र्व कथन :*
मृत्यु निश्चित है और जीवन अनिश्चित. निश्चित को जाने-समझे-जीने से पहले जीवन को जानना-समझना-जीना संभव नहीं है. जड़ताजनित घामड़ता ग्रसित कूपमंडूकता में पड़े लोग बस बचपन से कफ़न तक के शरीर के सफ़र को जीवन का सफ़र स्वीकार लेते हैं. भावना-संवेदना-चेतनासंपन्न जन जीवन-जगत के रहस्यों को समझने में संलग्न होते हैं. वे जीवन जीने का ढोंग नहीं करते, जीवन को ढंग से जीते हैं.
इस अखबार में मैंनें पिछले दिनों मृत्यु की धार्मिक-दार्शनिक-वैज्ञानिक विवेचना की थी. आपसे वादा किया था की शीघ्र ही मैं मृत्यु के अपने वैयक्तिक अनुभव को आपके साथ शेयर करूंगा. आज ये वादा पूरा कर रहा हूँ. इस न्यूज पोर्टल का लिंक सेव करके रखना. जीवन पर रिसर्च के ऐसे मैटर पोथियों, धूर्त-ढोंगी गुरुओं और गूगल बाबा से भी नहीं मिलते.
पिछले लेख पर बहुत से लोगों की जिज्ञासाएं-समस्याएं आई थी, जिनका समाधान किया गया. आप के कोई भी सवाल हों, कुछ भी जानना या समझना हो तो व्हाट्सप्प 9997741245 पर अपना परिचय देकर संपर्क कर सकते हैं. हम पूर्णत: निःशुल्क सुलभ हैं. बेहतर हो की आप हमारा एक 15 दिवसीय शिविर ज्वाइन कर लें.
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आप मुझ तक खुद को देखने-पाने-जीने हेतु आते हैं। बाजार, संसार, भौतिकता के अंबार से अटेच रहेंगे तो हम नाकाम होंगे। इसलिए फोन, लैपटॉप वैगेरह वर्ज़ित, पूर्णतः मौन जरूरी। दो घण्टे के प्रश्नोत्तर सत्र में बोल सकेंगे। बीच में जरूरी होने पर अपनी बात मुझतक लिखकर पहुंचा सकेंगे।
खुद की उपलब्धि ही खुदा की अनुभूति है। स्वयं में स्थित हुए बिना तन-मन-मस्तिष्क का आरोग्य असंभव। स्वास्थ्य= स्वयं में स्थित।
रोगों का निदान हम मेडिसिन नहीं, मेडिटेशन से करते हैं, जिसमें प्रणिकहिलींग, ऊर्ज़ाट्रांसफर-टच/मसाज थेरेपीज़ शामिल हैं. एलोपैथी-होमियोपैथी-आयुर्वेद के अच्छे चिकित्सक भी सुलभ रहते हैं।सब निःशुल्क. पूरा रिजल्ट.
~ डॉ. विकास मानव
_हमारे जीवन में, समाज में, संसार में मृत्यु के बारे में जो प्रचलित धारणा है, उसने इतना व्यापक प्रभाव संसार और समाज पर डाल रखा है कि हम सभी ने असत्य को सत्य और सत्य को असत्य न सिर्फ जान रखा है, बल्कि उसी को मान भी रखा है।_
वह असत्य हरेक के मानस में इतना रच-बस रखा है कि उसकी चर्चा आते ही समाज उसके विरोध में खड़ा हो जाता है। साधारणतया हम सभी समाज के लोग मृत्यु को एक मात्र सत्य समझते हैं तो जब भी इसके विपरीत यह कहा जाता है कि मृत्यु असत्य है तो लोग उसका ही विरोध करने लगते हैं। इतना ही नहीं, वे ऐसा कहने वाले को मूर्ख और अज्ञानी भी कहने लगते हैं।प्रस्तुत लेखमाला मेरे जीवन में स्वानुभूत ऐसे सत्य का प्राकट्य है.
भारत की जितनी भी आध्यात्मिक धारणाएं हैं, उनमें से सबसे महत्वपूर्ण और गरिमामयी धारणा यह है कि मनुष्य जिसे जान लेता है और जिसके रहस्य से परिचित हो जाता है, उससे सदैव के लिए वह मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, उस पर सदैव के लिए विजय भी प्राप्त कर लेता है वह। संसार में हम किसी-न-किसी रूप में और किसी-न-किसी कारण से बराबर पराजित ही होते रहते हैं।
_इसका मूल कारण हमारी अज्ञानता है। अज्ञानता है--आत्मा का अन्धकार और ज्ञान है--आत्मा का आलोक (प्रकाश)। हमारा जीवन अज्ञानता के अंधकार से भरा है और इसीलिए हम पराजित होते रहते हैं। आत्म-ज्ञान का प्रकाश जहां है, वहां पराजय नहीं, विजय है। यदि हम आत्म-ज्ञान के प्रकाश को उपलब्ध हो जायें तो फिर क्या ?_
फिर तो बराबर अपने आप पर, अपने जीवन पर और साथ-ही-साथ संसार पर विजय प्राप्त करते जाएंगे--इसमें सन्देह नहीं और इसमें भी सन्देह नहीं कि इसके अतिरिक्त परिचित होते जाएंगे शनै-शनै जीवन के रहस्यों से और जीवन के वास्तविक स्वरूप से भी और जिसका परिणाम यह होगा कि पग-पग पर जीवन का सत्य प्रकट होने लग जायेगा हमारे सामने। लेकिन आत्म-ज्ञान का आलोक होगा कैसे जीवन में ?
_इसी एक प्रश्न के उत्तर में मैंने अपने अन्वेषण के आधार पर, अपने अनुभवों के आधार पर और अपनी स्वानुभूति के आधार पर यह प्रतिसंवेदन आपके लिए तैयार किया है._
मैंने अपनी मृत्यु को देखा है और किया है हमने उसका अनुभव भी। हमारा अपना विचार है और है हमारी अपनी धारणा और वह यह है कि संसार में सबसे बड़ा और सबसे अधिक कोई असत्य वस्तु है तो वह है मृत्यु--एकमात्र मृत्यु।
_लेकिन घोर आश्चर्य की बात यह है कि संसार में सर्वोपरि सत्य प्रतीत होती है मृत्यु ही। लोगों की धारणा है कि परम् सत्य मृत्यु ही है और उससे बढ़कर और उसके पश्चात कोई परम् और सर्वोपरि सत्य है ही नहीं। लोग समझते हैं कि उनका सम्पूर्ण जीवन जैसे मृत्यु से ही घिरा हुआ है चारों ओर से। अपनी छाया से भी अधिक निकट लगती है लोगों को अपनी मृत्यु।_
हमारे भीतर मृत्यु का भय इतना घनीभूत है कि हम अपने जीवन के रूप का निर्माण भी उसी के आधार पर कर लेते हैं जिसके फलस्वरूप हमारे जीवन का जो वास्तविक स्वरूप है, वह कभी भी प्रकट नहीं हो पाता और हम बराबर भटकते रहते हैं मृत्यु के अज्ञात भय के घनीभूत अन्धकार के सागर में।
_हमें ज्ञात होना चाहिए कि हमारा परिवार, हमारा समाज और यहां तक कि हमारा संसार भी मृत्यु के भय पर ही टिका है। यदि विचारपूर्वक देखा जाये तो सर्वत्र मृत्यु का ही भय का व्याप्त है और सर्वत्र ही बिखरी हुई है मृत्यु की काली छाया।_
सचमुच मृत्यु का भय अति विचित्र है। सभी की औषधि है, लेकिन मृत्यु के भय की औषधि इस संसार में कहीं नहीं है।
_हम धन, वैभव, यश, कीर्ति, आदि प्राप्त करते हैं मृत्यु के भय के कारण। हमारी कामना, लालसा और वासना के पीछे भी मृत्यु का ही भय है। हम संग्रह भी करते हैं मृत्यु के भय से वशीभूत होकर ही। यहां तक कि ऊँचे-से-ऊंचा पद भी प्राप्त करने की आकांक्षा के पीछे भी मृत्यु का भय है। हमारे जीवन में जितने भी प्रकार के भोग-विलास और सुख हैं, उन सबके पीछे मृत्यु का ही भय विराजमान है।_
हमें यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि मृत्यु के भय के कारण ही भगवान की, परमात्मा की, परमेश्वर की और नाना प्रकार के देवी-देवताओं की अपनी कल्पनाओं और धारणाओं के आधार पर रचना की है, यहां तक कि उनकी पूजा, अर्चना, साधना, उपासना के मूल में भी हमारे भीतर व्याप्त मृत्यु का भय ही है एक मात्र।
_जितने मन्दिर हैं, मस्जिद हैं, गुरुद्वारे हैं, गिरिजा घर हैं, उन सब की भी मुलभित्ति भी है मृत्यु का भय ही। हम किसी देवी-देवता के सामने खड़े होकर हाथ भी जोड़ते हैं, प्रार्थना भी करते हैं तो मृत्यु के भय के कारण और हमारा कहना है कि मृत्यु से अधिक इस संसार में कोई दूसरी वस्तु नहीं है सत्य।_
_मृत्यु को सत्य के रूप में स्वीकार करके भारी भूल की है हमने जिसके फलस्वरूप हमारे जीवन की सारी व्यवस्था असत्य और त्रुटिपूर्ण हो सिद्ध हो गयी है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि हमको कैसे ज्ञात हो कि मृत्यु असत्य है और कैसे हम समझें कि मृत्यु नाम की किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है संसार में और जब तक हम यह जान-समझ नहीं पाएंगे, तब तक हमारे भीतर मृत्यु का भय बना रहेगा और तब तक जीवन के वास्तविक स्वरूप से न परिचित हो सकेंगे और न तो परिचित हो सकेंगे हम सत्य से ही।_
सच्चे अर्थों में हम अपने जीवन को तभी जी सकते हैं और अपने जीवन को तभी क्षमतामय बना सकते हैं जब हमारे भीतर से मृत्यु का भय हमेशा-हमेशा के लिए निकल जायेगा और जब हमारा जीवन मृत्यु की काली छाया से सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाएगा।
_जीवन को समझने के लिए, सच्चे अर्थों में जीवन को जीने के लिए, जीवन की गहराई में छिपे हुए सत्य से परिचित होने के लिए और जीवन को क्षमतावान बनाने के लिए मन का स्थिर होना आवश्यक है जबकि हमारा मन मृत्यु के भय के कारण हर समय, हर क्षण और हर पल कांपता ही रहता है और भयभीत मन को लेकर हम जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त तक की यात्रा करते हैं जिसका परिणाम होता है कि हम जीवनभर असफल ही रहते हैं, जीवनभर रोते ही रहते हैं, जीवनभर हम त्राहि-त्राहि ही करते रहते हैं और रहते हैं जीवनभर तनावग्रस्त। क्या मिला है अब तक जीवन में ? ,रोते ही रहे हम हमेशा।_
कितना ही विस्मृत करें मृत्यु को हम लेकिन विस्मृत नहीं होती वह कभी। श्मशान को देखकर मृत्यु का स्मरण हो आता है हमको। इसलिए गांव के बाहर अथवा शहर के बाहर श्मशान की व्यवस्था करते हैं हम। लेकिन फिर भी कभी-न-कभी दिखलायी दे ही जाता है श्मशान और स्मरण हो ही जाती है मृत्यु।
_जब कभी हम किसी को मरते हुए देखते हैं और जब कभी हम मृत्यु को घटित होते हुए देखते हैं तो हमारे जीवन की मूलभित्ति हिल जाती है एकबारगी और तब हम सोचने लगते हैं कि एक-न-एक दिन हम भी इसी प्रकार मरेंगे और इसी प्रकार हम भी मृत्यु का आलिंगन करेंगे किसी दिन। हमारे किसी स्वजन की, परिजन की, अपने परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो हम रोते हैं, विलखते हैं, दुःखी और पीड़ित होते हैं, क्योंकि उसमें हमारे मृत्यु की आसन्न सम्भावना प्रकट हो गयी होती है। हम अपनी भी मृत्यु की झलक उसमें देखने लग जाते हैं।_
जब कभी किसी का हम शव देखते हैं और किसी के शव को चिता पर जलते देखते हैं, उसमें अपना शव दिखलायी पड़ता है चिता की क्रूर लपटों में।
