~डॉ. विकास मानव
(निदेशक : चेतना विकास मिशन)
यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके।
यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपोरिव ब्रह्मलोके॥
~कठोपनिषद. (२.३.५)
जिस प्रकार दर्पण में उसी प्रकार आत्मलोक में; जिस प्रकार स्वप्न में उसी प्रकार पितृलोक में; जिस प्रकार जल में परिछाई की भाँति दिखाई देता है; उसी प्रकार गन्धर्वलोक में; (तथा) छाया और धूप की भाँति ब्रह्मलोक में प्राप्त किया जाता हैं।
भावार्थ और तत्त्व विवेचन :
पूर्व श्रुतिमंत्र २.२.१४ में कुमार नचिकेता द्वारा की गयी जिज्ञासा कि- “मैं उस प्रकाशरूप को किस प्रकार भलीभाँति समझूँ अर्थात प्राप्त करूँ।” को पूर्ण करते हुए- ब्रह्मस्वरूप आत्मा को प्राप्त करने हेतु अविनाशी आत्मा के गुण-धर्म आधारित ‘कर्तास्वरूप’ को प्रकट करते हुए यमदेव द्वारा कथन किया गया है कि वह महान् आत्मा-
(१). ‘यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि’ अर्थात् “जिस प्रकार दर्पण में कोई अवयव अथवा कोई दृश्य सम्मुख अवस्था में जैसा है, वैसा ही देखा, जाना और प्राप्त किया जाता है; उसी प्रकार यह आत्मा अपने आत्मलोक में दिखाई देता और प्राप्त किया जाता है।
(२). ‘यथा स्वप्ने तथा पितृलोके’ अर्थात् जिस प्रकार स्वप्न में कोई अवयव अथवा कोई दृश्य मिथ्या और आभासी होकर भी यथार्थ रूपमें दिखाई देता है एवं तदनुसार जाना एवं प्राप्त (अनुभव) किया जाता है; उसी प्रकार यह आत्मा पितृलोक में दिखाई देता है तथा तदनुसार जाना और प्राप्त किया जाता है।
(३). ‘यथाप्सु परीव (परि+इव) ददृशे तथा गन्धर्वलोके’ अर्थात् “जिस प्रकार जल में स्थित कोई अवयव परिछाई रूपमें निकट दिखाई देता और प्राप्त किया जाता है; उसी प्रकार गन्धर्वलोक में यह आत्मा देखा एवं प्राप्त किया जाता है।
(४). ‘छायातपोरिव ब्रह्मलोके’ अर्थात् “ब्रह्मलोक में यह आत्मा छाया और ताप (प्रकाश) के समान पृथक्-पृथक् किन्तु एकरूप और परस्पर आश्रित अवस्था में देखा एवं प्राप्त किया जाता है।
इस प्रकार यहाँ इस कथन में पुरुषरूप जीवन-यात्रा के कुल चार लोक होना कथन किये गये हैं- आत्मलोक, पितृलोक, गन्धर्वलोक और ब्रह्मलोक।
अतः जिस प्रकार प्रणवनाद ओंकार को अपनी चतुष्पाद् अवस्था में अकार, उकार और मकार से युक्त जाना जाता है तथा प्रणवनाद के उद्गीथ उच्चारण में इन तीनों को लय अवस्था को प्राप्त करने और सदैव उपस्थित रहने वाला जाना जाता है; उसी प्रकार यह एक आत्मा ही अपने सर्वव्यापी चतुष्पाद् विराट् रूपमें पितृलोक, गन्धर्वलोक और ब्रह्मलोक अवस्था को धारण करता है तथा ये तीनों ही लोक सदैव इस आत्मा के अंग बने रहते हैं; ये इस अविनाशी सनातन आत्मा से पृथक् जाने जाते नहीं।
श्रुतिकथन है : यह आत्मा आनन्दमय है तथा उससे यह सम्पूर्ण पुरुषरूप परिपूर्ण है.
