शिवानी सिंह (इंदौर)
_एक आदमी जिन्दगी में कितने पाप कर सकता है? अगर मैं हिसाब लगाऊं तो जितने पाप किए होंगे, कल्पना में सोचे होंगे, अगर सबका भी...कोई सख्त से सख्त मजिस्ट्रेट से फैसला करवाऊं, तो भी पांच-सात साल से ज्यादा सजा मिलनी मुश्किल है।_
दस-पांच साल की सजा होगी, सौ साल की सजा होगी, लेकिन धर्म में इटरनल कंडेमनेशन! अनंत काल तक नर्क में पड़े रहना! जरूर किन्हीं दुष्ट मनों की, किन्हीं बहुत वाइलेंट, किन्हीं हिंसक मनों की ये कल्पना है।
लेकिन जो आदमी भी सुख की खोज करता है, वह आदमी हिंसक होता ही है। क्योंकि उसके भीतर होता है दुख, उसके भीतर होती है परेशानी, उसके भीतर होती है अशांति--और सुख की वह खोज करता है। लेकिन भीतर इतना बेचैन, अशांत, परेशान और दुखी होता है कि वह कभी किसी दूसरे को सुख में नहीं देख सकता।
_दूसरे को सुख में देखना उसे कठिन हो जाएगा। वह तत्क्षण दूसरे के सुख को मिटा देना चाहेेगा। चाहेगा कि मुझे सब मिल जाए, और से सबका सब छीन जाए।_ये जो दोष क्राइस्ट को जिस दिन सूली दी गई, उस दिन उनके सारे शिष्य उनके पास इकट्ठे थे। और उन शिष्यों ने क्राइस्ट से पूछा कि यह खतरा मालूम होता है कि शायद आप पकड़ लिए जाएं और आपको सूली दे दी जाए, तो कृपा करके ये तो बता दें कि हमने जो आपके साथ इतनी तकलीफें सहीं, मरने के बाद स्वर्ग में हमारी पद-प्रतिष्ठाएं क्या होंगी?
आपको पता है ये क्राइस्ट से उनके शिष्यों ने पूछा कि अब आप कल अगर मर गए, तो कम से कम इतना तो आश्वासन दे दें कि जब आप मर जाएंगे और जब हम भी मर कर स्वर्ग में आएंगे, तो कौन कहां बैठेगा? परमात्मा के आस-पास किसकी क्या व्यवस्था होगी? किसका क्या पद होगा?
ये कैसे लोग रहे होंगे! और क्राइस्ट के मन को कैसा नहीं लगा होगा, कैसी दया नहीं आई होगी, कैसे पागल लोग! जो कहते हैं हमने इतना छोड़ा, हमने इतना खोया, आपके पीछे इतनी तकलीफें उठाईं।
वह जो आदमी गहरी भूख से मर रहा है, उपवास कर रहा है, शरीर को कष्ट दे रहा है, ऐसे फकीर हुए हैं शरीर को कोड़े मार रहे हैं जिंदगी भर–क्योंकि ये खयाल है कि शरीर को जितना सताओगे, परमात्मा उसके प्रतिफल में उतना ही परलोक में सुख देगा–ये सब सुखवादी हैं, ये सब मैटीरियलिस्ट हैं, ये सब हैडोनिस्ट हैं, ये सब के सब सुख की खोज कर रहे हैं।
ये उस जगत में सुख की व्यवस्था करने के लिए तकलीफें झेल रहे हैं। यह तकलीफ वास्तविक नहीं है। यह तपश्चर्या झूठी है।
तपश्चर्या तभी वास्तविक है जब वह सुख की खोज के लिए न हो, बल्कि दुख के मूल कारण मिटाने के लिए हो। जब वह दुख के भीतर से मूल कारण नष्ट करने के लिए हो तो सबसे पहली जरूरत तो यह है कि हम यह जान लें और यह पहचान लें कि चाहे इस लोक में, चाहे परलोक में सुख की जो आकांक्षा है–वही भटकाने वाला तत्व है, वही भ्रांत दिशा में ले जाने वाला खयाल है।
क्यों है भ्रांत दिशा में ले जाने वाला! भ्रांत दिशा में ले जाने वाला इसलिए नहीं है कि दूसरों ने कहा है, शास्त्रों ने कहा है, आदमियों ने कहा है, गुरुओं ने कहा है–इसलिए नहीं।
(लेखिका चेतना विकास मिशन की संयोजिका हैं.)





