मुनेश त्यागी
पहले मैं देखा करता था एक जोडी,
सबके प्यारे सियाराम की जोडी,
जिसकी सौम्यता, सुंदरता और निश्छलता
से हो जाया करता था नतमस्तक।
अनायास ही आ जाता था
आस्था और श्रध्दा का भाव
उनके प्रति।
धीरे धीरे कुछ बदलता गया।
आजकल मैं देखता हूँ —-
एक “श्रीराम”
जो अलग कर दिया गया है सिया से
जो बना दिया गया है हथियारबंद,
जो दिखता है हिंसक, क्रुध्द और बेसब्र।
यह राम अलग है
सियाराम वाले राम से।
पहले रामलीलाओं में जय बुलती थी,,,
“जयसिया राम ।”
आजकल एक कानफोडू नारा
लगाया लगाया जाता है,,,,
“जय श्री राम। “
पहले सब का सा लगता था राम।
आजकल हथिया लिया है,
अपहरण कर लिया है,
कुछ लोगों ने राम का।
आज का राम दिखता है अलग
दशरथ के राम से,
यह नहीं मिलता जुलता है,
तुलसी के राम से।
आजकल झुंड के झुंड
“जय श्रीराम” का नारा लगाकर
फूंकते हैं घर बार
उजाडते हैं दुकानें
ढा देते हैं घर और झोपड़ियां
बिसमार कर देते हैं इबादतगाह।
पुराना राम, राम नहीं रहा अब
वह बन गया है “श्रीराम”
जिसके नारे लगा कर
किए जाते हैं दंगे
मार दिए जाते हैं बेगुनाह।
आजकल “श्रीराम” के नाम पर
लोग बन बैठे हैं सांसद विधायक मंत्री।
अब “श्रीराम” के नाम पर
हासिल की जाती है सत्ता और सरकार
जो बन बैठी है जनविरोधी।
आज का “श्रीराम”
बना दिया गया है चाकर
लुटेरों, दंगाइयों, हत्यारों और
मुनाफाखोर धन्ना सेठों का।
सबके राम को
बना दिया गया है
कुछ लोगों का “श्रीराम”।
मुझे डर लगता है-
इस “श्रीराम” से
यानि कुछ लोगों के “श्रीराम” से।





