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सुभाषचंद्र बोस और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन

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अशोक कुमार

भारत का स्वतंत्रता का संघर्ष कोई दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की मुक्ति का संघर्ष नहीं था । मूल रूप से भारत की आज़ादी का वह संघर्ष उभरते राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद से अपनी मुक्ति का संघर्ष था, क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्यवाद राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग के विकास की राह में बाधा बन रहा था । इस दौरान भारत का दलित-शोषित मेहनतकशवर्ग सामंती और साम्राज्यवादी शक्तियों के धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक शोषण, दमन और उत्पीडन के जुए तले कराह रहा था । इसीलिए यह सोचकर कि कथित आज़ादी के बाद वह भी सामंती, पूंजीवादी और साम्राज्यवादी उत्पीड़न से मुक्त होगा, दलित-शोषित श्रमिक वर्ग ने पूरे तन, मन और धन से पूंजीपतिवर्ग द्वारा चलाये जा रहे उस साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । लेकिन कथित आज़ादी के राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त हो गया लेकिन दलित-शोषित पीड़ितवर्ग शोषण और दमन की प्रक्रिया से मुक्त नहीं हुआ । वह आज उसी पूंजीपतिवर्ग के शोषण और दमन का शिकार हो चुका है जिसकी मुक्ति के संघर्षों में उसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ त्यागपूर्ण और सक्रिय रूप से हिस्सा लेकर उसे मुक्त कराया था । अतः यह साबित हुआ कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता का आंदोलन कोई भारतीय पीड़ित जनता की मुक्ति का आंदोलन ही नहीं था बल्कि मुख्य रूप से वह आंदोलन राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग की मुक्ति का ही संघर्ष था । उस कथित राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में दलित-शोषित मेहनतकश वर्ग की मुक्ति का प्रश्न दोयम ही रहा था ।

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सुभाषचंद्र बोस, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अपनी मुक्ति के लिए पूंजीपतिवर्ग द्वारा चलाए जा रहे उसी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे । गांधीजी और सुभाष में जो मतभेद थे वे कोई मौलिक और सैद्धांतिक मतभेद नहीं थे । मूलतः उनके मतभेद कथित स्वतंत्रता आंदोलन के रणनीतिक तौर-तरीक़ों को लेकर थे । गांधीजी अहिंसक तरीक़ों के द्वारा इस आंदोलन को चलाए जाने के पक्षधर थे तो सुभाष बाबू साम्राज्यवादी शक्तियों के ख़िलाफ़ ज़रूरी होने पर बलप्रयोग का निषेध नहीं करते थे । इसीलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए जर्मनी के तानाशाह हिटलर और उसके मित्र जापान तक से समर्थन मांगने के लिए क्रमशः जर्मनी और जापान गये ! आज़ाद हिंद फौज़ का गठन किया और उसका नेतृत्व भी किया । लेकिन कथित आज़ादी से पूर्व या आज़ादी के बाद, सुभाष बाबू या उनकी आज़ाद हिंद फ़ौज का मूल उद्देश्य और लक्ष्य दलित-शोषित श्रमिकवर्ग को सामंती उत्पीड़न और पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण और दमन से मुक्त कराके दलित-शोषित श्रमिकवर्ग के नेतृत्व में, समाजवादी राज्य की स्थापना करना नहीं था । नेहरू, गांधी, पटेल, तिलक व अन्य राष्ट्रीय नेताओं की ही तरह सुभाष बाबू और उनकी आज़ाद हिंद फौज और उनके संघर्षों के मुख्य लक्ष्य उभरते राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बंधनों से आज़ाद कराने तक ही सीमित रहा !