जब तक हम ऐसी मानसिकता से घिरे रहेंगे, तब तक जीवन को कैसे जी सकेंगे सच्चे अर्थों में ? कैसे वास्तविक रूप में जीवन का सुख और जीवन का आनन्द उठा सकेंगे ? सदैव वंचित ही रहेंगे जीवन के सौंदर्य से और जीवन के अमृत-रस से। जीवन का परम सत्य है--परमात्मा। उसके समीप नहीं पहुंच पाएंगे हम कभी।
_आत्मा और परमात्मा का सामीप्य-लाभ तभी सम्भव है जब हम मृत्यु के भय से रहित होंगे और हमारे जीवन में जीवन के सौंदर्य की सुगन्ध होगी और होगा जीवन के अमृत का रस भी।_
यह समझ लेना चाहिए कि यदि जीवन सत्य है तो कभी सत्य नहीं हो सकती मृत्यु। यदि मृत्यु सत्य है तो जीवन एक सपना होगा--केवल एक खोखला सपना। जीवन और मृत्यु दोनों एक साथ सत्य होना असंभव हैं। लेकिन हम हैं कि दोनों को सत्य समझकर दोनों को स्वीकार किये हुए हैं।
_हम जी तो रहे हैं लेकिन साथ-साथ मर भी रहे हैं हर क्षण मन में। एक ओर जीवन को पकड़े हुए हैं और दूसरी ओर मृत्यु से भी जकड़े हुए भयभीत हैं। कह सकते हैं कि हम एक साथ जी भी रहे हैं और मर भी रहे हैं।_
एक सर्वत्यागी महात्मा से मिलने का अवसर मिला। महात्मा का नाम था लालबाबा। कलकत्ता में बेलूरमठ के निकट था उनका निवास स्थान। उच्चकोटि के साधक और सन्त पुरुष थे लाल बाबा। मैंने उनसे कहा--हमें जीवन और मृत्यु के सम्बंध में अवगत कराएं, बड़ी कृपा होगी।
बाबा एक बार मुस्कराए और फिर बोले--यदि जीवन के विषय में कुछ जानना-समझना हो बतला सकता हूँ। यदि मृत्यु के सम्बन्ध में जानना-समझना हो तो कहीं और जाओ क्योंकि मृत्यु का अनुभव नहीं है मुझे। क्योंकि ~
_न कभी "मैं" मरा हूँ और न तो कभी मरूंगा ही। मुझे अच्छी तरह ज्ञात हो चुका है कि कोई कभी नहीं मरता। आज तक इस संसार में कोई नहीं मरा है और न तो मरेगा ही।_
_लेकिन हम कैसे मान लें, स्वीकार कर लें उस परम सत्य की बात ? हम तो नित्य ही किसी-न-किसी को मरते हुए देखते हैं, नित्य ही 'राम नाम सत्य है' सुनते हैं और नित्य ही श्मशान में किसी-न-किसी व्यक्ति के शव को जलते हुए देखते हैं। कैसे इस प्रत्यक्ष सत्य को झुठला सकते हैं ? कैसे सत्य को असत्य मान लें ? मृत्यु से भयभीत होकर ही आत्मा को अगर मानते हैं और बार-बार 'आत्मा अमर है' शब्दों को दुहराते रहते हैं हम। सोचते हैं--'आत्मा अमर है' कहने से मृत्यु असत्य हो जाएगी। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि हम जिस बात को बार-बार दुहराते हैं, उसके ठीक विपरीत को सदैव स्वीकार करते हैं।_
जब हम 'आत्मा अमर है' कहते हैं तो हम यह जानते हैं कि हम मरेंगे। मेरी मृत्यु आज नहीं तो कल अवश्य होगी।
_मृत्यु को झुठलाकर आत्मा को अमर मानने से हम मरने से बच नहीं सकेंगे। अपने मृत शरीर को चिता की लपटों से बचा नहीं सकेंगे। मृत्यु के भय से अपने-आपको मुक्त करने के लिए और मृत्यु से बचने के लिए हमको मृत्यु को समझना होगा। मृत्यु को समझने के लिए मृत्यु का साक्षात्कार करना होगा। 'मृत्यु क्या है ?'--इसे गहराई से जानना-समझना और अनुभव करना होगा।_
जन्म और मृत्यु पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर के प्राप्त करने के स्थान के अतिरिक्त वास्तव में और कुछ नहीं है। किन्तु इन दोनों ही अवस्थाओं में हम एक प्रकार से बेहोश रहते हैं। बेहोशी में हमारा जन्म होता है और होती है हमारी मृत्यु भी बेहोशी में ही। यही कारण है कि हमें न अपने जन्म का ज्ञान होता है और न तो होता है अपनी मृत्यु का अनुभव।
_एक बार भी यदि हम जन्म और मृत्यु को देख लें, उनका अनुभव कर लें और उनका ज्ञान कर लें तो मृत्यु का भय हमेशा के लिए दूर हो जायेगा। फिर हम कभी भी मृत्यु से भयभीत नहीं होंगे। सदैव के लिए मुक्त हो जाएंगे हम मृत्यु के भय से। मृत्यु क्या है ? मृत्यु से होता क्या है ? मृत्यु के दौरान कौन-सी घटना घटती है ?--इन तीनों प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव के द्वारा प्राप्त हो जायें तो फिर हमें विजय करते देर न लगेगी मृत्यु पर।_
लेकिन विजय तो हम उस पर पाते हैं जिसका अस्तित्व हो। केवल तीनों प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हो जाने से ही अपने आप मृत्यु का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
_काल के प्रवाह में पड़कर हम न जाने कितनी बार मरे हैं और कितनी बार जन्मे हैं ?--इनका लेखा-जोखा हमारे पास नहीं है। लेकिन जब भी हम मरे हैं, बेहोश ही मरे हैं और हमने जब भी जन्म लिया है, बेहोशी में लिया है और यही कारण है कि न हम मृत्यु को देख पाते हैं और न तो देख पाते हैं अपने जन्म को ही।_
इसीलिये हम यह कभी भी समझ नहीं पाते कि *जीवन शाश्वत है। जीवन का प्रवाह कभी भी नहीं रुकता।*
जैसे हम वस्त्र बदलते हैं और जैसे हम यात्रा-काल में सवारी बदलते हैं, उसी प्रकार हम मृत्यु में केवल शरीर बदलते हैं, बस केवल शरीर। और सब कुछ पूर्ववत ही रहता है--आत्मा, मन, बुद्धि, भाव, विचार, भावना, कामना, वासना, इच्छा, अभिलाषा आदि।
_कुछ तो नहीं बदला। जो स्थूल था, जो दिखलायी देता था, बस वही बदल गया। मरा कहाँ ? शरीर केवल स्थूल ही तो नहीं है, मरने के बाद भी मनुष्य के अन्य शरीर भी हैं--प्रेतशरीर, सूक्ष्मशरीर, मनोमयशरीर आत्मशरीर आदि। ऊपर से एक कपड़ा (आवरण) हटा तो अन्य सारे आवरण तो मौजूद ही रहे। एक आवरण या दो आवरण हटना मृत्यु नहीं है।_.