‘आत्माऽऽनन्दमयः। तेनेष पूर्णः।’
~तैत्तिरीय उपनिषद (२.५.१)
यह आत्मलोक ही ‘स्वलोक’ या ‘स्वर्गलोक’ रूपमें जाना गया है तथा स्वर्गलोक के जीवन को सदैव आनन्दमय और सुख से परिपूर्ण होना माना गया है । ‘स्वः’ व्याहृति इस स्वलोक या स्वर्गलोक को प्रकट करनेवाली जानी जाती है।
_कुमार नचिकेता द्वारा द्वितीय वरदान रूपमें स्वर्गलोक के सुखमय जीवन की आधारभूत ‘अग्नि विद्या’ का बोध प्राप्त किया गया है । यह ‘अग्नि विद्या’ सबको स्वर्गलोक का सुखमय जीवन प्रदान करनेवाली और मृत्युबोधरहित आनन्दमय आत्मलोक में स्थित करनेवाली है।_
चूंकि जगतरूप को अपनाकर वह हिरण्यगर्भ सद्स्वरूप परमात्मा सद् और असद् दोनों ही हो गया है- सदसद् च अभवत्।
देहधारी ‘अन्नरसमय पुरुष’ रूपमें वह सद् और असद् दोनों को अपनानेवाला हो गया है। इस उभयरूप अवस्था में वह स्वकर्म की शुक्ल और कृष्ण अवस्था को धारण करनेवाला हो गया है और कर्म की इस उभयरूप अवस्था में वह सद् की सत्ता को अपनानेवाला हो गया है।
इस जगत् में यह मनुष्य न चाहता हुआ भी असद् को अपनाने हेतु विवश किया हुआ सा स्वयं के द्वारा अनुभव किया जाता है। (गीता ३.३६)
_इस मनुष्यदेह में निवास करते हुए इस आत्म-रहस्य को, देहस्थ अङ्गुष्ठमात्र पुरुष के इस कर्ता और भोक्तास्वरूप को न जान पाना ही इस देहधारी पुरुषरूप (स्त्री-पुरुषरूप) के लिये इस अधोलोक में दुःखप्राप्ति और नाना सर्ग तथा नाना लोक में पुनः-पुनः जन्म-मृत्यु को प्राप्त करने का कारण बना हुआ है।_
अतः स्व-आत्मस्वरूप का बोध प्राप्तकर दिवसकाल की जाग्रतावस्था को धारण करने और सर्वनियन्ता परब्रहमस्वरूप परमात्मा को प्राप्त करने हेतु अब इन चारों ही बिन्दु पर किंचित् विस्तार से विचार किया जाता है।
प्रथम - यहाँ अव्यय सनातन आत्मा को- दर्पण में स्थित दृश्य की भाँति आत्मलोक में स्थित हो जाना कथन किया गया है- ‘यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि’ । कोई भी दर्पण अपनी अचल और स्थिर अवस्था में जो कुछ भी उसके समक्ष होता है या जो कुछ दर्पण के सम्मुख लाया जाता है; उसे ही वह बिना किसी संशोधन, संवर्धन या परिहार के अशरीर अवस्था में यथावत सम्मुख, निकट अवस्था में प्रकट कर देता है।
_इस कार्य में दर्पण किंचित्मात्र भी लिप्त होता नहीं । किसी प्रकार का कोई भेदभाव, पक्षपात या राग-द्वेष आदि विकार अपनाता नहीं; और न अपने इस स्व-कर्म के प्रति विरक्ति को ही अपनाता है । दर्पण के इस गुण-धर्म आधार पर देहस्थ अविनाशी अचल सनातन आत्मा के कर्ता ब्रह्मस्वरूप को तथा इस देहधारी पुरुषरूप द्वारा किये गये ‘कर्म एवं उसका फल सिद्धान्त’ को भलीभाँति सुगमतापूर्वक जाना जा सकता है; आत्मसात् (स्वीकार) किया जा सकता है।_
श्रुति द्वारा इस देहधारी पुरुषरूप को ब्रह्म, यज्ञ और लोक कहा गया है :
_‘त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति।’_
~बृहदारण्य उपनिषद (१.५.१७)
_तुम ब्रह्म हो, तुम यज्ञ हो, तुम लोक हो। तथा परमपुरुष परमात्मा को ‘असङ्ग पुरुष’ कहा गया है – ‘असङ्गो ह्यं पुरुष इति ।’ (बृह.उप. ४.३.१६) स्वयंप्रकाश आत्मा को नित्य, सर्वगत, स्थाणु (स्तम्भ, ठूँठ), अचल और सनातन होना प्रकट किया गया है- ‘नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।’ (गीता २.२४) तथा पूर्व श्रुतिमंत्र क्रमांक १.२.२२ में आये विवरण अनुसार अणुरूप, महान्, सनातन आत्मा को अशरीर अवस्था में सब प्राणियों (मनुष्यों) के पार्थिव नश्वर देहरूप में प्रवेश करके स्थित हो जाना कथन किया गया है- ‘अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्।’ (कठ.उप. १.२.२२) और देहस्थ आत्मा के ‘शरीरधारी कर्तापुरुषरूप’ को प्रकट करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता में आया आत्मपुरुष ब्रह्मस्वरूप वासुदेव श्रीकृष्ण का कथन है कि :_
