अग्नि आलोक
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परखों,समझों,सामान्यज्ञान का उपयोग करों

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शशिकांत गुप्ते

अब की बार नतीजे क्या होंगे? यह जानने की सभी को जिज्ञासा है।
पिछले दो बार का अनुभव तो इसतरह रहा है।
क्या से क्या से क्या हो गया
बेवफ़ा को जीताने से
चाहा क्या, क्या मिला
बेवफ़ा तेरे वादों में
चलो सुहाना भरम तो टूटा
जाना के जुमला क्या हैं

मतदाताओं की यह स्थिति ऐसी बनने का कारण,चुनाव के समय मतदाताओं की भावनात्मक निर्णय लेने की प्रवृत्ति ही है।
जब से राजनीति और धर्म का व्यापारीकरण हुआ है। तब से सिर्फ और सिर्फ जनता की भावनाओं को ही भुनाया जा रहा है। हरएक क्षेत्र का व्यापारीकरण हो रहा है।
व्यवसाय करना तो हरएक व्यक्ति को स्वयं के जीविकोपार्जन के लिए अनिवार्य है। व्यवहारिक तौर पर प्रायः पूछा जाता है? आपका पेशा क्या है? पेशा मतलब (Vocation या Profession)
मतलब आप नोकरी व्यापार या आपका कोई उद्योग है?
व्यापार भी प्रामाणिकता से किया जा सकता है, बहुत से लोग इमानदारी के साथ सारे नियमों का पालन कर व्यापार करते भी हैं।
उद्योगपति जीनवपयोगी उत्पादों को निर्मित करतें हैं। अपने उत्पादों की बिक्री बढाने के लिए विज्ञापन भी करतें हैं।
विज्ञापनो में उत्पादों की गुणवत्ता को दर्शाना चाहिए।
बहुत से उद्योगपति अपने उत्पादों की गुणवत्ता को बढ़ाचढ़ा कर दर्शाते हैं।
बहुत से लोग बाजार में तेजगति से बिकने वाले उत्पादों की हूबहू नकल भी करतें हैं। खाद्य पदार्थो,दवाइयों,और विभिन्न जीवनपयोगी वस्तुओं में मिलावट भी करतें हैं।
प्राकृतिक आपदा के समय, बहुत सी बार आमजन के सुरक्षार्थ क़ानूनव्यवस्था के अंतर्गत कर्फ्यू लगाया जाता है,ऐसे समय बहुत से स्वार्थी लोग,जनता की मजबूरी का फायदा उठाते हुए जीवनपयोगी वस्तुओं को महंगी बेंचते हैं। इसे ब्लैक करना कहतें हैं। आश्चर्य होता है ऐसा आचरण करने वाले सभी भारतीय ही हैं।
इनलोगों के द्वारा ठगे जाने वालों के लिए यह शेर पढतें हैं।
हमें तो अपनों ने लूटा
गैरों में कहां दम था
हमारी कश्ती वहां डूबी
जहां पानी कम था।
इसपर किसी व्यंग्यकार ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी इसतरह की है।
तुम तो थे ही नादान
तुम्हारे में कहां दम था?
वहां कश्ती लेकर गए ही क्यों,
जहां पानी कम था…।
राजनीति का न सिर्फ व्यापारीकरण हुआ है बल्कि राजनीति तकरीबन व्यापार ही हो गई है। वर्तमान राजनीति का संचालन चंद उद्योगपति कर रहें हैं।
राजनीति में प्रलोभनयुक्त वादों और लोकलुभावन वादों का विज्ञापन किया जाता है।
बहुत से उ
त्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापनो upto 70% डिसकाउंट या एक पर एक फ्री का विज्ञापन ग्राहकों में अप्रत्यक्ष लालच पैदा करने जैसा है।
स्मरण रखना चाहिए कि,लालच बुरी बला होती है।
राजनीति का व्यापारीकरण होने के कारण पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में जो विज्ञापन किए जा रहें हैं। वे विज्ञापन अंधविश्वास को प्रोत्साहित करने वाले बाबाओं या झोलाछाप चिकित्सको के विज्ञापनों जैसे ही विज्ञापन प्रतीत होतें हैं।
जिसतरह झोलाछाप चिकित्सकों के पास सभी तरह की बीमारीयों का इलाज होता है,और बाबाओं के पास मनुष्य की सभी समस्याओं के समाधान के लिए टोटके होतें हैं?
इसीतरह राजनेताओं के पास विभिन्न तरह के झूठे वादें होतें हैं।
इसलिए हरएक नागरिक को तोलमोल के निर्णय लेना चाहिए।
व्यवहारिकता के साथ सजग होकर सोचना चाहिए। मतलब अपने सामान्यज्ञान का उपयोग करना चाहिए।
भगवान पर आस्था रखना और भगवान का नाम लेकर राजनीति करने में अंतर होता है।
इस संदर्भ में फ़िल्म उपकार की ये गीतकार इंदिवरजी रचित ये पंक्तियां प्रासंगिक होंगी।
कसमें वादे प्यार वफ़ा
सब बातें है बातों का क्या
सियासत करने वाले तेरे बनकर
तेरा ही दिल तोड़ेंगे
देते हैं भगवान को धोखा
इंसान को क्या छोड़ेंगे

इसलिए कोई भी निर्णय गहराई से सोच समझकर ही लेना चाहिए।
बार बार इस कहावत को चरितार्थ होने से बचना चाहिए।
अब पछताये होतक्या जब चिड़िया चुग गई खेत

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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