हां, हमने *मृत्यु-मृत्यु* कहकर अपने को और दुनियाँ को भयभीत अवश्य कर रखा है। अपने को ही मूर्ख अवश्य बना रखा है।
_मृत्यु को हम देखते हैं। मृत्यु का अनुभव भी करते हैं और मृत्यु के समय क्या घटित होता है ?--यह भी जानते हैं कि मृत्यु की घटना एक खूबसूरत मगर मनुष्य और समाज की दृष्टि में भयानक घटना है। धोखा दृष्टि का है, छल सोच का है।_
हम तो यह कहते हैं कि मरने से पहले मृत्यु का ज्ञान हो जाये, मृत्यु का अनुभव हो जाये और मृत्यु का साक्षात्कार हो जाये, मृत्यु के क्षण क्या घटित होता है ?--इसका स्पष्ट और प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाये तो मृत्यु कुछ नहीं है।
_मृत्यु को जानने का एक मार्ग है। उस मार्ग को हम सबको जानना होगा। वह मार्ग आरम्भ होता है ध्यान- बिंदु से और उसकी प्ररणति है समाधि में। ध्यान ही अपने अन्तिम चरण में और अपने अंतिम शिखर पर पहुंचकर समाधि में बदल जाता है। समाधि स्वेच्छा से मृत्यु में, मृत्यु के अनुभव में और मृत्यु की अनुभूति में प्रवेश-मार्ग है।_
समाधि की अवस्था में हम अपने स्थूल शरीर के रहते हुए उसी प्रकार से उससे अलग हो जाते हैं, जैसे मृत्यु के समय होते हैं। हमको वही अनुभव होता है जो मृत्यु के क्षण होता है। समाधि और मृत्यु में केवल यही अन्तर है कि मृत्यु होने पर हम वापस अपने शरीर में नहीं लौट पाते और समाधि में हम वापस लौट आते हैं। मृत्यु में प्राण-सूत्र (रजत-रज्जू) टूट जाता है मगर जीवन में वह स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर दोनों को जोड़े रखता है।
_जब हम समाधि के बाद वापस स्थूल शरीर मे आते हैं तो मृत्यु का अनुभव लेकर लौटते हैं। मृत हुए बिना भी मृत्यु का अनुभव।_
_हमारा पार्थिव पंचतात्विक शरीर है, इसलिए एक विशेष सीमा है और उसकी इन्द्रियाँ बंधी हुई होती हैं। उस सीमा के आगे न शरीर की गति है और न इन्द्रियों की ही। उस सीमा के भीतर जो भी ज्ञान-विज्ञान है, उसी के अनुभवों से शरीर द्वारा इन्द्रियाँ परिचित होती हैं, उसके आगे नहीं। लेकिन सूक्ष्मशरीर की सीमा अत्यधिक व्यापक और विस्तृत है। मनोमय शरीर की सीमा जहाँ शुरू होती है, वहां तक सूक्ष्मशरीर की सीमा है और उस सीमा तक के जगत को सूक्ष्म जगत कहते हैं।_
सूक्ष्म जगत का ज्ञान-विज्ञान अभौतिक स्तर का है और उसका भंडार भी विशाल है। जब पार्थिव शरीर में सूक्ष्मशरीर लौटता है तो हम अपने संस्कार के अनुसार सूक्ष्म जगत के अभौतिक स्तर के ज्ञान-,विज्ञान के कुछ अंश भी लेकर लौटते हैं। समाधि और मृत्यु में जो अन्तर है, वह तो स्पष्ट है ही, लेकिन इस सम्बन्ध में एक बात का स्मरण रखना होगा कि मृत्यु के क्षण जो बेहोशी होती है, वह बेहोशी समाधि के समय नहीं होती।
_पूर्ण चैतन्य स्थिति में हम अपने पार्थिव शरीर से अलग होकर सूक्ष्मशरीर ग्रहण कर लेते हैं और बड़ी ही सहजता और सरलता से अभौतिक सत्ता की असीम यात्रा पर निकल पड़ते हैं और उस अवस्था में हमें अपने भौतिक अस्तित्व का बोध बराबर होता रहता है और साथ ही बोध बना रहता है भौतिक जगत का भी।_
मृत्यु के समय हम तो एक ही बार और वह भी अंतिम बार शरीर से अलग होने का अनुभव करते हैं। वह भी स्वेच्छा से नहीं, प्रकृति की इच्छा से। लेकिन समाधि में स्वेच्छा से शरीर से अलग होते हैं और स्वेच्छा से उसमें प्रवेश भी करते हैं।
_जैसे-जैसे हम ध्यान में प्रवेश करते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे हमसे संसार छूटता जाता है और संसार की प्रत्येक वस्तु छूटती जाती है और अन्त में वह पल भी आ जाता है जब लगता है--,संसार हमसे बहुत दूर है और संसार की प्रत्येक वस्तु हमसे दूर हो गयी है। अपना शरीर भी दूर पड़े शव की तरह दिखलायी पड़ता है, फिर भी हमारे 'मैं' का बोध नहीं मिटता। 'मैं' हूँ--यह बोध हमेशा बना रहता है। मृत्यु के बाद भी 'मैं' का यह बोध बना रहता है।_
लेकिन संसार और सांसारिक वस्तुओं का बोध नहीं रहता, बस उनकी स्मृतियों मात्र रहती हैं जिनका आश्रय लेकर हम अपना एक नया संसार बना लेते हैं, नई सृष्टि की रचना कर लेते हैं और उसी में तब तक जीते रहते हैं, जब तक हमारा दूसरा जन्म नहीं हो जाता।
_प्रायः लोग कहते हैं कि ध्यान नहीं लगता। उसका एकमात्र कारण है--मृत्यु का भय, मरने का डर और ध्यान करने की प्रक्रिया। ध्यान में हम वहीं पहुंच जाते हैं, जहां हम मरने पर पहुंचते हैं। अन्तर केवल यह है कि हम ध्यान में होशपूर्वक पहुंचते हैं जबकि मृत्यु के बाद हम पहुंचते हैं बेहोशी में उस स्थान पर।_
हम दूसरे को मरते हुए बराबर देखते हैं, लेकिन अपने को मरते हुए कभी नहीं देखा जिसके कारण हमारे भीतर यह धारणा मजबूत होती जाती है कि हमको भी इसी प्रकार एक-न-एक दिन अवश्य मरना है। बस, यह धारणा ही हमें ध्यान-साधना में नहीं जाने देती, ध्यान में बाधक बनती है। इस धारणा को यदि हम भीतर से निकाल दें तो निश्चय ही उसी समय, उसी क्षण हमारा ध्यान सध जाएगा और फिर शनै-शनै समाधि की स्थिति में पहुंचने में देर न लगेगी और यदि एक बार समाधि को उपलब्ध हो गए तो हमेशा-हमेशा के लिए मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा जिसका परिणाम यह होगा कि अपनी स्वयं की मृत्यु के समय हम पूर्ण चैतन्य रहेंगे, पूर्णतया होश में रहेंगे, अपने शरीर से कैसे अलग होते हैं, हम कैसे मरते हैं--यह देखते रहेंगे और उसका अनुभव भी करते रहेंगे।
