सुसंस्कृति परिहार
हमारे देश की धरती प्रेमियों की भूमि है। मनमोहन कृष्ण की
तो बृज की पूरी नारियां ही उनकी दीवानी थीं।जब कृष्ण बृंदावन छोड़ कर चले जाते हैं तब उनका प्रेम देखते ही बनता है ऊधौ उन्हें समझाते हैं तो वे उन्हें टका सा जवाब देकर प्रेम की महिमा का बखान करती हुई कहती हैं
ज्ञान तिहारो आधो अधूरो मानो या मत मानो ,
प्रेम में का आनंद रे ऊधौ ,प्रेम करो तो जानो।
सचमुच प्रेम यानि इश्क और कहा गया है–
ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजै
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
कुछ लोग यह भी फरमाते हैं ये वो आग है जो लगाए ना लगे और बुझाए ना बुझे।बृज की गोपियां तो ये भी कह देती है ज्ञान तिहारो आधौ अधूरो ——-प्रेम करो तो जानो ।
हमारा देश प्रेम के मामले में दुनिया में बहुत आगे है जहां मंदिरों में कृष्ण अपनी प्रेमिका के साथ पूजे जाते हैं। जहां खजुराहो के मंदिरों में कामक्रीड़ा की मूर्तियां लगाई गई हैं। वात्स्यायन कामसूत्र लिखते हैं। भक्तिकाल में मीरा अपने प्रेम को साथ लिए राजघराना छोड़ देती हैं।भजन गाती हुई संत साधुओं की टोली में शामिल हो जाती है। हेरी मैं तो प्रेम दिवाणी मेरा दर्द ना जाणे कोए गाकर अपने कृष्ण प्रेम का इजहार करती हैं। जहां देश की मल्लिकाए तरन्नुम लता मंगेशकर डूंगरपुर नरेश राज सिंह के प्रेम में डूबकर आजीवन विवाह नहीं करती वहीं राज सिंह अपने प्रेम को स्वीकार ना करने वाले राजघराने का प्रतिकार करते हुए आजीवन अविवाहित रहते हैं।
सिंध प्रांत जो अब पाकिस्तान में है के दो युगल लैला मजनू की दास्तान का दर्दनाक अंत तो होता है किंतु वे आज भी पूज्य है।भारत पाक सीमा बार्डर राजस्थान पर जहां वे दोनों भूख प्यास से मरे थे वहां आज भी हर साल उनकी याद में मे उन दोनों की मजार पर मेला भरता है। हमारे बी एस एफ के ज़बान उस भूमि को पावन प्रेम भूमि मानकर नमन करते हैं। यहां जून माह में भारत और पाक से हज़ारों की तादाद में लोग पहुंचते हैं। किंतु शीरी फरहाद,सोहिनी महिवाल जैसे अनगिनत प्रेमी आज भी नफरत की बलि चढ़ जाते हैं। संत वैलेंटाइन ने इस प्रेम को समाज में महत्ता देने की कोशिश की तभी से दुनिया भर के लोग इस दिन को मिलजुलकर अन्य त्यौहारों की तरह मनाते हैं।
हमारे प्रेम प्रधान देश में पिछले आठ नौ साल से कुछ प्रेमविरोधी लोगों द्वारा इस दिन विरोध प्रकट करने का रिवाज बन गया है उन्हें किसी का प्रेम बर्दाश्त नहीं होता।अरे भाई जब सार्वजनिक तौर पर सगाई और शादी पर युवा जोड़ों का प्रदर्शन होता है वह अच्छा लगता है तो इसे भी अच्छी नज़र से देखिए। प्रेमी प्रेमिका को एक दूसरे से मिलने जुलने से ही तो सही रिश्ते बनते हैं।जबरन विवाह तो एक बंधन ही होता है। आदिवासी समाज जिसे लोग पिछड़ा समाज कहते हैं उनमें अपने जीवन साथी चुनने की छूट है।बस्तर में तो घोटुल होते हैं जहां लड़के लड़कियां साथ रहकर जीवनसाथी चुनती हैं। झाबुआ का भगोरिया मेला भी युवक युवतियों को बराबर चयन का अवसर देता है। विदेशों में भी इस तरह की आजादी है। हमारे देश में पहले ऐसा कभी नहीं था।खुद सीता का चयन राम जी ने किया । सुभद्रा कृष्ण की बहिन ने अर्जुन को चुना। कहीं विरोध नहीं। मुगलकाल में जोधा अकबर का विवाह भी कभी विवाद ग्रस्त नहीं रहा ।
कहने का आशय यह है सबसे ऊंची प्रेम सगाई।प्रेम करने वालों का स्थान सबसे ऊंचा है जिसमें धर्म और जाति कभी आड़े नहीं आई।ये जो नया संस्कार देश में सात्विक प्रेम के खिलाफ उन्माद के स्वरूप में नज़र आने लगा है।ये सब उसी प्रशिक्षणालय की देन है जो अपनी शाखाओं में स्त्री के प्रति नफ़रत का बीज होते हैं और फिर यहां से ऐसे कुंठित लोग निकलते हैं जो झौंक में शादी कर लेते हैं फिर उसे त्यागकर त्यागवीर बन जाते हैं।मन लालायित तो रहता ही है इसलिए स्त्री मामला आते ही उसमें कूद पड़ते हैं।तब स्त्री से दूरी का पाठ मूल जाते हैं।ऐसे ही लोग महिला छात्रावासों का रुख करते हैं । या उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में सरेआम चीरहरण करते दिखते हैं या हाथरसों को अंजाम देते हैं।ये कभी नग्नता के खिलाफ पोस्टर फाड़ते है तो कभी हिजाब को उतरवाने की जगह भगवा फहराते हैं।ऐसे कुंठित लोग स्त्रियों के लिए ख़तरनाक होते हैं।
वैज्ञानिकों का मत है कि एक प्रकृतिप्रदत्त क्रिया को जब जोर जबरदस्ती से रोका जाता है तो वह विस्फोटक हो सकता है।इसके लिए कठिन साधना की आवश्यकता होती है किंतु कभी कभी वहां से भी विचलन के समाचार आ जाते हैं।अत एव प्रेम जैसे कोमल मनोभाव को समझने की चेष्टा ज़रुरी है।क्योंकि यही एक भावना है जिसकी बदौलत दुनिया में इंसानियत का वजूद है।चाहे इसे संत वैलेंटाइन के नाम से मनाएं कोई फ़र्क नहीं पड़ता। गांधी जी कहते थे हमें अपनी खिड़कियां खुली रखनी चाहिए जहां से भी उम्दा बातें मिलें उन्हें अपनाएं। प्यार पर बात करते हुए सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम याद आती हैं- `जिसके साथ होकर भी तुम अकेले रह सको, वही साथ करने योग्य है। जिसके साथ होकर भी तुम्हारा अकेलापन दूषित न हो। तुम्हारी तन्हाई, तुम्हारा एकान्त शुद्ध रहे। जो अकारण तुम्हारी तन्हाई में प्रवेश न करे। जो तुम्हारी सीमाओं का आदर करे। जो तुम्हारे एकान्त पर आक्रामक न हो। तुम बुलाओ तो पास आए। इतना ही पास आए, जितना तुम बुलाओ। और जब तुम अपने भीतर उतर जाओ तो तुम्हें अकेला छोड़ दे।’
रवि, 13 फ़र॰ 2022, 20:11 को susanskriti Parihar <susanskriti.parihar@gmail.com> ने लिखा:






