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साहित्यकार की प्रेमिका के लिए पाथेय

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डॉ. प्रिया मानवी

_प्रेम जितना नन्हा, प्यारा, निर्मल शब्द है उतना ही गहन, व्यापक, पावन इसका अर्थ है। यूॅं भी प्रेमिका बनना आसान नहीं। प्रेम में विरह सदैव से ही समाहित रहा है। चाहे राधा-कृष्ण हो, हीर-रांझा या सोनी-महीवाल। इतिहास में वही प्रेम कहानियों ने अपनी जगह बनाई हैं जो पूरी होकर भी पूरी नहीं हुई।_
   प्रेमिका अविवाहित रहे या किसी की विवाहिता बने जीवन काटे, अनन्य पीड़ा से वो भी गुज़रती है, या यह कहना उचित होगा कि दोहरी भूमिका में हद से ज़्यादा पीसती है। आखिर हर किसी में अमृता प्रीतम सा बेबाकपन नहीं होता। 

तो यदि किसी लेखक या कवि की प्रेमिका बनी हो तुम, तो शत शत नमन है तुमको। क्योंकि ये पुरूष बाकी पुरूषों से अधिक अपने एहसासों को साझा करते हैं, संवेदनशील भी होते हैं और अनोखे भी।
तुम्हें अपनी रचना में बांधकर मनाना, इन्हें खूब आता है। तुम्हारी हर बात पर, हंसी पर, गुस्से पर, तुम्हारी ऑंखें, तुम्हारे हाथ, तुम्हारे हर अंग पर, तुम्हारी माथे की बिंदिया से लेकर पैरों के बिछिये तक ये सब पर रचना गढ़ सकते हैं। शृंगार रस में लिप्त वो कृति तुम्हें उनके प्रेम में डूब जाने को ही तो बनी होती है।
पर कई बार जब मन खाली होता है या कलम निद्रा मग्न होती है, तब, तब बहुत धीरज धरना पड़ता है। बहुत बार कही, अनकही बातों को, लिखी, अधलिखी, ना लिखी रचनाओं को अनदेखा करना पड़ता है। क्योंकि तब किसी भी छोटी सी बात पर तुनक जाना वाजिब होता है उनका।
पर कई बार यूं भी होता है कि लेखक की सबसे खूबसूरत रचना तुम्हारे लिए नहीं होती। वो बस तुमसे परामर्श करने के लिए सुनाई, दिखाई या पढ़ाई जाती है। तुम उसे अपना मान, मन ही मन मयूर नृत्य करने लगती हो और सच जानकर कभी गुस्से में भुनभुना जाती हो, कभी चुपचाप अपनी ईर्ष्या और दुःख को मंद हंसी में छुपा लेती हो। इसलिए आसान नहीं है लेखक से प्रेम निभाना।
यदि तुम उसकी दूसरी प्रेमिका हो, तब तो और बहुत कष्टों से निकलना होगा तुमको। दूसरी प्रेमिका मतलब, जब लेखक ने अपना पहला प्रेम खोया हो (चाहे जिस भी कारण से) और तुमने पुनः उसके हृदय को स्पंदित किया हो, तुमने उसकी मृतप्राय जीजिविषा को अपनी सौम्यता और सहजता से झंकृत किया हो तब तुम उसके जीवन का हिस्सा हो जाती हो।
यूं भी प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का पहला प्यार सदैव याद रखता है। तो तुम उसके जीवन की दूसरी प्रेमिका हो, तब उसकी लिखित हर विरह वेदना की रचना में तुम्हें दिखती है उसके पहले प्रेम की झलक, और ‘सिर्फ तुसको’ समर्पित रचना में तुम खोजती हो सत्यता को।
जब लेखक अपनी कहानी बुनता है, उसमें डूबता है, तब धीरे धीरे तुमको यह समझ आता है कि लेखक का जीवन, उसका अपना कम, उस समय अपने किरदारों का ज्यादा हो जाता है।
इसका मतलब ये नहीं कि तुम शिकायत ना करो या हमेशा तुम ही समझो।
उसका साथ दो, बहस करो, रूठो, उसकी कृतियों की समीक्षक बनो, उसकी कहानी की नायिका से ईर्ष्या भी करो, और इन सबके साथ प्रेम में कमी ना आने दो, आखिर लेखक की प्रेमिका हो तुम !!
{चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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