_साथ ही यह भी अनुभव करते रहेंगे कि परिवार के लोग मेरे शरीर के साथ क्या व्यवहार कर रहे हैं ? किस प्रकार हमारे शव को चिता पर रखकर उसको भस्मीभूत करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं ? शरीर का अग्नि में अस्तित्व समाप्त होते ही अभौतिक सत्ता में प्रवेश करने का अनुभव करेंगे हम, जहां केवल संस्कारजन्य स्मृतियाँ ही शेष रहेंगी। कहने की आवश्यकता नहीं--उन्हीं संस्कारजन्य स्मृतियों के कारण ही हम जीवन के शाश्वत होने का बोध करते हैं, जीवन के प्रवाह का बोध करते हैं। स्थूल शरीर से अलग होकर सूक्ष्मशरीर में अपने अस्तित्व का बोध करते हैं।_
सच बात तो यह है कि मृत्यु से न मुक्त होना है और न तो मृत्यु को जीतना ही है, बस मृत्यु को जानना है। केवल जानना ही मुक्ति बन जाती है। जानना ही बस ज्ञान है और ज्ञान ही मुक्ति है।
_मृत्यु का ज्ञान मृत्यु को विलीन कर देता है और तब प्रथम बार उस जीवन से अनायास ही सम्बन्धित हो जाते हैं, जुड़ जाते हैं जिसे शाश्वत और अखण्ड कहा जाता है।_
_जिसे हम जीवन कहते हैं और कहते हैं जिसे हम मृत्यु, दोनों--उस शाश्वत और अखण्ड जीवन के केवल मात्र अंग हैं। हम सांस ले रहे हैं। एक सांस बाहर आती है और एक सांस भीतर जाती है।सांस का भीतर जाना जीवन है और सांस का बाहर आना है : मृत्यु। योग में भीतर जाने वाली सांस को 'प्राण' और बाहर निकलने वाली सांस को 'अपान' कहा गया है। प्राण और अपान यानी जीवन और मृत्यु--दोनों साथ-साथ चलते हैं। जीवन एक कदम है तो दूसरा कदम है : मृत्यु।_
जब हम होशपूर्वक ध्यान में प्रवेश करते हैं और अन्त में समाधि में पहुंचते हैं तो वहां हमें अखण्ड और शाश्वत जीवन के अविरल प्रवाह के दर्शन होते हैं, जहां न जन्म है और न तो है मृत्यु ही। आमतौर पर संसार और हम जिसे जीवन समझते हैं, वह उस अखण्ड और शाश्वत जीवन का एक अर्ध मूर्च्छाग्रस्त अंशमात्र है। जो जीवन हम जीते हैं, वह एक प्रकार से बेहोशी से भरा है, इसलिए कि हमारा जन्म ही बेहोशी में हुआ है और जब हम जो जीवन जीते हैं, वह भी बेहोशी में जीते हैं और जब मरते हैं तो बेहोशी में ही मरते हैं।
_हमारा जन्म, हमारा जीवन और हमारी मृत्यु--तीनों बेहोशी के हैं। समाधि में जब हम शरीर से अलग होते हैं तो वह बेहोशी टूटती है साथ जी जन्म, मृत्यु और जीवन के प्रति हम सजग हो जाते हैं। हमारा प्रत्येक कार्य होशपूर्वक होने लगता है। पूर्ण चैतन्य हो उठते हैं हम जीवन के पथ पर।_
एक बार होश में मृत्यु का अनुभव हो जाता है तो हमारा अगला जन्म भी होशपूर्वक होता है और जीवनपर्यंत हम होश में ही रहते हैं। हमारा सम्पूर्ण जीवन चैतन्य रहता है। हम जीवन को समझने लगते हैं, मृत्यु से भली-भाँति परिचित रहते हैं जिसके फलस्वरूप हम संसार, समाज और परिवार और यहां तक कि स्वयं अपने प्रति विरक्त और अनासक्त रहते हैं। गीता ने योग में इसी अवस्था को 'स्थितिप्रज्ञ' कहा है।
_इस परम् अवस्था को उपलब्ध होने पर जीवन-काल में ही हमारी आत्मा इस भवसागर से मुक्त हो जाती है और हम उस स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं जिससे उत्पन्न आनंद को 'आत्मानंद' कहते हैं और जब हमारी मृत्यु सामने आकर खड़ी होती तो हम उसी आत्मानंद में विभोर होकर उसका आलिंगन करते हैं और हम उसी अनिर्वचनीय अलौकिक अवस्था में अपनी आत्मा के दर्शन करते हैं और उसी में लीन होकर पूर्ण चैतन्य अवस्था में और पूरे होश में नए जन्म को स्वीकार करते हैं और तब हमारा जो जन्म होता है, वह निर्लिप्त, विरक्त और अनासक्त होता है।_
जीवन-यात्रा समाप्त होने के बाद हमारी जो मृत्यु होती है, वह पिछले जीवन की तरह होती है, लेकिन होती है वह अन्तिम।
_जैसे हम जीवन से मुक्त हुये रहते हैं, वैसे ही सदैव के लिए मृत्यु से भी मुक्त हो जाते हैं। इसी मुक्ति को कहते हैं : 'भवमुक्ति' और कहते हैं--आवागमन से मुक्ति या जन्म-मरण से मुक्ति।_
_मृत्यु स्वयं अपने आप में एक रहस्य है और उससे अधिक रहस्यमय है : मरणोपरांत जीवन। भूत-प्रेत सूक्ष्म शरीरधारी विदेही आत्माओं, स्वर्ग-नर्क आदि लोक-लोकान्तरों का सम्बन्ध मरणोपरांत जीवन से ही है। सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड में मुख्य रूप से तीन सत्ताएं हैं--वस्तुपरक सत्ता, सूक्ष्मपरक सत्ता और आत्मपरक सत्ता। वस्तुपरक सत्ता दृश्य का विषय है। सूक्ष्मपरक सत्ता अनुभव का विषय है, जबकि आत्मपरक सत्ता अनुभूति का विषय है।_
पहली सत्ता के अस्तित्व को प्रमाणित किया जा सकता है। दूसरी सत्ता को एक विशेष सीमा तक ही प्रमाणित करना सम्भव है, लेकिन जहां तक प्रश्न तीसरी सत्ता का है, उसे प्रमाणित करना कठिन ही नहीं, पूर्णतया असम्भव है। इन तीनों सत्ताओं को प्रचलित भाषा में भौतिक जगत, सूक्ष्म जगत और आत्म जगत कहते हैं जिनमें आत्मा स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और आत्म शरीर के द्वारा अपने अस्तित्व को प्रकट करती है।
_आपके पास धन है, उसे आप प्रमाणित कर सकते हैं। किन्तु स्वप्न में आपने स्वादिष्ट भोजन किया, उसे आप शब्दों में तो व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन प्रमाणित नहीं कर सकते। समझिए यही स्थिति है सूक्ष्म परक सत्ता और आत्म परक सत्ता की। उसे प्रमाणित करने के लिए नाना प्रकार के उदाहरणों का आश्रय लिया जाता है।_
यह अकाट्य सत्य है कि मृत्योपरांत कोई भी पुनर्जीवित नहीं होता। यदि कोई होता भी है तो समझा जाना चाहिए कि वह पूर्णरूप से मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ था। ऐसा व्यक्ति जिन अनुभवों को व्यक्त करता है, वह एक प्रकार का स्वप्न विशेष होता है। इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।
_मृत्यु क्या है ? एक मौन, निष्पन्द, निःशब्द प्राकृतिक घटना जो प्राक्काल से ही होती आयी है और है अपने आप में अति रहस्यमयी। उच्चकोटि के योगियों ने मृत्यु के रहस्य को सर्वप्रथम अनावृत करने की चेष्टा की और जिसके परिणामस्वरूप आत्मा की पंचम अवस्था 'समाधि' से परिचित हुए। मृत्यु और समाधि में कोई विशेष अन्तर नहीं है।_
