नई दिल्ली, 15 फरवरी 2022: भारत में राज्यपाल एक संवैधानिक पद है, सत्ताधारी दल के एजेंट का पद नहीं। परंपरागत रूप से और राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल, जैसा कि भारत के राष्ट्रपति हैं, को एक ऐसी इकाई माना जाता है जो देश में किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होती है। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने विवादित हिजाब मुद्दे पर खुलकर टिप्पणी करके इस परंपरा और मिसाल का उल्लंघन किया है, जो हाल ही में मुसलमानों के खिलाफ संघ परिवार की नफरत का हथियार रहा है। राजनीतिक मुद्दों में हस्तक्षेप और राज्यपाल की भागीदारी देश की संघीय प्रकृति और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है। जैसा कि संघ शासित भारत में किसी भी अन्य संवैधानिक निकायों को भगवा समर्थकों के लिए रूपांतरित किया गया है, राज्यपाल पद को भी आरएसएस सरकार द्वारा कलंकित किया गया है। हिजाब के बारे में उनका बयान आरएसएस की वफादारी साबित करने और अपने आकाओं को खुश करने का रहा है। एक नागरिक के रूप में उनके पास किसी भी मुद्दे पर टिप्पणी करने या किसी को भी खुश करने की अपनी पसंद हो सकती है। लेकिन वह भूल जातें हैं कि वह एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं जो राजनीतिक, धार्मिक, जाति, भाषाई और लैंगिक निष्पक्षता की मांग करता है; और संविधान के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता साबित करता है। बेहतर यही होगा कि आरिफ मोहम्मद खान राज्यपाल के पद से इस्तीफा दे दें और आरएसएस के एजेंट की भूमिका निभाएं। श्री आरिफ मोहम्मद खान राज्यपाल पद के दुरुपयोग व प्रतिष्ठित कार्यालय की गरिमा को बर्बाद करने के बजाय आरएसएस को खुश करने के लिए काम करें। *एड्वोकेट शरफुद्दीन अहमद* राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया
*केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने खुद को एक अपमान साबित किया-SDPI





