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चावल : एक अद्भुत प्राचीन औषधीय गुणों से सम्पन्न अन्न 

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निर्मल कुमार शर्मा

गेहूं के साथ चावल भी भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का पसंदीदा और एक बहुत ही लोकप्रिय भोज्य पदार्थ रहा है और अभी भी है । कृषि वैज्ञानिकों और पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार चावल या धान का उद्गम स्थल भारत के पूर्वोत्तर भूभाग,दक्षिणपूर्व एशिया या चीन को माना जाता है । जहां तक भारत की बात है आपको जानकर बहुत ज्यादे आश्चर्य जनक प्रसन्नता होगी कि मौर्यकाल में भारत आए एक यूनानी यात्री मेगास्थनीज द्वारा लिखी गई उनकी सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक विवरण पुस्तिका ‘ इंडिका ‘में वर्णित तथ्यों के अनुसार उस समय भारत में धान या चावल की 2लाख किस्में यहां के किसान उगाया करते थे, लेकिन कितने दु:ख की बात है कि मानव अपने विकास के साथ प्रकृतिप्रदत्त तमाम फसलों की तमाम विविध तरह के किस्मों को तेजी से तबाह करने का काम किया है ! उदाहरणार्थ इंडिका में वर्णित मौर्य साम्राज्य के समय में 2लाख धान की किस्मों में से आज वर्तमान समय में भारत में केवल 2 हजार किस्में ही बची रह पाईं हैं !
पुरातात्विक वैज्ञानिकों के अनुसार मौर्यकाल में चावल की उन्हीं किस्मों को सबसे बेहतरीन और पौष्टिक आहार माना जाता था,जो शरद् ऋतु में पैदा होती थीं,शरद्ऋतु में पैदा हुए इस बढ़िया चावल को ‘महाशाली ‘के नाम से पुकारा जाता था। शाब्दिक रूप से सर्दियों में पैदा होनेवाली चावल की सभी किस्मों को ‘शाली ‘ के नाम से पुकारा जाता था,उस समय वह सामान्यतः गर्मियों और वर्षा के दिनों में पैदा हुए चावल से तुलनात्मक रूप से सर्दियों में पैदा हुए चावल को उन्नत किस्म का माना जाता था, इस चावल की प्रसिद्धि ‘महाशाली ‘के नाम से उस समय सर्वजन में प्रसिद्धि थी। हालांकि ‘महाशाली ‘ चावल एक मोटे अनाज के रूप में ही जाना जाता था इसके बावजूद उस समय इसे अति विशिष्ट समझा जाता था ! उस समय इस चावल का इतना महत्त्व था कि यह मौर्यकाल में भारत की सत्ता पर काबिज मौर्यवंशीय राजाओं की वैभवशाली और भारतीय राष्ट्र राज्य की शक्ति की प्रतीक राजधानी पाटलिपुत्र जिसे वर्तमान समय में पटना कहते हैं, के राजघराने के विशिष्ट लोग और उनके विशिष्ट अतिथियों की थाली में यही महाशाली चावल ही शोभा बढ़ाता था ! इसके अलावा उस समय चावल के एक और औषधीय गुणों वाले चावल को भारत में उगाया जाता था,जो हल्का सा गुलाबी रंग का होता था, इसीलिए तत्कालीन समय में इस चावल को रक्तशाली चावल कहा जाता था । ज्ञातव्य है यह रक्तशाली चावल उस समय बहुत सी लाईलाज बीमारियों से निदान के लिए रामबाण इलाज के तौर पर भी प्रयोग किया जाता था !