यदि अन्तर है तो केवल मात्र इतना ही कि मृत्यु से कोई वापस संसार में नहीं लौटता, जबकि समाधि में वापस लौट आता है अपने पार्थिव शरीर में। लौटना महत्वपूर्ण है। इसलिए कि लौटने वाला अपने साथ विश्वेतर ज्ञान-विज्ञान के मौलिक तत्वों को लेकर लौटता है। वह खाली हाथ नहीं लौटता।
_अब तक संसार में जितने भी ज्ञान-विज्ञान अवतरित हुए हैं, वे सभी एकमात्र समाधि द्वारा ही हुए हैं अवतरित--इसमें सन्देह नहीं। समाधि की अवस्था में आत्मा परामानसिक जगत में प्रवेश कर जाती है और परामानसिक जगत विशेष और मौलिक ज्ञान-विज्ञान का विशाल भण्डार है।_
यही कारण है कि समाधि को उपलब्ध योगी के लिए भौतिक ज्ञान-विज्ञान तुच्छ है। यहां यह भी बतला देना आवश्यक है कि सर्वप्रथम समाधि के द्वारा ही ज्ञात हुआ कि मृत्यु शरीर की होती है। आत्मा पर उसका किंचित मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मृत्यु घटित होते ही आत्मा सभी प्रकार के संस्कारों को समेट कर तिमिराच्छन्न यात्रा पर एकाकी निकल पड़ती है दूसरा शरीर धारण करने के उद्देश्य से। भौतिक जगत में सबसे बड़ा भय मृत्यु का है।
_यह भय अज्ञात का भय है। जव तक उस अज्ञात भय से मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक आध्यात्मिक उन्नति सम्भव नहीं। भव-मुक्ति का अर्थ है : मृत्यु के भय से मुक्ति। योग का प्रथम लक्ष्य है--मृत्यु के भय से मुक्ति। ज्ञानात्मक समाधि ही इसका एकमात्र साधन है।_
उपर्युक्त साधन को स्वीकार कर सर्वप्रथम मृत्यु और उसके रहस्य से परिचित होना चाहा ताकि उसके भय से सदैव के लिए मुक्त हो सकूँ मैं। इस दिशा में जब मुझे सफलता उपलब्ध हुई तो स्तब्ध और अवाक रह गया मैं एकबारगी।
_मृत्यु असत्य है, जीवन सत्य है। काल की सीमा में जीवन की अक्षुण्ण धारा निर्विघ्न प्रवाहित रहती है अबाध गति से। जीवन का अस्तित्व हर अवस्था में और हर काल में समान रूप से बना रहता है--इसमें सन्देह नहीं। बस नाम, रूप और परिस्थितियां बदलती रहती हैं संस्कार के अनुसार।_
_इस परम् उपलब्धि से मुझे यह अनुभव हुआ कि भौतिक वातावरण में सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं के अतिरिक्त ऐसी भी विदेही आत्माएं विद्यमान हैं जिनसे संपर्क स्थापित होने पर उनके द्वारा अभौतिक सत्ता के अनेक तिमिराच्छन्न गुह्य आयाम अनावृत हो सकते हैं।_
काफी प्रयास के पश्चात इस दिशा में भी सफलता प्राप्त हुई मुझे। आज से 10 वर्ष पूर्व 25 वर्ष की आयु में प्रथम बार मुझे अभौतिक सत्ता में अपने अस्तित्व का अनुभव हुआ। वह अनुभव कैसा था ?--यह बतलाया नहीं जा सकता।
_व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मेरे पास। फिर भी मैं इतना तो अवश्य बतला सकता हूँ कि मृत्यु के बाद का जीवन अत्यंत मोहक और अत्यंत आकर्षक है। कर्म का अभाव होने के कारण जीवन शान्त और नीरव लगता है वहां। मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। स्थूल शरीर बहुत बड़ी बाधा है भौतिक और अभौतिक सत्ता के मध्य।_
उच्चकोटि के पाश्चात्य परामनोवैज्ञानिक उस बाधा को अपने तरीके से दूर करने की दिशा में प्रयासरत हैं। लेकिन जहां तक मेरा विचार है कोई ऐसा भौतिक साधन नहीं जिसके द्वारा वह बाधा दूर हो सके। यदि कोई साधन है भी तो वह है--'समाधि' जो योग-मार्ग की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मृत्यु से वह बाधा अपने-आप दूर हो जाती है। शरीर से अलग होते ही सूक्ष्मशरीर अत्यधिक शक्तिशाली और गतिमान हो जाता है। उसकी सक्रियता भी बढ़ जाती है, जबकि स्थूल शरीर के रहते ऐसा सम्भव नहीं होता।
अभौतिक सत्ता से बराबर मेरा सम्पर्क रहा है. इस संपर्क से मुझे जो ज्ञान प्राप्त हुआ, जो अनुभव हुए, उन्होंने चमत्कृत कर दिया मेरी आत्मा को।
_भौतिक जगत ही केवल मात्र कर्म प्रधान है, अन्य जगत नहीं। कर्म का साधन भौतिक शरीर है। मृत्यु के पश्चात हमारे कर्म, हमारे अच्छे-बुरे विचार हमारे साथ रहते हैं और उन्हीं के अनुसार हम सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। कोई अन्य शक्ति या स्वर्ग-नर्क जैसी अन्य कोई अभौतिक सत्ता हमारे सुख-दुःख की उत्तरदायी नहीं है। हम ही उसके उत्तरदायी हैं।_
हमने जो कुछ किया है, सोचा है, कहा है, सुना है और विचार किया है, वे ही हमारे एकमात्र साथी हैं और हैं वे ही हमारे सुख-दुःख के कारण जीवित अवस्था में भी और मृत्यु के बाद की अवस्था में भी। सच बात तो यह है कि भौतिक जगत में हम इस जन्म के समय में ही अपनी मृत्यु-शैय्या का निर्माण कर लेते हैं।
एक रात मुझे अपने निकट किसी व्यक्ति विशेष की उपस्थिति का अनुभव हुआ। उस समय मैं अर्धनिद्रित अवस्था में था। निकट की चारपाई पर सो रहे मेरे पिता जो इस समय संसार में नहीं हैं, अचानक उठकर बैठ गए और मुझे आवाज देकर धीमे स्वर में बोले- देखो विकास बेटे ! तुम से मिलने कोई आया है।
_मैंने आंखें खोलकर देखा--सामने श्वेत वस्त्रधारी एक महाशय खड़े मुस्करा रहे थे। कौन थे वह ? कहां से आये थे ? इसका उत्तर उस समय नहीं प्राप्त हुआ मुझे।_
पिता मेरे कमरे के बाहर चले गए और अकेला रह गया मैं उस रहस्यमय उपस्थित व्यक्ति साथ। वह व्यक्ति मुस्कराते हुए मन्द स्वर में कहने लगा--
_मैं आपका मित्र हूँ। आप जिस 'अज्ञात' से परिचित होने का प्रयास कर रहे हैं, उस दिशा में मैं आपका सहयोग करने आया हूँ.... वैसे आपको जागतिक संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। अच्छा ! अभी मैं चलता हूँ, फिर आऊंगा. इतना कहकर वह रहस्यमय अज्ञात व्यक्ति वातावरण में विलीन हो गया धीरे-धीरे।_
कौन था वह ?