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
~गीता (३.२२)
हे पार्थ ! मुझे इन तीनों ही लोकों में भूः, भुवः और स्वः व्याहृति आधारित तीनों ही लोक में) न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ।
स्पष्ट किया गया है कि
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ (गीता ४.११)
अर्थात् –जो मनुष्य जिस प्रकार जिस भाव से) मुझको भजते हैं; उनको मैं उसी प्रकार उसी भाव) से भजता हूँ। ‘हे पार्थ !’ सब मनुष्य, सब प्रकार से मेरे द्वारा किये गये आचरण का अनुसरण करते हैं।
इस प्रकार का यह जो सब प्राणियों (मनुष्यों) के नश्वर देहरूप में स्थित अमृतपुरुष अविनाशी सनातन आत्मा का गुण-धर्म और असङ्ग कर्ता-पुरुषरूप है; इसे दर्पण के गुण-धर्म और कर्तास्वरूप आधार पर सुगमतापूर्वक भलीभाँति जाना और नित्य-जीवन में अपनाया जा सकता है।
यह इस अधोलोक में अमृतपुरुष परमात्मा को प्राप्त करने का ‘चिर-पुरातन मार्ग’ है। श्रीमद्भगवद्गीता में आया निम्न उपदेश इसी बात का आख्यान करता है :
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचरः।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोतिपूरुषःII
~गीता (३.१९)
इसलिये तू आसक्ति से रहित होकर सदैव कर्तव्य-कर्म को भलीभाँति करता रह । आसक्ति से रहित अवस्था में स्वकर्म को करता हुआ यह पुरुष परमपुरुष परमात्मा को प्राप्त करता है।
यह निम्न गीतोक्त कथन भी इसी एक बात को प्रकट करता है कि- “इस मनुष्यलोक में यह पुरुष स्वकर्म से उत्पन्न सिद्धि को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है”- ‘क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ।’ (गीता ४.१२)
अतः “जब यह नश्वर देह-रूपको धारण करनेवाला देहधारी क्षरपुरुष इस अधोलोक में दर्पण की भाँति स्वकर्म की असंग अवस्था को अपनाता है, बहिर्मुख इन्दियों की भोगवृत्ति में तथा कर्म आधारित फलप्राप्ति में आसक्ति को अपनाता नहीं, तब यह संकल्परहित हुआ पुरुष अपने अशरीर आत्मा को, अक्षरपुरुष परमात्मा को प्राप्त हुआ ‘योगारूढ़’ कहा जाता है”-
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥ (गीता ६.४)
अविनाशी सनातन आत्मा को प्रकट करते हुए गुरुत्मान् वासुदेव श्रीकृष्ण का उपदेश है कि- “जिस प्रकार धूएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढंका जाता है”- ‘धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।’ (गीता ३.३८) उसी प्रकार इस पुरुषदेह में यह आत्मा स्थित हो गया है।
इस लोक में पाप और पुण्य दोनों ही धूम्रस्वरूप होते हैं । जिस प्रकार धुआँ अग्नि की उपस्थिति को प्रकट करता है किन्तु स्वयं अग्नि होता नहीं; वही अवस्था पुण्य और पाप दोनों की होती है।
“शुभकर्म (पुण्यकर्म) करने से यह आत्मा वृद्धि को प्राप्त करता नहीं और अशुभकर्म (पापकर्म) करने से यह घटता नहीं”- ‘न बर्धते कर्मणा नो कनियान् ।’ (बृह.उप. ४.४.२३) और “न यह पापकर्म से लिप्त होता है”- ‘न लिप्यते कर्मणा पापकेन ।’ (बृह.उप. ४.४.२३) यह अनश्वर आत्मा तो पुण्यकर्म (शुभकर्म) द्वारा पुण्यात्मा (साधु पुरुष) होता है तथा पापकर्म (अशुभकर्म) द्वारा यह पापात्मा होता है- ‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति ।’ (बृह.उप. ३.२.१३) एवं किये गये कर्म आधार पर यह पुण्यात्मा कहा जाता है, अथवा पापात्मा जाना जाता है।
