सुसंस्कृति परिहार
अब ये बात तो पूरी तरह उजागर हो चुकी है देश में कथित तौर पर लोकतांत्रिक दरवाज़े से प्रविष्ट ना केवल केन्द्र सरकार बल्कि भाजपानीत तमाम राज्य सरकारों का ना तो जनता की सेवा लक्ष्य रहा है ना ही तिरंगा उन्हें भा रहा है ,ना संविधान की गरिमामय शब्दावली। मसलन पंथ निरपेक्ष और समाज वादी शब्द से वे ऐसी घृणा करते हैं जैसे ये शब्द कोई गंदी गाली हो।अब तो महान सम्राट अशोक पर भी सरकार से सम्मानित व्यक्ति द्वारा तरह तरह के लांछन लगाने वाले पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती।भारत को असली आज़ादी 2014 में मिली यह कहने वाली भी आज तक सुरक्षित है। खुले आम हरिद्वार में हिंदू धर्म संसद मुसलमानों पर शस्त्र उठाने का आव्हान करती है।देश के लिए अपना जीवन अर्पण करने वाले राष्ट्र पिता को अपमानित किया गया।ये विचार अपने आप नहीं आए इनके पीछे वही लोग हैं जो अंग्रेजों के चाटुकार रहे तथा स्वतंत्रता संग्राम में सेनानियों से गद्दारी करते रहे। आखिरकार सरकार अपनी मंशा ज़ाहिर क्यों नहीं करती कि भारत में वह मनुवाद की वापसी चाहती है तथा भारत को हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य लेकर 2022का लोकसभा चुनाव जीतना चाहती है। उसके बाद तो चुनाव शब्द ही समाप्त हो जाने वाला है। नागपुर में छुपे बैठे लोगों का मुख्यालय तब संसद भवन होगा।

दरअसल बात ये है कि जिन्होंने टुकड़े टुकड़े गैंग शब्द का इस्तेमाल जे एन यू में किया वास्तविकता ये है कि टुकड़े टुकड़े गैंग तो आर एस एस के सैंकड़ों अनुषंगी संगठन है।जो भाजपा नाम से सत्तारुढ़ हैं तो कहीं हिंदु महासभा के नाम से गांधी जी की हत्या करती है, कहीं बजरंग दल नाम से मुस्लिमों के साथ माब लिंचिंग करती है कहीं विश्व हिन्दू परिषद के नाम से मस्जिदों और चर्च पर हमले करती है। विद्यार्थी परिषद के नाम से महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में कहर बरपाती है। हिंदू धर्म संसद ने भी इस बार वही जहरीले तेवर दिखाए हैं।हिंदू युवा जागरण मंच तो उत्तर प्रदेश में सीधे ही सी एम् की निगरानी में काम करता है।इसकेअलावा इनकी एक बी टीम भी राजनीति में प्रविष्ट हो चुकी है जो भाजपा की गिरती साख की ओट में भाजपा के खिलाफ हुई जनता को अपने साथ घसीट ले जाती है।इसका उदाहरण दिल्ली राज्य सरकार है जो दिल्ली दंगा के वक्त मौन साध लेती है। पीड़ितों की मदद भी नहीं करती। अब तो महिलाओं को भी रण कौशल का प्रशिक्षण देकर उन्हें कत्लेआम के लिए तैयार किया जा रहा है।आप समझ सकते हैं इन सबकी आज ज़रूरत ही क्या है।उधर चीन हमारी सीमा में घुसा हुआ है और घर के अंदर युद्ध की तैयारी।ये सब हमारे संविधान के खिलाफ है ।
इतना ही नहीं देश में जो बराबरी का अधिकार है उसको दरकिनार कर सिर्फ दो कारपोरेट के लंबरदारों के लिए देश की तमाम मिल्कियत सौंपी जा रही है। निजीकरण का ऐसा ताना बाना बुना गया है कि आम आदमी को रोज़गार के सारे दरवाजे धीरे-धीरे बंद किए जा रहे हैं। साहूकारों और महाजनों के चंगुल से बड़ी मुश्किल से देश का 80%गरीब निकला था कि बैंकों की निजीकरण की नीति ने उन्हें फिर वहीं ढकेल दिया है। ब्याज दर का घटना,कम राशि होने पर उसकी जप्ती,ज़रुरत होने पर अपने पैसे के लिए कई कई दिन भटकना और बैंकों का डूबना । बहुत भयावह समय है।तिस पर सबका साथ सबका विकास जैसे नारे की गूंज तकलीफ और बढ़ाती है।