मनुष्य होते हुए भी मनुष्य नहीं लग रहा था वह मुझे। उसका एकाएक आना, अपना संदेश देना और गायब हो जाना रहस्यमय लगा मुझे।
क्या कोई देवपुरुष था वह ?
_अब मैं आगे बढ़ता हूँ। दीर्घ अवधि तक उसी दिव्य और अज्ञात महापुरुष के अदृश्य सहयोग से अभौतिक सत्ता में संचरण-विचरण करने वाले अनेक दिव्य विदेही आत्माओं के संपर्क में आया मैं।_
भौतिक शरीर और भौतिक वातावरण में बराबर रहते हुए अभौतिक सत्ता के रहस्यमय जगत से संपर्क बनाए रखना अत्यन्त कठिन कार्य है।
_उससे भी कठिन और दुरूह कार्य है वहां के विदेही जनों की सांकेतिक भाषा को समझना। सभी के वश की बात नहीं है यह सब।_
_यह तो एक स्वर में स्वीकार करना पड़ेगा कि इस जगत से सैकड़ों गुना अधिक उन्नत अभौतिक सत्ता के जगत हैं। उनकी दृष्टि में यह जगत काफी पिछड़ा हुआ और भयंकर स्वार्थी है। इस संसार में मनुष्यात्माएं कम, मनुष्य शरीरधारी दुष्टात्माएँ अधिक हैं। मैंने यह भी अनुभव किया कि अभौतिक सत्ता में प्रवेश करने पर मानव-व्यक्तित्व का विकास तो आशातीत रूप से होता है, इसके अतिरिक्त उसकी विद्या, बुद्धि, अवधारणाएं भी उसी के साथ-साथ बढ़ जाती हैं, बल्कि पढ़ने-लिखने, सोचने-समझने की शक्ति भी अधिक बढ़ जाती है।_
यदि हम अपनी अधूरी छूटी पढ़ाई पूरी करना चाहें और अपने अपरिपक्व ज्ञान को परिपक्व करना चाहें तो इसके लिए वहां तत्काल उचित व्यवस्था हो जाती है और वह भी बड़ी सरलता से। जो योग्य हैं, उन्हें वहां पूर्णरूप से ज्ञानार्जन का अवसर प्राप्त हो जाता है। सम्भवतया यही कारण है कि लोग भिन्न-भिन्न संस्कार और भिन्न-भिन्न विषयों में अभिरुचियाँ लेकर इस संसार में जन्म लेते हैं। कोई जन्म लेने के थोड़े ही दिन बाद साधु-सन्यासी बन जाता है, कोई महान गणितज्ञ तो कोई महान साहित्यकार, लेखक और विद्वान। यह सब यों ही नहीं होता।
_इसके पीछे अभौतिक सत्ता के शिक्षण और संस्कार ही होते हैं जो पुनर्जन्म के संस्कारों और अभिरुचियों के आधार पर गढ़े जाते हैं।_
अभौतिक सत्ता में प्रवेश करते ही जो लोग साहित्य में, लेखन में, ज्ञान-विज्ञान में और अध्यात्म में अभिरुचि रखते हैं और कुछ जानना-समझना चाहते हैं तो वहां ऐसे लोगों की आवश्यकता की पूर्ति तत्काल कर दी जाती है और ऐसी भी व्यवस्था कर दी जाती है कि अपने विषय का शिक्षण प्राप्त कर उसे पूरा कर सकें।
_जैसे कोई लेखक हैं, वह अपने लेख्य विषय को अधूरा छोड़कर बीच में ही मर जाता है तो अभौतिक सत्ता में पहुंचकर उसे पूरा करने का प्रयास करता है और इसके लिए उसे वहां पूरा सहयोग प्राप्त होता है।_
यहां यह कहना अनुचित न होगा--यह सब कुछ कल्पना अथवा अध्ययन के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देख-सुनकर और अनुभव के आधार पर लिखा गया है। विश्वास करना और न करना आपकी योग्यता और स्वभाव पर निर्भर है।
_यहां यह नहीं समझ लेना चाहिए कि मैं भारतीय धर्म, संस्कृति, साहित्य और अध्यात्म से अलग हूँ। हम जो बोते हैं, वही काटते हैं। कर्मफल से किसी भी अवस्था में मुक्ति नहीं। हम कहीं भी जायें, कर्मफल हमारा बराबर पीछा करता रहेगा जन्म-जन्मान्तर पर्यन्त।_
दैवीय और आसुरी दोनों शक्तियों पर मैं विश्वास करता हूँ। दैवीय शक्ति अच्छे कर्म की ओर प्रेरित करती है जबकि आसुरी शक्ति बराबर प्रेरित करती रहती है बुरे कर्म की ओर। वेद, पुराण, उपनिषद, गीता आदि सभी धर्म-ग्रन्थ यही शिक्षा परोक्ष और अपरोक्ष रूप से देते हैं कि मनुष्य सत्कर्म के मार्ग पर चले। लेकिन उन धर्म-ग्रन्थों को समझ पाना सभी के वश की बात नहीं है, सत्कर्म के मार्ग पर चलना तो दूर की बात है।
_दैवीय शक्तियां प्राप्त हों और उनकी सहायता से सत्कर्म करें--इसी के लिए नाना प्रकार की देवोपासना, साधना, जप, हवन, पूजन, पाठ आदि का विधान है। लेकिन कौन भला इस समय है उस विधान के रहस्यों से परिचित ? यही कारण है कि आसुरी शक्ति का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और हम सब किसी-न-किसी कारण दुःखी और संतप्त हैं।_
यह तो निश्चित है कि मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आसुरी शक्तियां विभिन्न प्रकार से अपना प्रभाव डालती ही रहती हैं।
_09 वर्ष पूर्व जनवरी 7 से अप्रैल 7 की समयावधि में अज्ञात कारणों से कई बार भयंकर रूप से अस्वस्थ होकर मरणासन्न अवस्था में पहुंच गया मेरा शरीर। ऐसा प्रतीत होने लगा कि शरीर साथ छोड़ देगा अब। सब कुछ छोड़कर अन्तहीन यात्रा पर जाने का समय आ गया है मेरा। एक रात स्थिति गम्भीर हो गयी। सांस की गति तीव्र हो उठी। नाड़ी डूबने लगी।_
डॉक्टर ने हॉस्पिटल में भर्ती होने की सलाह दी लेकिन इसके लिए तैयार नहीं हुआ मैं। मैं समझ गया था कि आसुरी शक्ति का प्रभाव है मुझ पर। वह मेरे उद्देश्य को पूर्ण होने नहीं देना चाहती। अच्छे कार्य में विघ्न तो होता ही है।
_सच कहता हूं। उस विकट अवस्था में इस नश्वर संसार से विदा लेने के लिए मानसिक रूप से पूर्णतया तैयार हो गया था मैं। शरीर का मोह नहीं था। जीवन के प्रति आसक्ति नहीं थी। परिवार की भी कोई चिन्ता नहीं थी।_
एकान्त चाहता था और एकांत मिल गया और उन्हीं एकांत के क्षणों में अपने निकट अनुभव किया मैंने उस अज्ञात अपरिचित और रहस्यमय दिव्य पुरुष की उपस्थिति का।
_पारदर्शी शरीर, श्वेत वस्त्र, लम्बा-ऊँचा कद, काफी नीचे तक झूलते हुए घने काले बाल, चौड़ा ललाट, बड़ी-बड़ी अर्ध निमीलित आंखें, गुलाब के फूल जैसे कोमल रक्ताभ होंठ।_
उस दिव्य पुरुष ने एक बार मेरी ओर देखा स्नेह, करुणा और अनुकम्पा से भरी हुई आंखों से और फिर आंखों की ही भाषा में कहा--तुम एक शुद्ध-विशुद्ध आत्मा हो। तुम्हारा इस संसार में अन्तिम क्षण निकट है। कर्म के अनुसार अब इस शरीर की आवश्यकता नहीं है तुम्हारी आत्मा को।
_इस शरीर के सभी यन्त्र व्यर्थ हो चुके हैं। कब तक अपनी इच्छा-शक्ति से संचालित करते रहोगे उन्हें ? द्वंद्व से मुक्त हो जाओ और अपने चित्त को नाभि पर केंद्रित करो।_
यन्त्र-चालित-सा जैसा कहा था, किया मैंने। पहले सांस को ऊर्ध्व मार्ग में ले गया और फिर अधो मार्ग पर लाकर नाभि-केंद्र पर स्थापित किया। प्राण का केंद्र नाभि है। तत्काल सारे शरीर में पांचों प्रकार के प्राणों का संचार होने लगा।
~ कैसा अनुभव हो रहा है अब ?