इस प्रकार पुण्य और पाप ये दोनों ही निष्कल (कलाओं से रहित), निर्दोष, निर्मल, शान्त, ज्योतिर्मय परमपद प्रदान करते नहीं तथा नित्य-जीवन में ‘षड् विकार’ – काम, क्रोध, मान, मोह, मद, मत्सर आदि को अपनाना ही मैल रूपमें जाना जाता है। इन्हें अपनाकर यह पुरुष देहस्थ अशरीर सनातन अणुरूप निर्मल तेजोमय आत्मा को प्राप्त करता नहीं; सर्वगत चेतनस्वरूप आत्मा से जुड़ा हुआ उसका साथी या सहयोगी बनता नहीं।
वेदवाणी में आया श्रुतिकथन है :
विष्णो: कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे।
इन्द्रस्य युज्य सखाः॥
~ऋग्वेद (१.२२.१९)
अर्थात् – सर्वव्यापी विष्णु के कार्यों को तुम लोग देखो (विष्णो: कर्माणि पश्यत); जिसके द्वारा व्रतों अर्थात् अपने संकल्पित कार्यों को तदनुसार दोषरहित अवस्था में कर सको (यतो व्रतानि पस्पशे) (और) सबका शासन करनेवाले आत्मा का (इन्द्रस्य) जुड़ा हुआ साथी बन सको । (युज्य सखाः)।
इस प्रकार दर्पणवत् असंग अवस्था में बिना किसी भेदभाव, पक्षपात और राग-द्वेषरहित अवस्था में स्व-कर्म का निष्पादन करना ही देहस्थ अशरीर आत्मा को प्राप्तकर आत्मा ही हो जाना है । इस पुरुषदेह में निवास करते हुए देहस्थ आत्मा को प्राप्तकर यह से वह हो जाना है- ‘एतत्ततो भवति।’ और इस लोक से गमन करते हुए यहीं उस अमृतपुरुष में लय अवस्था को प्राप्त करना और जन्म-कर्म के सम्पूर्ण बन्धन से सर्वथा मुक्त हो जाना है।
यह भी कि दर्पण के समक्ष जिस भाव को (मित्र या शत्रु भाव को) प्रकट किया जाता है, वही भाव उसमें देखने या प्राप्त करने को मिलता है; उसी प्रकार यह आत्मा मित्रता का भाव अपनाने पर मित्रवत् तथा शत्रुता का भाव अपनाने पर यह परस्पर शत्रुवत् आचरण (कार्य) करनेवाला अर्थात् तदनुसार प्राप्त किया जाने वाला जाना जाता है।
चूंकि वह एक अविनाशी परब्रह्मस्वरूप परमात्मा ही सब प्राणियों (मनुष्यों) के नश्वर देहरूप में स्थित हो गया है तथा अजन्मा होकर वह अमरता का गुण धारण करनेवाला है; अतः जो कोई इस आत्मा को परास्त करना या इसे मारना चाहता है, यह आत्मा उसको ही परास्त कर देता है; यह उसे मृत्यु प्रदान करनेवाला हो जाता है।
अतः सम्मुख आये आततायी की हत्या कर देना और शरणार्थी को शरण प्रदान करना ही ब्रह्मस्वरूप अविनाशी आत्मा को प्राप्त कर लेने का सनातन मार्ग है । स्पष्ट है कि यह आत्मा अपने सर्वरूप में पृथक्-पृथक् इकाई रूपको अपनाकर परस्पर जिस भाव को अपनाता है; उसी भाव को सम्मुख अवस्था में प्राप्त करता है।
अतः जो कोई पुरुष लोक में अथवा परस्पर व्यवहार में दर्पण की भाँति असङ्ग अवस्था में अपना सम्पूर्ण कर्म सम्पादित करता नहीं; वह इस लोक से प्रयाण करके अपने अचल, निर्मल, निर्दोष, अविनाशी असङ्ग आत्मा को प्राप्त करता नहीं; और वह पतित होकर अपने द्वारा किये गये कर्म अनुसार नाना योनि और सर्ग में पुनः इस अधोलोक को प्राप्त करनेवाला हो जाता है।
अविनाशी सनातन आत्मा के जगतरूप कर्तास्वरूप को प्रकट करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् में श्रुतिकथन है :
“कर्म की विभूतियुक्त अवस्था को प्राप्त करने हेतु वह परब्रह्मस्वरूप परमात्मा चारों ही वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र रूपमें जन्म को प्राप्त कर देह-रूप को धारण करने वाला हो गया है। यह शूद्रवर्ण (को अपनाकर प्रकट हुआ पुरुषरूप) ही पूषा अर्थात् सबका पोषण करनेवाला है।“
यह सृष्टि-रहस्य उजागर किया गया है कि- “वे ये ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं । इन्हें उत्पन्न करनेवाला वह परमात्मा ही अग्नि रूपसे देवताओं में ब्राह्मण हुआ । तथा मनुष्यों में वह – ब्राह्मण रूप में ब्राह्मण, क्षत्रिय रूप में क्षत्रिय, वैश्य रूप में वैश्य और शूद्र रूप में वह शूद्र हुआ।