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उनके इस संघर्ष में दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की मुक्ति के प्रश्नों का कहीं कोई ज़िक्र तक नहीं रहा है । इसीलिए आम पीड़ित जनता की उसके दुःखों और गरीबी से मुक्ति के तमाम प्रश्न उनके लिए दोयम ही रहे । इसीलिए उन्हें महान और प्रगतिशील स्वतंत्रता सेनानी तो कहा जा सकता है, लेकिन किसी भी अर्थ में क्रांतिकारी या वैज्ञानिक समाजवादी कहा जाना युक्तिसंगत या तर्कपूर्ण कतई नहीं लगता । साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ उस स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक धारा और भी थी जो निश्चित ही, न केवल दलित-शोषित श्रमिकवर्ग की वास्तविक मुक्ति के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने के लिए संघर्षरत थी, बल्कि सामंती और पूंजीवादी शोषण और दमन के ख़िलाफ़ और समाजवादी समाज की स्थापना के लिए भी संघर्ष कर रही थी और उसका अंतिम लक्ष्य भी दलित-शोषित श्रमिकवर्ग के नेतृत्व में समाजवादी राज्य की स्थापना करना ही घोषित था । इसकी स्पष्ट घोषणा उन्होंने अपने लेखन और साहित्य में की थी । इस क्रांतिकारी धारा के मुख्य नायक शहीद-ए-आजम भगतसिंह और उनके विचारधारा के अन्य साथी यथा चन्द्र शेखर आजाद, सुखदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान,राजगुरु, यशपाल, शिव वर्मा आदि जैसे लोग थे । सुभाष बाबू के लेखन या भाषणों में इस तरह की कोई घोषणा का उल्लेख नहीं मिलता । इसीलिए उन्हें क्रांतिकारी या समाजवादी घोषित करने का कोई उचित कारण नहीं मिलता । भगतसिंह के नेतृत्व में या उन जैसी संघर्ष की अन्य धाराओं में शामिल व्यक्तियों और संगठनों को निश्चित ही समाजवादी और क्रांतिकारी कहा जा सकता है । लेकिन सुभाष बाबू इस क्रांतिकारी धारा में कभी शामिल नहीं रहे और न ही इस धारा को उन्होंने कभी स्वीकृति ही प्रदान की । इसीलिए कम्युनिस्टों द्वारा उन्हें एक अग्रणी और प्रगतिशील स्वतंत्रता सेनानी के तौर स्वीकृत करना उचित मालूम पड़ता है । इसमें सुभाष बाबू के प्रति न तो असम्मान का ही कोई भाव ही प्रदर्शित होता है और न ही इससे कम्युनिस्टों की ही किसी तरह से छवि धूमिल होने या अन्य किसी भी तरह के राजनीतिक नुकसान होने का खतरा पैदा होता दिखाई पड़ता है । सत्य आखिर सत्य ही होता है । झूठ के पैर नहीं होते । इसीलिए झूठ ज़्यादा दूर तक नहीं चल सकता । इसीलिए झूठ दो-चार क़दम चलने के बाद ही दम तोड़ने लगता है ।
सुभाषचंद्र बोस क्रांतिकारी थे या नहीं, यह सवाल गौण नहीं है, बल्कि आज सुभाष बाबू और अन्य महापुरुषों के व्यक्तित्व और कृतित्व का सही-सही आकलन करने का विषय ज़रूर है ताकि आगामी संघर्षों के दौरान शोषकवर्ग द्वारा फैलाई जा रही तरह-तरह की भ्रांतियों और उनसे संबंधित अनावश्यक विवादों से बचा जा सके । जनता की नज़र में वे क्या हैं, यह प्रश्न भी गौण नहीं है, क्योंकि वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी हैं या समाजवादी, यह छवि भी शासकवर्ग द्वारा अपने आर्थिक और राजनैतिक लाभ-हानि की दृष्टि से गढ़ी जाती रही है और फिर उस छवि को जनता के बीच प्रचार माध्यमों के द्वारा प्रचारित किया जाता रहा है और फिर धीरे-धीरे वर्गचेतना के अभाव में महानायकों की वही छवि जनता के बीच में स्थापित हो जाती है । इस पूरी प्रक्रिया में शासकवर्ग के विचार ही प्रचलन में होते हैं, आम जनता की अपनी निजी राय का कोई बहुत ज़्यादा महत्व नहीं होता । इसीलिए प्रगतिशील और क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों द्वारा समय-समय पर इन महानायकों का नई राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनज़र तार्किक, यथार्थपरक और आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाना ज़रूरी होता है ताकि इन महानायकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पड़ी धूल को साफ़ किया जा सके और उनकी सही तस्वीर जनता के सामने पेश की जा सके वरना शासकवर्ग इन महानायकों की झूठी-सच्ची छवि गढ़कर राजनीतिक फ़ायदा उठाकर सत्ता पर काबिज़ हो जाने में कामयाब हो जाता है और क्रांतिकारी व प्रगतिशील बुद्धिजीवी हाथ मलते रह जाते हैं ।
अभी हाल ही में शासकवर्ग द्वारा सरदार पटेल की छवि को महिमामंडित किया गया और नेहरूजी को एक खलनायक के तौर पर प्रचारित किया गया और पटेल और नेहरूजी के बीच मतभेदों के झूठे-क़िस्से गढ़कर खूब राजनीतिक फ़ायदा उठाया गया । रही फासिस्ट शक्तियों के दुष्प्रचार का प्रश्न, तो कथित आज़ादी से पहले और बाद में भी फासिस्ट शक्तियों ने हर सम्भव झूठ, छल-कपट और फ़रेब का निरंतर ही सहारा लेकर कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने में कभी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है । लेकिन झूठ ज़्यादा लम्बे समय तक कारगर साबित नहीं होता । फासिस्ट शक्तियों द्वारा झूठ का सहारा लेकर कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करने से अनेकों दुश्वारियां पैदा हो सकती हैं, लेकिन उनका मुक़ाबला करने के लिए कम्युनिस्ट झूठ का सहारा नहीं ले सकते । सत्य को जैसा है, उसे वैसा ही जनता के बीच में रखना उचित होगा और प्रत्येक तथ्य और सत्य को अपने आंदोलन में रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल करने में भी कोई असंगति मालूम नहीं पड़ती । सुभाष बाबू को समाजवादी या क्रांतिकारी बताकर कोई बहुत ज़्यादा लाभ होने वाला नहीं और यह उचित भी नहीं होगा । अपनी शोषणकारी नीतियों के चलते पूंजीवाद स्वयं ऐसी परिस्थितियां पैदा करता है जो ख़ुद उसकी मौत का कारण बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम करती है । पीड़ितवर्ग द्वारा चलाए जा रहे संघर्षों में इस परिस्थितियों का रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया ज़रूर जा सकता है । सुभाष बाबू अन्य नेताओं की तुलना में एक महान और प्रगतिशील स्वतंत्रता सेनानी जरूर थे, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है, इसी तथ्य को लेकर आगे बढ़ा जाना चाहिए । उन्हें महान स्वतंत्रता सेनानी कहना उन जैसे राष्ट्रीय नेता का अपमान नहीं हो सकता है । उनकी जयंती पर उनको शत-शत नमन ।

           सुप्रसिद्ध लेखक अशोक कुमार,संपर्क - 99719 86428

संकलन व संपादन – निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड,अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक,पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ‘, गाजियाबाद, उप्र

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