~अपने आप को स्वस्थ अनुभव कर रहा हूँ मैं अब।
~सुनो ध्यान से :
_दिव्य आत्माओं के नैसर्गिक सहयोग से तुम लोकहित से सम्बंधित अपनी कामनाओं को पूर्ण कर सकोगे और वह भी इसी जन्म में।_
~लेकिन कैसे ? अब तो....
~ चिंता मत करो। मैं जानता हूँ तुम जैसे लोग शताब्दियों बाद शरीर धारण करते हैं। अगला शरीर भी प्राप्त करने में शताब्दियां गुजर जाएंगी। इसलिए तुमको अपने उद्देश्य को पूर्ण कर लेना चाहिए इसी जन्म में।
_मैं अपनी शक्ति से उतनी ही आयु तुमको दे सकता हूँ जितनी से तुम अपने अधूरे काम पूरे कर सको और अपने उद्देश्य को साकार कर सको। लेकिन विघ्न बहुत हैं, ध्यान रखना। वैसे तो तुम्हारे साथ मेरा अस्तित्व तो है ही। मैं कर्म की गति को टाल नहीं सकता। नियति को बदल नहीं सकता। जितनी आयु उपलब्ध हुई है, उतनी ही आयु अगले जन्म के शरीर की कम हो जाएगी।_
यही नियति है और नियति का पालन करना नहीं होता, वह तो स्वयं पालन करवा लेती है। जो नियति के प्रति सतर्क है, वही योगी है।
~आप कौन हैं ?
_~मिल चुका हूँ पहले. अब यह जानने-समझने की आवश्यकता नहीं। बस माता-पिता के द्वारा उपलब्ध इस शरीर का उपयोग करो।_
कमरे का वातावरण दिव्य गन्ध से भर उठा और मैं नित्य की भाँति ध्यानस्थ हो गया। इसी का नाम भाग्य है। मेरे जीवन में दैवीय शक्तियां आती रही हैं। दैवीय शक्तियां मेरे जीवन में माध्यम बनकर आती रही हैं। उनकी शक्ति को एक सीमा तक अनुभव किया जा सकता है।
_आत्मा दिव्य शक्ति का केंद्र है। उसकी अनुभूति तभी सम्भव है जब हम ध्यान की गहराई में उतरकर आत्मा के अस्तित्व में प्रवेश करते हैं। वह अनुभूति अलौकिक, चमत्कारपूर्ण और अकल्पनीय होती है। उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।_
इसीलिए वेद में उसके लिए 'नेति-नेति' शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात हम नहीं जानते..हम नहीं जानते।
अभौतिक सत्ता के अन्तर्गत ऐसे विशिष्ट लोगों का समुदाय है जिसे 'मंडल' की संज्ञा दी गयी है। जो उस दिव्य शक्ति के वाहक हैं और इसी कारण उन विशिष्ट लोगों को 'दिव्यात्मा' की संज्ञा दी गयी है और उनके मंडल को दी गयी है संज्ञा-- 'दिव्यमण्डल' की।
_दिव्य आत्माओं का अस्तित्व सुनहली-रुपहली आत्माओं के रूप में प्रकट होता है जो अवर्णनीय रूप से चमकीला होता है। वे दिव्य आत्माएं समयानुसार आवश्यकता पड़ने पर मानवाकृति में प्रकट होती हैं।_
प्रारम्भ में जिस अज्ञात और दिव्य रहस्यमय व्यक्ति ने मेरे अस्तित्व से सम्पर्क साधा था, वह और कोई नहीं, दिव्यमण्डल की एक दिव्यात्मा थी। यहाँ यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि उसी दिव्यात्मा द्वारा एक बार नहीं, जीवन में कई बार वह विलक्षण और अनिर्वचनीय अनुभूति हुई थी मुझे अपने शोध और अन्वेषण-काल में जिससे मुझे अपनी दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा प्राप्त हुई। आज भी यदा-कदा वह अनुभूति हो जाती है मुझे अपने-आप।
_उस अपरिचित, अज्ञात और रहस्यमय दिव्यात्मा को अपनी ओर से एक नाम देना आवश्यक था और वह मैंने दिया 'दिव्यकल्प'। एक प्रकार से दिव्यकल्प बराबर मुझसे अपना सम्पर्क बनाये रखते हैं। भौतिक जगत के वास्तविक स्वरूप और साथ ही सत्य से भली-भाँति परिचित हो जाने पर जिस एकाकीपन का अनुभव होता है और जिस प्रकार की शून्यता की अनुभूति होती है, उससे भली-भाँति परिचित हूँ मैं।_
ऐसा प्रतीत होता है कि गहन शून्यता के अथाह सागर में डूबा हुआ है मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व। कौन-सी अवस्था यह ? क्या कोई मानवेतर अवस्था है जिसमें जी रहा हूँ मैं ?
_इस संसार में यदि कुछ अच्छा लगता भी है तो वह है- केवल दिव्यकल्प का गोचर-अगोचर सान्निध्य।_(लेखक ध्यानप्रशिक्षक, मनोचिकित्सक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)





