डॉ. गीता शुक्ला
_कामना, वासना, चाहत, इच्छा जैसे शब्द स्थूल रूप से एक ही अर्थ के पर्याय हैं._बृहदारण्य उपनिषद (१/२/१) कहता है कि ‘आत्मन्वी स्यामिति’ अर्थात् उस आत्मा ने यह इच्छा किया कि मै आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् (मन वाला) हो जाऊँ।
इसके पहले कहीं कुछ था ही नही. यह Universe मृत्यु (अशनाया) से आवृत्त था। यानी अन्न के बिना सबकुछ शून्य था. उस शून्य मे स्थित बीज ने ऐसी इच्छा की। इच्छा ही कामना है।
कामना थोड़े बहुत अंतर से चार प्रकार की होती है : इच्छा, कामना, वासना और स्पृहा। आत्मा असङ् (असङ्गो ह्यात्मा) होते हुए भी कामना कैसे कर सकती है?
सुक्ष्मातिसुक्ष्मं और चेतनोश्चेतनानां आदि जो अन्य श्रुतियाँ है, उनसे जान पड़ता है कि आत्मा ही चैतन् का महाचैतन्य है।
*पाश्चात्य विचारक देकार्ते का मत :*Soul has its principal seat in the little gland which is exists in the middle of the Universe, from whence radiates forth through all the the remainder of the Universal body.(Descartes page 374)
केनोपनिषद् की श्रुति १/१/१/ देकार्ते के उक्त कथन की यह कहकर पुष्टि करती है कि :
ओ३म् केनेषितं पतति मनः। केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति।
अर्थात् जिससे प्रेरित और इच्छित होकर मन, वाणी, प्राण, आँख और कान अपना-अपना कार्य्य करते हैं, वही आत्मा है।
अन्य श्रुतियों भी कहा है कि-येन भयात् सूर्य्यस्पति आदि। अर्थात् एक ईक्षण करनेवाली और प्रेरकत्व शक्ति हम सब के पीछे कार्य्य कराने का कारण विद्यमान है।
तो मनुष्य भी इसी प्रकार जो भी इच्छा, कामना, वासना और स्पृहा रखता है, उसका कारक भी Little glands मे विद्यमान वह शक्ति ही काम कर रही होती है।
अब सवाल यह उठता है कि काम को मारकर निष्काम कैसे हुआ जा सकता है?
जब सृष्टि का हेतु ही काम है तो इसे नष्ट करने का मतलब यह हुआ कि हम निष्चेष्ट हो जाएं.
तो थोड़ा गीता अध्याय३/५/ को देखते हैं :
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।
अर्थात् कोई मनुष्य किसी क्षण मे कर्म किए बिना नही रह सकता, क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृति के गुणों से परवश होकर कर्म करने के लिए बाध्य है।
जब तक कामना नही होगी तब तक कर्म नही हो सकता। इसलिए काम को मारना असंभव बात है, और प्रारब्धानुसार कर्म करनेके लिए ही मनुष्य शरीर मिला है।
हाँ प्रयास से इतना किया जा सकता कि लोकैषणा,पुत्रैषणा और वित्तैषणा से मुक्त हुआ जा सकता है. लेकिन तब, जबकि कर्तापन का अभाव हो। क्योंकि मनुष्य गुणों मे रहकर गुणों से अतीत नही हो सकता.
लेकिन इस शरीर से ज्ञानी सर्वथा अतीत होकर गुणातीत हो सकता है, वह भी ‘बहूनां जन्मनामन्ते.’ (७/१९) गीता।
(चेतना विकास मिशन)





