी जरुरी है तो भी सब खुश होते कि हमें साफ हवा मिलेगी ताजे फल मिलेंगे और क्या बाग का मतलब कोई समाधिस्थल तो होता नही है।
वहां तरह तरह के फव्वारे ही होने चाहिये ,गोलियों के निशान देखकर रोना ही आयेगा सबको !
वैसे काशी के मंदिरों को तहस नहस करके भी अच्छा ही किया होगा क्योंकि सबको सुविधाएं ही पसंद आ रहीं है , सब यही कह रहे हैं कि अब सब सुविधा जनक हो गया है।
आज तो मुझे बस यही लग रहा है कि कांग्रेस को आज ये घोषणा करनी चाहिए कि अमर जवान ज्योति पर आने वाले खर्च को वहन करने में यदि मोदी सरकार खुद को अक्षम महसूस कर रही है तो कांग्रेस पार्टी अमर जवान ज्योति पर आने वाले खर्च को वहन करेगी ।
इतिहास ही मिटाने पर तुले हैं….बाते भूल जाती हैं यादें याद आतीं हैं





