डॉ. विकास मानव
_हम सदैव कुछ-न-कुछ देखते रहते हैं, लेकिन ठीक से उसे न तो देख ही पाते हैं और न समझ ही पाते हैं। अब 'सत्य' को ही लेलें। सत्य एक धारणा मात्र है--एक मौखिक धारणा। उसे किसी भी विधि से, किसी भी कीमत पर प्रमाणित नहीं कर सकते। बुद्धि तो हमारी वहीँ तक साथ दे सकती है, जहाँ तक वह जानती है और सिद्ध कर सकती है। लेकिन मनुष्य के जीवन में कभी ऐसी स्थिति भी आ जाती है जहाँ छलांग लगाकर बोध के उच्चतर स्तर तक पहुँच जाती है।_
इस स्थिति को 'आन्तर्ज्ञान' या 'सहजोपलब्धि' कुछ भी कह सकते हैं। परन्तु उसको प्रमाणित कर सकना सम्भव नहीं। इस संसार के अधिकांश आविष्कार ऐसी ही स्थिति में सम्भव हो सके हैं।
इतना ही नहीं, वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद, योग, तन्त्र आदि से सम्बंधित ज्ञान-विज्ञान का भी आविर्भाव भी इसी रहस्यमयी स्थिति द्वारा हुआ है। महान् वैज्ञानिक आइंस्टीन ने भी इसे स्वीकार किया है।
उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसी स्थिति अवश्य आती है जहाँ केवल आन्तर्ज्ञान के द्वारा वह अनुभूति प्राप्त कर् सकता है जो मात्र ज्ञान द्वारा सम्भव नहीं और जिसका कोई हल ज्ञान-विज्ञान प्रस्तुत नहीं कर सकता।क्या है रहस्यमयी स्थिति ?
वह रहस्यमयी स्थिति है–‘तुरीयातीत अवस्था’। आत्मा की तीन अवस्थाएं हैं–जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। सुषुप्ति जब गहन से गहन हो जाती है तो उस अवस्था को ‘तुरीयावस्था’ कहते हैं।
आत्मा की यह चौथी अवस्था है जिसमें पहले की तीनों अवस्थाएं लीन हो जाती हैं। उन अवस्थाओं का एक प्रकार से प्रणाश (अन्त) हो जाता है। जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति ‘मायाराज्य’ के अंतर्गत हैं। जागृत अवस्था का सम्बन्ध स्थूल शरीर से, स्वप्नावस्था का सम्बन्ध वासना शरीर से और सुषुप्ति अवस्था का सम्बन्ध सूक्ष्मशरीर से समझना चाहिए।
जागृत अवस्था में आत्मा का कार्य-क्षेत्र भौतिक जगत् है, स्वप्नावस्था में कार्य-क्षेत्र होता है वासना-जगत्। इसी प्रकार सुषुप्ति अवस्था में उसका कार्य-क्षेत्र होता है–सूक्ष्म जगत।
सूक्ष्म शरीर द्वारा आत्मा सूक्ष्म जगत् में विचरण करती है, उसी प्रकार जैसे स्थूल शरीर से स्थूल जगत् में विचरण करती है। सुषुप्ति जितनी गहरी होगी, उतना ही सूक्ष्म शरीर अधिक शक्तिशाली और क्रियाशील होगा।
दो उच्च अवस्थाएं : तुरीय अवस्था और तुरीयातीत अवस्था
सहज समाधि की अवस्था में साधक या योगीगण गहन सुषुप्ति को उपलब्ध् होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा माया-राज्य में इच्छानुसार भ्रमण करते हैं।
अपनी प्रबल इच्छा-शक्ति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर तत्काल पहुँच जाते हैं। उन्हें इस भ्रमण से जो ज्ञान और अनुभव प्राप्त होता है, वह अपने आप में विशिष्ट होता है।
माया-राज्य के ऊपर महामाया-राज्य है। मायाराज्य के अधिष्ठात्र देवता ‘शिव’ हैं और अधिष्ठात्री देवी ‘काली’ हैं। महामाया-राज्य में आत्मा की दो अवस्थाएं है–तुरीया अवस्था और तुरीयातीत अवस्था।
महामाया-राज्य के अधिष्ठात्र देवता ‘सदाशिव’ हैं और अधिष्ठात्री देवी ‘तारा’ हैं। तुरीया अवस्था में आत्मा मनोमय शरीर द्वारा मनोमय जगत् में विचरण करती है। यहीं साधक को अपने सद्गुरु के दर्शन होते हैं। दर्शन के बाद सद्गुरु आशीर्वाद प्रदान कर अपने लोक में चले जाते हैं। योग की यह उच्चावस्था होती है।
इसके पश्चात है तुरीयातीत अवस्था। आत्मशरीर आत्मा का निज शरीर है। इस शरीर द्वारा आत्मा आत्मलोक में विचरण करती है। आत्मलोक परम ज्ञान-विज्ञान का क्षेत्र है। महामाया-राज्य के ऊपर है परम निर्वाण-भूमि जिसे हम ‘मोक्ष’ की संज्ञा दे सकते हैं।