सबको शिक्षा और स्वास्थ्य का सपना भी धराशाई होने की कगार पर है बड़ी संख्या में स्कूल कम किए जा रहे स्कूलों का निजीकरण जारी है आपके बच्चों का भविष्य अंधकारमय है। जहां तक स्वास्थ्य का सवाल है उसका हाल कोरोना काल में हम भली-भांति देख चुके हैं।माना कि अस्पताल कम पड़ गई किंतु आक्सीजन ,दवाओं और इंजेक्शन किस कदर उद्यमियों ने मंहगे किए और दलालों ने जो लूट की उसका सीधा सम्बन्ध सरकार से रहा।उन पर आज कार्यवाही का नाम होना इस बात को पुष्ट करता है।निजी स्वास्थ्य केन्द्र तो पहले तीन और पांच लाख जमा करा रहे थे। सरकार की मिलीभगत और निकम्मेपन की वजह से लाखों लोग मौत के मुंह में समा गये।इन भावनाओं वाली सरकार को क्या आप लोकधर्मी या प्रजाहितैषी मानेंगे।जो जन विरोधी है और गणतंत्र विरोधी है तथा सामाजिक मर्यादाओं को क्षत विक्षत कर देश में अनैतिकता ,धर्मांधता और हिंसा को बढ़ावा दे रही है खुल्लमखुल्ला मंत्री के उकसाने पर उसका पुत्र निहत्थे किसानों पर इसी उन्माद में गाड़ी से कुचल देता है और मंत्री का कोई बाल बांका नहीं हुआ।कहते हैं जो इस तरह का कार्य करते हैं उन्हें अपनी जान का खतरा हजारों एस पी जी जवानों के बीच में महसूस होता है।
अब देश की ऐसी हालत लाने का सरकार का पर्याय क्या है इस बात को समझने की आवश्यकता है।वह नहीं चाहती देश में धर्म निरपेक्षता रहे।वह हिंदुत्ववादी कट्टरता का इसीलिए आतंक फैला रही है। समाजवाद की भावना से हटकर वह एक बार देश में जातिवादीय संरचना को पुख्ता करना चाहती है जिसका सीधा मतलब यह है कि दो ऊंची कौमों के अलावा बहुजन समाज पुरानी परिपाटी के अनुसार गुलाम बना रहे तमाम सुखोपभोग दो जातियों को ही मिले ।महाजनी सभ्यता का विस्तार हो। महिलाएं घर की शोभा हों वे घर के अंदर की जिम्मेदारी संभाले।शिक्षा भी चंद लोगों के लिए हो।यानि जिसके हाथ में लाठी हो उसकी ही भैंस हो।वे चाहते हैं हम उस भारत में फिर पहुंच जाएं जिस पर सात सौ साल मुसलमानों ने और दो सौ साल अंग्रेजों ने राज किया। क्योंकि उस दौर में यही स्थिति रही।अब ये सोचना भारत के जन जन का दायित्व है कि वे सदियों पीछे उस भारत में जाना चाहते हैं जो रजवाड़ों और सामंतों के अधीन था। जिसमें बहुजन समाज जी हुजूरी और गुलामी की जंजीरों से जकड़ा था। लेकिन तब कौमी एकता और सद्भाव कायम था।आज वह भी कुचला जा रहा है।यदि हमने इन ताकतों को नहीं नकारा तो कल्पना करने से सिहरन होने लगती है कि हमारा देश टुकड़े टुकड़े गैंग के कारण हमें कहा ले जायेगा। आज 72वें गणतंत्र दिवस के मौके पर सिर्फ जश्न मनाने से काम बनने वाला नहीं है हम सबको इसका सूक्ष्म परीक्षण करना है कि सत्ता में बैठी सरकार क्या हमारे गणतंत्र की हितैषी है जो लगातार गैर संवैधानिक कार्ययोजना लाने की ना केवल कोशिश कर रही है बल्कि ऐसे लोगों को बराबर प्रशय दे रही है जो संविधान विरोधी है।ये लोग राष्ट्र पिता बापू की सतत छवि धूमिल करने के साथ साथ कांग्रेस के साथ रहे महामनाओं को भी जनता की नज़रों से गिराने और आज़ादी के संग्राम में ऐसे बुजदिलों के नाम जोड़ने में लगे हैं जो दुम दबाकर अंग्रेजों के चाटुकार बनकर देश के सेनानियों के साथ गद्दारी करते रहे।ये मनुसंहिता के उपासक हैं इसलिए गैर हिंदु ,दलित, आदिवासी, पिछड़ेवर्ग और महिलाओं की तरक्की नहीं चाहते हैं। उम्मीद है ,कि जन जन इस पुनीत अवसर पर गणतंत्र दिवस के दिन लागू संविधान बचाने की शपथ लेगा और देश को गहन कारा में जाने से बचाएगा ताकि बेदम होते गणतंत्र को अमरता मिले।जनता की सक्रिय सहभागिता ही इस संकट से देश को उबार सकती है।






