~डॉ. प्रिया (पुडुचेरी)
निदेशिका : चेतना विकास मिशन
इस संसार में कौन किसकी आत्मा का खण्ड है ?–यह कोई नहीं जानता, न कोई बतला सकता है। धार्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक धरातल पर स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध पति-पत्नी के रूप में या प्रेमी-प्रेमिका के रूप में जुड़ता अवश्य है, मगर दोनों में एक ही आत्मा के खण्ड नहीं होते।
कोई किसी की आत्मा का और कोई किसी की आत्मा का खण्ड होता है। यही योग में ‘आत्म-वैषम्य’ कहलाता है। स्त्री-पुरुष के बीच, पति-पत्नी के बीच या प्रेमी-प्रेमिका के बीच जो मतभेद है, जो विचार-भेद है–उन सबका एकमात्र कारण यही ‘आत्म-वैषम्य’ है।
वे दोनों एक दूसरे को केवल जानते हैं, समझते नहीं। जानने और समझने में काफी अन्तर है। स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध के तीन तल हैं–शरीर का तल, मन का तल और आत्मा का तल। शरीर के तल पर गहन वासना का गहन आकर्षण है। अक्सर लोग शारीरिक आकर्षण की सीमा के आगे नहीं बढ़ पाते।
लाखों में कोई ऐसा होता है जो शरीर के वासनाजन्य आकर्षण की सीमा पार कर मानसिक तल पर पहुँच पाता है। आत्मिक तल पर पहुँचना दुस्साध्य है। उच्च अवस्था प्राप्त योगी या साधक गण ही आत्मिक तल पर पहुँच पाते हैं।
सच्चे अर्थों में प्रेम का आविर्भाव आत्मिक तल पर ही होता है। उसकी सुगन्ध से आत्मा विभोर हो उठती है। इसी अवस्था को ‘आत्मानंद’ की संज्ञा दी गयी है।
जितने प्रकार के योग हैं, उनमें एक ‘प्रेमयोग’ भी है। प्रेमयोग का एकमात्र लक्ष्य है–आत्म तल पर पहुँच कर अपने निज आत्म-खण्ड के मिलन से उत्पन्न सच्चे आनन्द का अनुभव पाना। शारीरिक मिलन के सुख में तो वासना और स्वार्थ की दुर्गन्ध रहती है।
मानसिक मिलन से वह दुर्गन्ध की मात्रा कम अवश्य होती है मगर कामना की प्रबलता अधिक रहती है, जबकि आत्म-मिलन में विशुद्ध और शाश्वत प्रेम का दिव्य भाव रहता है जिसके गर्भ से वास्तविक श्रद्धा का जन्म होता है। प्रेम और श्रद्धा एक दूसरे के पूरक हैं और हैं एक दूसरे के पर्याय।
इस संसार में कोई किसी को नहीं जानता है और न तो समझता ही है। प्रत्येक पुरुष और प्रत्येक स्त्री अपने आप में एकाकी, अकेला और शून्य से भरा हुआ है।
पत्नी जिसे अपना पति समझती है, वह न जाने कितनी स्त्रियों का पति रह चूका होता है। इसी प्रकार पति जिसे पत्नी समझता है, वह भी न जाने कितने पुरुषों की पत्नी रह चुकी होती है।
🍃चेतना विकास मिशन
पति -पत्नी/प्रेमी-प्रेमिका के बीच मतभेद : एकमात्र कारण- आत्म- वैषम्य