इसके बाद है–परमशून्य जिसे हम परमात्मा का विराट निराकार स्वरूप कह सकते हैं।
साधना की शुरुआत करने की दिशा में साधक को सर्वप्रथम आसन, प्राणायाम और ध्यान की आवश्यकता होती है। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ प्राण और स्वस्थ मन--ये तीनों योग-तन्त्र की मूल भित्ति हैं लेकिन दुःख और खेद का विषय यह है कि सुयोग्य गुरु के अभाव में तीनों का स्वरूप विकृत हो चुका है।
_जो गुरु दिखाई भी पड़ते हैं, वे या तो गुरु के नाम पर छलावा होते हैं या फिर ढोंगी, पाखण्डी और आडम्बरी जो अपने- आपको इस तरह दिखाते हैं जैसे कोई महासाधक हों, दिव्यपुरुष हों।_
आसन का सम्बन्ध शरीर की साधना से है क्योंकि बिना शरीर को साधे कुछ भी सम्भव नहीं है। प्राणायाम का सम्बन्ध प्राण से है। इसी प्रकार मन का सम्बंध ध्यान से है। जैसा कि मैं बार-बार इस तथ्य पर जोर देता रहता हूँ कि प्राण के सधने पर ही ध्यान में सफलता मिलती है।
_प्राणायाम भी दो प्रकार का होता है--बाह्य प्राणायाम जिसमें प्राणायाम के स्थूल प्रकार देखने को मिलते हैं। और आन्तर प्राणायाम जिसे सूक्ष्म प्राणायाम भी कह सकते हैं। बाह्य प्राणायाम के माध्यम से शरीर में प्राणवायु (ऑक्सीजिन) की प्रचुरता और कार्बन डाई ऑक्साइड की न्यूनता हो जाती है जिससे आन्तर प्राणयाम में सहज उपलब्धता हो जाती है साधक की।_
आन्तर प्राणायाम के विधिपूर्वक किये जाने से श्वास-प्रश्वास अर्थात् प्राण और अपान में संतुलन आ जाता है जिसके फलस्वरूप शरीर में एक विशेष् प्रकार की विद्युत् शक्ति का संचार होना शुरू हो जाता है। ध्यान का सम्बन्ध मन से है। आन्तर प्राणायाम और आन्तर ध्यान के परिणामस्वरूप प्राण और मन दोनों एक साथ संयुक्त हो जाते हैं।
_अच्छी प्रकार अभ्यास हो जाने पर कुछ समय बाद दोनों की संयुक्त स्थिति होने पर वह रहस्यमयी स्थिति स्वयं उपलब्ध् हो जाती है जिसे योग की भाषा में 'तुरीयातीत अवस्था' कहते हैं। तुरीयातीत अवस्था में हृदय की धड़कन धीरे-धीरे शून्य होती जाती है लेकिन हृदय आतंरिक रूप से अपना काम करता रहता है। श्वास-प्रश्वास की गति भी शून्य हो जाती है जो चलती हुई प्रतीत नहीं होती है।_
शरीर में तापमान बना तो रहता है लेकिन रक्त-संचार की गति धीमी हो जाती है। मस्तिष्क में रक्त-संचार का वेग बढ़ जाता है और तभी समाधि घटित हो जाती है। इस समाधि की गहन स्थिति में काल की सीमा का अतिक्रमण हो जाता है।पल भर में भूत, भविष्य और वर्तमान की सारी अनुभूतियां साकार हो उठती हैं। समय की गति रूक जाती है। इस स्थिति में आत्म-साक्षात्कार होता है, लेकिन फिर भी ‘मैं’ का बोध बराबर बना रहता है, मैं का अस्तित्व कभी भी, किसी स्थिति में नहीं मिटता।
जिस क्षण साधक के ‘मैं’ का अस्तित्व-बोध समाप्त हो जाता है, उसी क्षण वह निर्वाण को हो जाता है उपलब्ध्। निर्वाण कोई उपाधि नहीं है, मोक्ष भी कोई उपाधि नहीं है। यह तो आत्मा की एक परम अवस्था है। और ऐसा भी नहीं है कि मोक्ष और निर्वाण अवस्था को उपलब्ध् साधक, सिद्ध योगी संसार में नहीं रह सकता।
रह सकता वह इस संसार में, मगर वह ‘वह’ नहीं रहता जो पहले था। वह संसार-समाज में रहता तो है लेकिन बिलकुल निरपेक्ष होकर, निर्लिप्त होकर। ऐसा व्यक्ति ही जीवन्मुक्त कहलाता है। भगवान् बुद्ध ने ऐसा जीवन्मुक्त जीवन अनेक वर्षों तक बिताया था। ऐसा व्यक्ति कर्म तो वही सब करता रहता है, लेकिन कर्म करने का उद्देश्य और निमित्त बदल चुका होता है उसका।
वह कर्म करते हुए भी कर्म नहीं करता और कर्म न करते हुए भी कर्म करता रहता है। उसकी मति-गति कोई संसारी समझ ही नहीं सकता। वह शरीर से संसार में रहते हुए भी इस संसार से परे की दुनियां में रहता है।
(लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं).