अतः जो पुरुष इस आत्मलोक की उपासना (यथादर्शे= दर्पणवत्) करता है, उसका वह कर्म कभी क्षीण नहीं होता । चारों ही वर्ण में उत्पन्न हुआ यह पुरुष इस आत्मा से जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, उसी-उसी को यह प्राप्त कर लेता है- ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते।’ (बृह.उप. १.४.११से १५) इस प्रकार वह हृदयस्थ प्रकाशरूप परमात्मा दर्पणवत् सबके लिये सर्वत्र सहज समुपलब्ध हो गया है।
अतः इन चारों ही वर्ण को अपनाकर श्रीमद्भगवद्गीता में आया उपदेश है :
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
~गीता (६.५-६)
अर्थात्-अपने आत्मा द्वारा, अपने आत्मा का (इस भवसागर से) उद्धार करें। अपने आत्मा को अधोगति में न डालें। यह आत्मा आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। जिस मनुष्य द्वारा अपने आत्मा शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि) को जीता हुआ है, उसका तो यह आत्मा आप ही मित्र है और जिसके द्वारा अपने आत्मा को जीता नहीं गया है; उसके लिये यह आत्मा आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बरतता है।
इस प्रकार यह दर्पण अपने गुण-धर्म आधार पर ‘कर्म और उसका फल’ सिद्धान्त को जान लेने में हमारी सहायता करता है । इस मनुष्यलोक में बिना किसी फेर-बदल या पक्षपात के अच्छे कर्म का अच्छा और बुरे कर्म का बुरा फल अवश्यमेव प्राप्त करना प्रकट करता है । जगतरूप को अपनाकर ‘अन्नरसमय पुरुषरूप’ में चार भाग में विभाजित होकर वह परमात्मा- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण में तथा स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज और जरायुज आधारित नाना देह-रूपको धारणकर वह विश्वरूप को अपनानेवाला हो गया है।
अतः पूर्व श्रुतिमंत्र क्रमांक २.२.७ में प्रकट किये गये सृष्टिविधान-
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥
~कठोपनिषद (२.२.७)
अर्थात् – (मरणोपरान्त) कितने ही देहधारी मनुष्य शरीर धारण करने के लिये योनियों को प्राप्त हो जाते हैं; अन्य कितने ही किये गये कर्म अनुसार और सुने गये अनुसार स्थिर आत्मा को अनुसरण करते हैं।
आधार पर यह श्रुतिकथन इस मनुष्य-जीवन की उच्चतर अवस्था को अपनाने हेतु प्रेरित करता और मार्ग-बोध प्रदान करता है।
इस अवसर पर यहाँ यह स्मरण करना योग्य है कि- परब्रह्मस्वरूप परमात्मा को प्राप्त करने हेतु श्रीमद्भगवद्गीता में रथी अर्जुन द्वारा सारथि योगेश्वर श्रीकृष्ण से पूछा गया है कि – “हे भगवन् ! आप मेरे द्वारा किन-किन भावों में चिन्तन किया जाने योग्य हैं”- ‘केषु केषु भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ?’ (गीता १०.१७) इस प्रश्न का गुरुत्मान् वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ‘एकदेशीय उत्तर’ अध्याय दश में आया है, जिसे ‘विभूति योग’ रूपमें जाना गया है; तथा “हे अर्जुन ! तुम्हें और बहुत अधिक जानने से क्या प्रयोजन” – ‘अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।’ (गीता १०.४२) कहकर, इस प्रश्न का अधूरा ही उत्तर दिया गया है।
रथी अर्जुन के इस प्रश्न का पूर्ण सम्यक् समाधान हमें यहाँ इस श्रुतिमंत्र में प्राप्त हो जाता है कि – वह परमात्मा जिस-जिस शुभ और अशुभ भाव को अपनाकर चिंतन (उपासना) किया जाता है, उसी-उसी शुभ और अशुभ भाव के अनुसार वह परमात्मा यहाँ इस अधोलोक में ‘यथादर्शे’ अर्थात् किसी दर्पण में अतिनिकट सम्मुख अवस्था में देखे जाने वाले दृश्य की भाँति प्राप्त किया जाता है।
[चेतना विकास मिशन)





