डॉ. विकास मानव
_मानव जीवन चार अलग-अलग वस्तुओं का संयोग है--शरीर, मन, प्राण और आत्मा का। शरीर के मृत हो जाने पर एक-एक कर् दश प्राण शरीर से निकल जाते हैं और मन आत्मा में लीन हो जाता है।_
पहले चेतन मन अचेतन में फिर अचेतन मन आत्मा में विलीन हो जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के बाद भी 'स्व' का बोध अर्थात् 'मैं' का बोध बराबर बना रहता है। जीवन-काल में शरीर और प्राण वर्तमान में, मन अतीत में और आत्मा भविष्य में रहती है। इसी के फलस्वरूप हमें भविष्य का संकेत दे देती है, यह अलग बात है कि यह संकेत स्पष्ट न हो--आत्मा की अपनी संकेतों की भाषा हो।
_कई बार हमें जो पूर्वाभाष हो जाता है, वह आत्मा की ओर से किया गया संकेत ही होता है। आत्मा की अपनी एक स्वतंत्र इन्द्रिय है जिसे 'छठी इन्द्रिय' (sixth sense) कहते हैं। योग में इसी को 'आज्ञाचक्र' कहा जाता है। इसका द्वार है--'तीसरा नेत्र' (third eye)।_
यह भ्रूमध्य पर होता है। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ--आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा क्रमशः दृष्टि, श्रवण, गन्ध, स्वाद और स्पर्श के प्रति संवेदनशील हैं। इनके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन की हर क्रिया का संचालन अपनी पांच कर्मेंद्रयों-हाथ, पांव, मुख, लिंग और गुदा द्वारा करता है। लेकिन जहां तक भविष्य का सम्बन्ध है, उसकी सूचना देने में इन्द्रियाँ असफल हैं, असमर्थ हैं।इन इन्द्रियों द्वारा किसी भी प्रकार का पूर्वाभाष संभव नहीं है। हाँ, मन जो ग्यारहवीं इन्द्रिय है–वह उभय इन्द्रिय है यानि वह ज्ञानेन्द्रिय भी है और कर्मेन्द्रिय भी। वह अतीत में चली जाती है, स्वप्नों में, स्मृतियों के माध्यम से विचरण करती रहती है।
लेकिन छठी इन्द्रिय के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों का मत है कि यह कोशिकाओं के एक छोटे समूह के रूप में ललाट पर विद्यमान है जिसका आकार जौ की तरह है। साधारणतया यह इन्द्रिय सक्रिय नहीं रहती। हाँ, विशेष् अवस्था में यह सक्रिय हो जाती है।
योग में इसका सर्वाधिक महत्व है। जब यह इन्द्रिय सक्रिय होती है तो इसके समक्ष संपूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड भी छोटा पड़ जाता है। वैज्ञानिकों को छठी इन्द्रिय या तीसरा नेत्र के जानने-समझने और उसके रहस्योद्घाटन करने में बहुत समय लगेगा।
परन्तु जहाँ तक योग-तन्त्र का सम्बन्ध है, हमारे ऋषि, मुनि तो कई हज़ार वर्ष पूर्व ही इसका रहस्योद्घाटन कर चुके हैं।
पांच ज्ञानेन्द्रियों की जो शक्ति है, वह मन की ही शक्ति है। मन से ही ये सभी इन्द्रियाँ कार्य करती हैं। मनःशक्ति द्वारा एक समय में एक ही इन्द्रिय कार्य कर सकती है, दूसरी नहीं। गहन सुषुप्ति अवस्था में इन्द्रियों से मन का सम्बन्ध समाप्त हो जाता है। उस समय स्वयम् मन ही सभी इन्द्रियों का कार्य करता है। मन का एक रूप और है और वह है–अचेतन मन। जिसे हम ‘मन’ कहते हैं, वह साधारणतया चेतन मन होता है।
चेतन मन और आत्मा के बीच अचेतन मन कार्य करता है। जैसे चेतन मन अचेतन मन का एक महत्वपूर्ण अँग है, उसी प्रकार अचेतन मन आत्मा का महत्वपूर्ण अंग है। आत्मा जो परमात्मा का अंश है, परमात्मा की तरह ही कालातीत है। सभी अवस्था में वह समान है। अचेतन मन आत्मशक्ति को एक सीमा तक क्रियान्वित करता है और यही कारण है कि वैज्ञानिक लोग अचेतन मन को अलौकिक शक्तियों का भंडार कहते हैं जो काफी हद तक उचित भी है।
जब कभी हम ऐसी विशेष् स्थिति में अचानक आ पड़ते हैं, जब दो क्षणों के बीच का समय होता है तो उस समय हमारे चेतन मन से आत्मा का सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इसी सम्बन्ध के परिणामस्वरूप हमें भविष्य के बारे में पूर्वाभाष हो जाता है।
चेतन मन का सम्बन्ध लौकिक जगत् से और अचेतन मन का सम्बन्ध समूचे पारलौकिक जगत् से है। योगिगण ध्यानयोग के द्वारा चेतन मन की शक्ति को क्षीण कर लेते हैं, फलस्वरूप अचेतन मन तथा आत्मा से उसका सीधा संपर्क जुड़ जाता है।
_योग का जो चमत्कार है, वह योगी के अचेतन मन का कौतुक होता है। आत्मा से सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण योगीगण लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करते हैं और पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।_(मनोचिकित्सा और मेडिटेशन के लिए निःशुल्क सुलभ लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं)





