यूपी विधानसभा चुनाव में भले ही जाटों के चलते पहले फेज की ज्यादा चर्चा रही हो, लेकिन बीजेपी के लिए सेकेंड फेज का चुनाव बेहद चुनौती भरा है। सेकेंड फेज में 9 जिलों की 55 सीटों पर सोमवार 14 फरवरी को चुनाव होना है। दुनिया में सुन्नी मुसलमानों के दो बड़े मसलकों के गढ़ वाले इस इलाके में बीजेपी ने 2017 में 55 में से 38 सीटें जीती थीं।
वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां सपा-बसपा का महागठबंधन कामयाब रहा। 2017 में बीजेपी को ध्रुवीकरण का जबरदस्त फायदा मिला था, लेकिन ठीक इससे पांच साल पहले यानी 2012 में बीजेपी के हाथ सिर्फ 8 सीटें लगी थीं।
ऐसे में आइए जानते हैं कि इस बार अगर ध्रुवीकरण नहीं हुआ तो बीजेपी के लिए यह फेज कितनी बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। वहीं सपा-रालोद कैसे चौंकाने वाले नतीजे दे सकता है…
बरेलवी और देवबंद का काफी प्रभाव
- यूपी के दूसरे फेज में सहारनपुर, रामपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, बरेली, बदायूं और शाहजहांपुर की 55 विधानसभा सीटों पर चुनाव होना है। इन सभी क्षेत्रों में बरेलवी (बरेली) और देवबंद (सहारनपुर) से जुड़े मुस्लिम धर्मगुरुओं का काफी ज्यादा प्रभाव है।
- इन जिलों की सीटों पर मुस्लिम वोटर्स की संख्या काफी है। खासकर 7 जिलों में। इनमें रामपुर में 50.57%, मुरादाबाद में 50.80%, अमरोहा में 40.78%, बिजनौर में 43.04%, बरेली में 34.54%, संभल में 32.88% और बदायूं में 23.26% मुस्लिम वोटर्स हैं।
- यहां पर मुस्लिमों के साथ जाट वोटर्स की भी अच्छी मौजूदगी है, इसलिए पहले फेज के मुकाबले दूसरा फेज बीजेपी के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
ध्रुवीकरण और मोदी लहर के चलते बीजेपी ने क्षेत्र में बनाई थी बढ़त
- बीजेपी ने 2017 के चुनाव में इन 55 विधानसभा सीटों में से 38 पर जीत दर्ज की थी। बीजेपी को 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के चलते यहां हुए ध्रुवीकरण और मोदी लहर का भी फायदा मिला था।
- इस इलाके में अब स्थिति एकदम अलग है। फसल की खरीद न होने और गन्ना बकाया भुगतान में देरी से किसान बीजेपी से खफा हैं।
- सेकेंड फेज के इस संकट को भांपते हुए ही बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अपने सभी स्टार प्रचारकों को इन इलाकों में उतार दिया है।
वोटों का बिखराव बीजेपी के लिए हो सकता है फायदेमंद
- 2019 का लोकसभा चुनाव सपा, बसपा और रालोद ने मिलकर लड़ा था। इसके चलते इन क्षेत्रों के तहत आने वाली 11 लोकसभा सीटों में से बसपा ने 4 अमरोहा, नगीना, बिजनौर और सहारनपुर पर और सपा ने 3 रामपुर, मुरादाबाद और संभल पर जीत दर्ज की थी। इन सात सीटों के तहत 35 विधानसभा सीट हैं।
- 2017 का विधानसभा चुनाव सपा और कांग्रेस ने मिलकर लड़ा था। उस दौरान सपा ने इन 55 सीटों में से 15 पर ही जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस ने 2 सीटें जीती थीं। वहीं, बसपा और रालोद एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।
- इस बार विधानसभा का चुनाव सपा और रालोद मिलकर लड़ रहे हैं, जबकि बसपा इस गठबंधन से बाहर है। यहां पर दलित वोटर्स की भी काफी अच्छी संख्या है। ऐसे में माना जा रहा है कि बसपा और कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोटों का बिखराव हो सकता है।
- AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी इन इलाकों में अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। सहारनपुर हो या संभल हर जगह ओवैसी खुद को मुस्लिमों के सबसे बड़े रहनुमा के तौर पर पेश कर रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि ओवैसी के आने से भी मुस्लिम मतों में और ज्यादा बिखराव होगा।
- बीजेपी को 2017 में भी मुस्लिम वोटों के बिखराव से फायदा हुआ था। ऐसे में माना जा रहा है इस चुनाव में भी सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों के अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरने और ओवैसी के आने से मतों का बिखराव होगा और बीजेपी को फायदा मिल सकता है।

सपा-रालोद और महान दल के साथ आने का समीकरण जानिए
- सपा ने पश्चिमी यूपी में रालोद के साथ-साथ महान दल के साथ भी गठबंधन किया है। माना जा रहा है कि इससे मुस्लिम और जाट के साथ ही सपा को कुशवाहा, मौर्य, कोइरी बिरादरी का भी साथ मिल सकता है।
- इसके चलते इस क्षेत्र में सपा और रालोद का गठबंधन मजबूत होता दिख रहा है। 2017 में सपा के 17 विधायक इस क्षेत्र से थे। इनमें से 11 मुस्लिम थे। ऐसे में अगर ये जातियां सपा के साथ जुड़ती हैं तो सपा की सीटों में इजाफा होना तय हैं।
- वहीं, सपा 2017 के विधानसभा चुनाव में 27 सीटों पर रनरअप थी। सपा को रालोद और महान दल का साथ मिलने से इन सीटों पर भी जीत दर्ज करने में मदद मिल सकती है।