इंडिका नामक अपनी सुप्रतिष्ठित ऐतिहासिक पुस्तिका में मेगास्थनीज ने इस बात को विस्तार से बताया है कि उस समय के लोग अपने मेहमानों को खाना खिलाते समय उनके सामने एक तीन पाए का एक मेजनुमा स्टूल रखकर,उसी पर खाना परोसते थे,विशेषकर उसी तीन पैरों वाले मेज पर अपने घर में पकाकर विभिन्न तरह के सुगंधित,सुस्वादु व पौष्टिक चावलों से भरे हुए कटोरे परोसते थे !ठीक उसी तरह जैसे आज के आधुनिक युग में जापान और कोरिया में ‘बुद्धा बाउल्स ‘या ‘राइस बाउल्स ‘ में भिन्न – भिन्न तरह के व्यंजन परोसे जाते हैं ! यही तरीका आज वैश्विक तौर पर फाइल स्टार होटलों तक में बहुत ही लोकप्रिय है !
मौर्यकालीन समय के बहुत बाद करीब एक हजार साल बाद 10 वीं शताब्दी में दक्षिणी भारत में चावल पकाने और उन्हें खाने की विधियां बहुत विस्तृत रूप से उनके संगम साहित्य में वर्णित हैं। दक्षिण भारत में प्रायः चावल को शाम को पकाकर उसे रातभर पानी में भिगो दिया जाता था और उसी चावल को अगले दिन सुबह खाने की परंपरा थी,हालांकि इस प्रकार के चावल को उत्तर भारत के लोग खाना पसंद नहीं करते थे ! लेकिन चिकित्सा और खाद्य तथा पोषण विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार एक दिन पूर्व पकाकर उसे पानी में भिगो कर अगले दिन खानेवाले बासी भात या किण्वित चावल में प्रोबायोटिक चावल के गुणों से सम्पन्न गुणों वाला माना जा सकता है,जो मनुष्य के पाचन और स्वास्थ्य दोनों ही दृष्टिकोणों से सर्वोत्तम माना जाता है !
इस लेख के प्रथम पैरा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और हतप्रभ करने वाली बात बताई गई है कि आज से लगभग 2400 वर्ष पूर्व मौर्यकाल में ( 321से 185 ईसापूर्व ) में भारत में चावल या धान की लगभग 2लाख किस्में यहां के किसान उगाया करते थे,लेकिन कितने दु:ख और अफसोस की बात है कि मानव अपने विकास के साथ प्रकृतिप्रदत्त तमाम फसलों की तमाम विविध तरह के किस्मों को तेजी से तबाह करने का काम भी किया है ! उदाहरणार्थ इंडिका में वर्णित मौर्य साम्राज्य के समय में केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही 2लाख धान की किस्मों में थीं जिसमें से आज वर्तमान समय में भारत में केवल 2 हजार किस्में ही बची हुई हैं ! जाहिर है तत्कालीन मौर्यकाल में भारतीय भूभाग पर धान की दो लाख प्रकृतिप्रदत्त सभी किस्में अपनी तरह की विशिष्ट गुणों से सम्पन्न किस्में रही होंगी,लेकिन दुर्भाग्यवश मनुष्योचित्त छेड़छाड़ से उनमें से आज 1लाख अटृठानवें हजार किस्में इस धरती से ही तबाह हो गईं ! जो आज तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद कभी भी इस धरती पर पुनः लाकर उन्हें मानव समाज को उपलब्ध कराना पूर्णतया असंभव है ! लेकिन एक बात तो किया ही जा सकता है कि भारतीय भूखंड पर अभी भी 2हजार धान या चावल की किस्मों को यत्नपूर्वक बचाने की भरसक कोशिश होनी ही चाहिए,ताकि हमारी आने वाली भावी पीढ़ियों को अभी भी उपलब्ध कम से कम 2हजार चावलों की भिन्न-भिन्न स्वाद,सुगंध,पौष्टिकता और औषधीय गुणों से सम्पन्न धान्य को खाने से मरहूम न होना पड़े !

         -निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ', गाजियाबाद, उप्र,संपर्क - 9910629632,ईमेल - nirmalkumarsharma3@gmail.com

Ramswaroop Mantri

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