मुनेश त्यागी
भारत के क्रांतिकारी इतिहास में मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा सबसे पहले दिया था। इसी के साथ उन्होंने संपूर्ण आजादी का नारा भी दिया था। इन दोनों नारों को भारत के क्रांतिकारी आंदोलन ने अपनाया और इन्हें जनता के नारे बनाएं और क्रांतिकारी ताकतों को, उनके इर्द-गिर्द इकट्ठा किया। बाद में 1929 में कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में संपूर्ण आजादी का नारा अपनाया।
इंकलाब जिंदाबाद के नारे को भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और विजय कुमार ने 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में पर्चा फेंकते वक्त लगाया था और हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों ने भारत के आजादी के आंदोलन और भारत के क्रांतिकारी इतिहास में सबसे पहले इस नारे का इस्तेमाल किया था।
उसके बाद से आज तक यह नारा भारत का के किसानों, मजदूरों, नौजवानों, विद्यार्थियों और संघर्षरत जनता का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाला नारा बना हुआ है। इसका आज भी कोई सानी नहीं है।
हालांकि इंकलाब का नारा सबसे पहले फ्रांसीसी क्रांति में इस्तेमाल किया गया था मगर भारत में "इंकलाब जिंदाबाद" के नारे का इस्तेमाल और रचना सबसे पहले 1921 में मौलाना हसरत मोहनी ने किया था और तभी से भारत की क्रांतिकारी और संघर्षरत ताकतों का यह सबसे प्यारा, सम्मानित और क्रांतिकारी नारा बना हुआ है।
भारत और पूरी दुनिया में क्रांतिकारी शक्तियां और संघर्षरत ताकतें, अपनी बुनियादी समस्याओं को पाने के लिए जो नारा इस्तेमाल करती हैं उनमें सबसे ज्यादा "इंकलाब जिंदाबाद" यानी "Long live Revolution" का नारा ही बुलंद किया जाता है, इसलिए यह नारा आज भी क्रांतिकारी दुनिया का सबसे बुलंद नारा बना हुआ है और जो ताकतें इस नारे को लगाती हैं वे अपने को धन्य समझती हैं, अपने को अहोभाग्य समझती हैं, अपने को क्रांतिकारी समझती हैं और उन्हें जनता भी क्रांतिकारी मानती है।
भगत सिंह और उनके साथी जब उन पर चल रहे मुकदमे को लेकर अदालत में आते थे तो उनके साथी जो मुख्य नारे लगाते थे उनमें पहला था "इंकलाब जिंदाबाद" और दूसरा था "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद"। भगत सिंह और उनके साथियों को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने इस नारे को लोकप्रिय बनाया और इसे साम्राज्यवाद के रूप में विकल्प बनाया और इसे क्रांतिकारी और समाजवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में पेश किया। इसके बाद से ही भारत में क्रांतिकारी व्यवस्था कायम करने के लिए किसानों मजदूरों का यह प्रमुख नारा बन गया और आज भी उनका यह प्रमुख नारा बना हुआ है।
क्रांति और इंकलाब जिंदाबाद से, हिंदुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों का अभिप्राय था कि एक ऐसी व्यवस्था कायम की जाए जो मार्क्सवादी सिद्धांतों पर आधारित हो, जिसमें किसानों मजदूरों का राज हो, जिसमें सामाजिक, राजनीति की और आर्थिक आजादी हो और जनता में समता, समानता, बराबरी, भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता की भावना हो और पूरी व्यवस्था समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित हो।
भगत सिंह और हिंदुस्तानी समाजवादी गणतंत्र संघ के उनके तमाम साथी एक ऐसे ही समाज का निर्माण करना चाहते थे और ऐसे ही समाज का निर्माण करने के लिए वह शोषण, अन्याय, जुर्म, भेदभाव, ऊंच-नीच, छुआछूत, ऊंच नीच और छोटा बड़ा वाली सोच, संस्कृति और मानसिकता को बदलना चाहते थे और एक ऐसा समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसमें सबको रोटी मिले, सबको रोजी मिले, सब को घर मिले, सब को रोजगार मिले, सबको समता, समानता और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी मिले, समाज में भाईचारा कायम हो, समाज में सब मिलजुल कर रहें और समाज सांप्रदायिकता और जातिवाद के घुन और कैंसर से मुक्त हो, जिसमें ना अन्याय हो, ना शोषण हो, जिसमें ना गरीबी, हो ना अमीरी हो,ना भुखमरी हो, ना नग्नता हो, सब सुखी हों, सब खुश हों, पंचायती राज हो और प्राकृतिक संसाधनों पर सारे समाज का अधिकार हो और उनका प्रयोग पूरी जनता यानी किसानों मजदूरों और मेहनतकशों के विकास के लिए, उसकी बढ़ोतरी के लिए और उन सबकी प्रगति के लिए किया जाए।
भगत सिंह और उनके साथियों के बाद इंकलाब जिंदाबाद का नारा भारत के किसानों, मजदूरों, नौजवानों, विद्यार्थियों, संघर्षशील जनता और क्रांतिकारी समाज की स्थापना करने वाले लोगों, का मुख्य नारा बना हुआ है। इसी नारे की रचना 1921 में मौलाना हसरत मोहनी ने की थी और इसको जनता में फैलाने प्रचार-प्रसार करने का काम हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्यों के हिस्से में आया और शहीदे आजम भगत सिंह के नेतृत्व में उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल किया और उसे भारत की जनता का मुख्य नारा बना दिया। इंकलाब जिंदाबाद, समाजवादी समाज और मार्क्सवादी आदर्शों पर आधारित समाज से हमारा यही तात्पर्य है, यही अभिप्राय है।
हालांकि पूंजीवादी, जातिवादी, सामंतवादी, संप्रदायवादी और भ्रष्टाचारी ताकतों को इस नारे से बहुत नफरत है। वे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाने वाली ताकतों को पसंद नहीं करते, उनसे नफरत करते हैं और उनको नेशनाबूद करना चाहते हैं, उनको मठियामेट करना चाहते हैं। इसलिए यह नारा कभी भी उनकी सोच और मानसिकता का नारा नहीं बन सका है। वे आज भी इससे बेजा नफरत करते हैं।
इंकलाब जिंदाबाद के नारे को सही अर्थों में, सही मायनों में, आज जमीन पर उतारने की जरूरत है। इसको किसानों, मजदूरों और मेहनतकशों समेत सारी उत्पीड़ित, शोषित, अन्यायग्रस्त, अभावग्रस्त, दलितों, वंचितों और आदिवासियों का नारा बनाने की जरूरत है। केवल यही नारा उन सबकी किस्मत बदल सकता है, उनका विकास कर सकता है और उनको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुढ़ापे की पेंशन का इंतजाम कर सकता है और इस देश में नए क्रांतिकारी समाजवादी समाज की यानी इंकलाबी समाज की स्थापना कर सकता है और हिंदुस्तान को शहीदों के सपनों का, राजगुरु सुखदेव भगत सिंह बिस्मिल के सपनों का, गांधी नेहरू सुभाष और अंबेडकर के सपनों का, भारत बना सकता है।




