सुधीर मिश्र
अनवर मीनाई का शेर है-
अब चेहरा-ए-माज़ी भी पहचाना नहीं जाता
यूं टूट के बिखरा है इतिहास का आईना
नोएडा के एक कॉलेज कैंटीन में छात्रों की फरमाइश थी कि आज मीठे में वर्मीसिली बनाइए। घर के बच्चों से विडियो कॉल चल रही थी तो कान में यह शब्द पड़ा। पूछा तो पता चला कि वर्मीसिली मतलब सिंवई। रमजान चल रहा है। शायद इसीलिए बच्चों को मिठाई में सिंवई की याद आ रही है। हिंदी मीडियम वाली पुरानी पीढ़ी के लिए तो सिंवई का यह अंग्रेजी नामकरण थोड़ा चौंकाता है। सच कहूं तो कोई ऐतराज नहीं है। वक्त के साथ इंसान इवॉल्व करता है खुद को, आसपास के माहौल को, खानपान को और अपनी चीजों को।

ईद आने वाली है। सही वक्त है सिंवइयों को ठीक से समझने का। बहुत बचपन में यूपी के शाहजहांपुर के एक मोहल्ले में सिंवइयों का बनना देखा था। दूर तक डोरी पर लटकी हुई मोटी पतली सिंवइयां। आप पूछ सकते हैं कि मैं बार-बार सिंवई को सिंवइयां क्यों लिख रहा हूं। जवाब है कि यह अवध का प्रचलन हैं। पुराने लखनऊ में रहने वाले ज्यादातर लोग आप को सिंवइयां बोलते ही नजर आएंगे। शायद वजह यह रही होगी कि जब ईद पर आप यहां किसी के घर जाते हैं तो सिंवई नहीं बल्कि कई तरह की सिंवइयां मिलती हैं। वैसे यहां लोग खुद को भी मैं नहीं, बल्कि हम बोलते हैं। दूसरे इलाकों के लोग मज़ाक में कह भी देते हैं कि दिख तो केवल आप रहे हैं।
आम तौर पर हमारे घरों में रक्षाबंधन पर सिंवई बनती है। करवाचौथ से पहले की रात में महिलाएं सूतफेनी खाती हैं, जिसे हम बहुत ज्यादा महीन सिंवई कह सकते हैं। दूध, सिंवई, चीनी और थोड़े से ड्राईफ्रूट, लेकिन ईद वाले घरों की मेहमाननवाजी में मिलती है, बनारसी किमामी सिंवई, शीर खुरमा, दूध मेवे वाली सिंवई, जर्दा या दम सिंवई। शीर खुरमा सिंवई दूध और खजूर की बनाई जाती है। किमामी सिंवई को बनाने में बड़ा जतन करना पड़ता है, पर ईद के मौके पर यही सबसे ज्यादा पसंद की जाती है।
कुछ परिचित राजपूत परिवारों में कई पुश्तों से एक खास किस्म की सिंवई बनाने की परंपरा है। वहां कंडे या उपले की धीमी आंच पर मिट्टी की छोटी हांडी में दूध धीरे-धीरे पकता है। सिंवई को घी में अलग से भूना जाता है। कुछ इस तरह से कि वह इतनी ही भुने कि सुनहरी हो जाए और उसका स्वाद न बिगड़े। इसे घंटों धीमी आंच में पके दूध में डालकर स्वादिष्ट सिंवई तैयार होती है।
उत्तर भारतीय परिवारों में कुछ तीस साल पहले तक घर-घर में सिंवई बनाने का प्रचलन था। तब न चौबीस घंटे का टीवी था और न एंटरटेनमेंट चैनल। दोपहर फुरसत के वक्त में अम्मा, ताई और बुआ लोग आस-पड़ोस की महिलाओं को बुला लेती थीं, यह कहकर कि आज हमारे जवे तोड़ने हैं या बीज छीलने हैं। जवा तोड़ना मतलब हाथ से सिंवई बनाना। बाद में घरेलू मशीन आने लगीं। पीतल की, जिसे चारपाई के पाटे पर कसकर उसमें से सिंवई निकाली जाती थीं। सिंवई बनाना, धूप में सुखाना, छत पर बैठकर उसकी रक्षा करना और फिर वापस रसोई में सुरक्षित करना एक पूरी प्रक्रिया में होता था।

सच कहें तो सिंवई का किसी जाति, धर्म, मजहब या क्षेत्र से लेना-देना नहीं है। देश के भीतर की ही बात करें तो दक्षिण भारत में सिंवई को संथकई कहते हैं। यह चावल के महीन नूडल होते हैं। इसमें नमक भी होता है। कन्नड़ में इसे शिवागे बोला जाता है। कुछ लोग इडियप्पम भी कहते हैं। दक्षिण में सिंवई उत्तर भारत की तरह नहीं खाई जाती। वहां यह टमाटर, इमली, नारियल के दूध और चटनी के साथ नमकीन खाई जाती है। नाश्ते या रात के खाने में। वैसे सिंवई उपमा तो अब उत्तर भारत में भी बहुत पसंद किया जा रहा है। हैदराबादी सिंवई में भी हल्के नमक का इस्तेमाल होता है। मराठी में इसे शेवाया कहते हैं। सिंवई हमारे देश और दुनिया में सदियों से खाई जा रही है।
भारतीय इतिहासकार बताते हैं कि अपने देश में 2300 ईसा पूर्व में भी सिंवई खाए जाने के संदर्भ मिलते हैं। मध्ययुगीन इतिहास में नादिरशाह के हमले के दौरान मोहम्मद शाह रंगीला के साथ पगड़ी बदले जाने की एक रस्म के दौरान सिंवई पेश किए जाने का ज़िक्र है। बहादुर शाह जफर प्रथम के वक्त भी लाल किले में सिंवई बनती थी। खाद्य पदार्थों के वर्गीकरण के हिसाब से सिंवई को पास्ता और नूडल्स की श्रेणी में रखा जा सकता है। चीन और इटली से भी इनका इतिहास जुड़ा हुआ है। पंद्रहवीं शताब्दी के पोप चेम्बरलेन के रोमन प्लाज़ा में एक जाने-माने शेफ थे। उनका नाम था-मार्टिनो द कोमो। उन्हें पश्चिमी देशों का पहला सेलेब्रेटी शेफ कहा जाता है। उनकी किताब द आर्ट ऑफ कुकिंग में वर्मीसिली रेसिपी का जिक्र है।
सऊदी अरब में सिंवई को शीरेया कहा जाता है। सोमालिया, इंडोनेशिया, यमन, पुर्तगाल और स्पेन में भी यह अलग-अलग रूप में खाई जाती है। अमेरिका में इसे फीडियो तो बांग्लादेश में शेमाई कहते हैं। कुल जमा बात यह है कि मीठी खानी हो या नमकीन, सिंवई खाइए और लोगों को खिलाइए। इसे तकरीबन सारी दुनिया खाती है, अपने-अपने तरीकों से। सिंवई खाइए, प्यार बढ़ाइए। कुछ ऐसी ही सिंवई की दावतों को याद करते हुए कुंवर नारायण जी का यह शेर और बात खत्म कि-
सांसों की टूटी सरगम में इक मीठा स्वर याद रहा
यूं तो सब कुछ भूल गया मैं पर तेरा घर याद रहा





