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आधारभूत चिंतन…प्रेमिका, पत्नी, दासी, वेश्या : किस रूप में हो नर का नारी से सम्बंध

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डॉ. नीलम ज्योति

_एक पुरूष और एक स्‍त्री के बीच किस प्रकार के प्रेम संबंध की संभावना है, जो सेडोमेसोकिज्‍म (पर-आत्‍मपीड़क) ढांचे में न उलझा हो? यह एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है।

कथित धर्मों ने स्‍त्री और पुरूष के बीच कोई भी सुंदर संबंध हो—इसे नष्‍ट कर दिया है।
इसका कारण यह था :
यदि व्‍यक्‍ति का प्रेम जीवन परिपूर्ण है तो पूजा स्‍थलों पर बहुत से लोगों को प्रार्थना करते हुए नहीं पाओगे, वे प्रेम क्रीड़ा कर रहे होंगे।
लोगों को प्रेम जीवन पूर्णतया संतुष्‍ट और सुंदर हो वे इसकी चिंता नहीं करेंगे कि परमात्‍मा है या नहीं। धर्म ग्रंथ में पढ़ाई जाने वाली शिक्षा सत्‍य है या नहीं।
वे स्‍वयं से पूरी तरह संतुष्‍ट होंगे। धर्मों ने प्रेम को थोपित विवाह बना कर नष्‍ट कर दिया है।
प्रेम रहित, थोपित विवाह अंत है, प्रारंभ नहीं। प्रेम समाप्‍त हुआ। अब जो प्रेमी हो सकता था, एक पति है, जो प्रेमिका होती वो पत्‍नी है। अब एक- दूसरे का दमन ही कर सकते हो। यह एक राजनीति हुई, प्रीति नही।
ऐसा समझौतावादी विवाह मनुष्‍य की प्रकृति के विरूद्ध है, इसलिए देर-अबेर स्‍त्री- पुरुष एक- दूसरे से ऊब जाते हैं। यह स्‍वाभाविक है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। ऐसा विवाह पूरे विश्‍व को अनैतिक बनता है।
स्‍त्री के साथ सोता हुआ पुरूष, पुरुष के पास सोती स्त्री जो एक- दूसरे से समग्र प्रेम नहीं करते, फिर भी सेक्स करते हैं : सिर्फ इसलिए कि वे विवाहित हैं—यह कुरूपता है। वीभत्‍सता है। यह वास्‍तविक/ लाइसेंसी वेश्‍यावृत्ति है।
एक पुरूष बाज़ार की वेश्‍या के पास जाता है, कम से काम यह मामला सीधा तो है। यह एक निश्‍चित वस्‍तु खरीद रहा है। वह स्‍त्री को नहीं खरीदता, वह एक वस्‍तु खरीद रहा है। लेकिन-
उसने ऐसे विवाह में तो पूरी स्‍त्री ही खरीद ली है। अपने पूरे जीवन के लिए गुलाम। कैसा भी दमन, शोषण करे। कीमत/पारिश्रमिक भी कोई नहीं।

ऐसे सभी पति और ऐसी सभी पत्नियाँ बिना अपवाद के पिंजरों में कैद हैं। इससे मुक्‍त होने के लिए छटपटाहट है। यहां तक कि उन देशों में भी जहां, जहां वे अपने भागीदार बदल सकते हैं।
विवाह में ऐसा स्‍थायित्‍व अप्राकृतिक है। ऐसे एक बलात संबंध में रहना अप्राकृतिक है। साथ रहने का मौलिक तौर पर एकमात्र कारण होना चाहिए– प्रेम, कानून नहीं! समझौता नहीं। प्रेम एकमात्र कानून होना चाहिए। तब जो सन्तान होगी, वो दिव्य होगी। उसमे जान बसेगी दोनो की। तलाक की सम्भावना तक खत्म।
यदि दोनों व्‍यक्‍ति ध्‍यानी है, तो वास्तविक प्रेम सहज संभव है।दोनो वास्तविक प्रेमी हैं तो ध्यान सहज सम्भव है। यही सत्य की देशना है : एक पुरूष और एक स्‍त्री के संबंध में।
प्रेम या ध्यान यह एक प्रगाढ़ ऊर्जा है। यह जीवन है : यदि प्रेम क्रीड़ा करते समय, दोनों एक मौन अंतराल में प्रवेश कर सके, अद्वैत बन सकें।
इस भांति का प्रेम संपूर्ण जीवन चल सकता है। क्‍योंकि यह कोई जैविक आकर्षण नहीं है जो देर-अबेर समाप्‍त हो जाए। अब आपके सामने एक नया आयाम खुल रहा है।
वास्तविक प्रेम में आपकी स्‍त्री आपका मंदिर, आपका पुरूष आपका मंदिर। दोनो का प्रेमरस एक- दूसरे के लिए अमृत। दोनो सुयोग्य– अर्धनारीश्वर।
अब प्रेम ध्‍यान हुआ। यह ध्‍यान विकसित होता जाएगा। जैसे – जैसे यह विकास को पाता जायेगा आप और-और आनंदित होने लगोगे। और अधिक संतुष्‍ट और अधिक सशक्‍त। आनंद का परित्‍याग कौन कर सकता है। कौन माँगेगा तलाक जब इतना आनंद हो?
प्रेम में से विवाह निकले तो नैसर्गिक है। विवाह में प्रेम निकल ही नही सकता। प्रेम जीवन की अप्रयासित गति है।
यहां तो विश्‍व भर में लोग सीख रहे कि प्रेम ही एक स्‍थान है जहां से छलांग ली जा सकती है। यह अप्राकृतिक है, जड़ता है, पशुविकता है, यांत्रिकता है।
इसके आगे और भी बहुत कुछ है, जो तभी संभव है तब दो व्‍यक्‍ति अंतरंगता में एक लंबे समय तक रह सकते हैं, सहजतः ता-उम्र।
ऐसे वास्तविक प्रेम में एक नये व्‍यक्‍ति के साथ नित्य आप पुन: प्रारंभ से शुरू करते हो। आप एक- दूसरे के लिए बिल्कुल नये सावित होते हो। नित्य नवीनता, रोज नया- जायकेदार स्वाद; क्‍योंकि अब यह व्‍यक्‍ति का जैविक अथवा शारीरिक तल न रहा, बल्‍कि आप एक अध्‍यात्‍मिक मिलन में हो।
जो स्त्री सेक्रेफाइज- कम्प्रोमाइज करने की परम्परा निर्वाह को अपना धर्म समझती है, या जो स्त्री शौकवश किसी/किन्ही के भोग की वस्तु बनती है : उससे हमें कुछ नहीं कहना. लेकिन जो स्त्री निहायत मज़बूरी में ऐसा कुछ करने को विवश है, वह चेतना मिशन के व्हाट्सप्प 9997741245 पर संपर्क कर सकती है. उसकी विवसता हम दूर करेंगे, बिना उससे कुछ भी स्वीकारे.
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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