डॉ. विकास मानव
(निदेशक : चेतना विकास मिशन)
बलात्कार का मूल कारण सेक्स का दमन और नामर्दी है। बलात्कारी नामर्द ही होते हैं। अगर वे मर्द हों तो प्रेमिका/पत्नी को तृप्त कर पाएं। ऐसे में पार्टनर की रुचि उनके मिक्सअप में इतनी बढ़ जाए कि वह उन्हें इस दिशा में सोचने का मौका ही न दे। बिस्तर पर वे शर्मिंदा होते हैं। पार्टनर उनसे बचने लगती है, उन्हें दुत्कारने लगती है। वे खीझ-कुंठा-अवसाद के शिकार बनते हैं और फिर किसी भी नारी से इसका प्रतितिशोध लेते हैं– उसे नोचकर, खाकर, मारकर।
इसी तरह आतंकवाद भी खुद से कटने, अतृप्त रहने का परिणाम है। खुद से खुश और परिवार से सुखी इंसान आतंकी नहीं बनता। इस लेख में आगे हम इस मनोवैज्ञानिक तथ्य का विश्लेषण करेंगे।
फ़िलहाल यहाँ इतना और बता दें कि आतंक निवारण में बद्व-महाबीर की करुणा और कृष्ण/शिव-शक्ति की हिंसक क्रांति दोनों की समान महत्ता है। आप प्राणिमात्र के रूप में पैदा होते हैं, मनुष्य बनना पड़ता है. आप को मनुष्य नहीं बनने दिया जाता – हिन्दू-मुस्लिम, देशी-विदेशी सब बना दिया जाता है. ध्यान ही मार्ग है इंसान बनने का. आप व्हाट्सप्प 9997741245 पर विमर्श कर के हमारा एक शिविर लीजिये और खुद से मिलिए. सब अनुभव कर लेंगे. हम निःशुल्क सुलभ हैं.
‘आतंकवाद’ शब्द की उत्पत्ति फ्राँसीसी क्रांति के दौरान वर्ष 1793-94 के आतंक के शासन से हुई। यूरोप और अन्यत्र भी विशेषकर 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में वामपंथी उग्रवाद उभर कर सामने आया।
भारत में नक्सली और माओवादी सहित पश्चिम जर्मनी में रेड आर्मी गुट, जापान का रेड आर्मी गुट, संयुक्त राज्य अमेरिका में विदरमेन और ब्लैक पैन्थर्स, उरुग्वे के तूपामारोस और अन्य कई वाम पंथी उग्रवादी दल विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में 1960 के दशक के दौरान उत्पन्न हुए।
आज अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद अधिकांशत: इस्लामी रूढ़िवाद की विचारधारा से प्रेरित है तथा इसकी अग्र पंक्ति में ओसामा बिन लादेन का अल-कायदा और इसके घनिष्ठ सहयोगी अफगानिस्तान में तालिबान हैं। सोवियत-विरोधी नीतियों के कारण तालिबानों की तेज़ वृद्धि संयुक्त राज्य अमेरिका की CIA और पाकिस्तान की ISI द्वारा दिये गए व्यापक संरक्षण के कारण संभव हुई थी। इससे न केवल अफगानिस्तान बल्कि पाकिस्तान और भारत में भी सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो चुकी हैं।
आतंकवाद के स्वरूप :
आतंकवादी समूह/समूहों के उद्देश्यों के आधार पर आतंकवादी गतिविधियों के मुख्य प्रकारों में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है-
1. मानवजातीय-राष्ट्रवादी आतंकवाद (Ethno-Nationalist Terrorism):
डेनियल बाइमैन के अनुसार अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिये किसी उप-राष्ट्रीय मानवजातीय समूह द्वारा जान बूझकर की गई हिंसा को मानवजातीय आतंकवाद कहा जा सकता है।
ऐसी हिंसा प्राय: या तो पृथक राज्य के सृजन अथवा एक मानवजातीय समूह द्वारा दूसरे समूहों की तुलना में अपने स्तर को बढ़ाने के लिये किया जाता है। श्रीलंका में तमिल राष्ट्रवादी समूह और पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादी समूह मानवजातीय-राष्ट्रवादी आतंकवादी गतिविधियों के उदाहरण हैं।
2. धार्मिक आतंकवाद (Religious Terrorism):
वर्तमान में अधिकांशत: आतंकवादी गतिविधियाँ धार्मिक आदेशों और आवश्यकताओं द्वारा अभिप्रेरित होती हैं। हॉफमैन के अनुसार पूर्णत: अथवा अंशत: धार्मिक आदेशों द्वारा प्रेरित आतंकवादी हिंसा को दैवीय कर्त्तव्य अथवा पवित्र कृत्य मानते हैं।
अन्य आतंकवादी समूहों की तुलना में धार्मिक आतंकवादी वैधता और औचित्य के विभिन्न साधनों का प्रयोग करते हैं जो धार्मिक आतंकवाद को प्रकृति में और अधिक विनाशकारी बना देता है।
3. विचारधारोन्मुख आतंकवाद (Ideology Oriented Terrorism) :
हिंसा और आतंकवाद में विचारधारा के उपयोग के आधार पर आतंकवाद को साधारणतया दो वर्गों-वामपंथी और दक्षिणपंथी आतंकवाद में वर्गीकृत किया जाता है।
वामपंथी विचारधाराओं से प्रेरित होकर शासक वर्ग के विरुद्ध कृषक वर्ग द्वारा की गई हिंसा को वामपंथी आतंकवाद कहा जाता है।
वामपंथी विचाराधारा विश्वास करती है कि पूंजीवादी समाज में मौजूदा सभी सामाजिक संबंध और राज्य की प्रकृति शोषणात्मक है और हिंसक साधनों के माध्यम से एक क्रांतिकारी परिवर्तन अनिवार्य है। भारत और नेपाल में माओवादी गुट इसके उदाहरण हैं।
दक्षिणपंथी समूह आमतौर पर यथास्थिति (Status-Quo) बनाए रखना चाहते हैं अथवा अतीत की उस पूर्व स्थिति को स्थापित करना चाहते हैं जिसमें वे संरक्षित महसूस करते हैं।
कभी-कभी दक्षिणपंथी विचारधाराओं का समर्थन करने वाले समूह नृजातीय/नस्लभेदी चरित्र भी अपना लेते हैं। वे सरकार को किसी क्षेत्र को अधिग्रहीत करने अथवा पड़ोसी देश में ‘‘उत्पीड़ित’’ अल्पसंख्यकों (अर्थात) के अधिकारों का संरक्षण करने के लिये हस्तक्षेप करने हेतु बाध्य कर सकते हैं, जैसे- जर्मनी में नाजी पार्टी।
प्रवासी समुदायों के विरुद्ध हिंसा भी आतकवादी हिंसा की इस श्रेणी के अधीन आती है, यहाँ उल्लेखनीय है कि दक्षिणपंथी हिंसा के लिये धर्म एक समर्थक भूमिका निभा सकता है। इनके उदाहरण हैं: जर्मनी में नाजीवाद, इटली में फासीवाद, संयुक्त राज्य अमेरिका में कू क्लक्स क्लान (केकेके) के रूप में श्वेत आधिपत्य आदि।
4. राज्य-प्रायोजित आतंकवाद (State-sponsored Terrorism):
राज्य-प्रायोजित आतंकवाद अथवा छद्म युद्ध (Proxy War) भी सैन्य युद्ध के इतिहास जितना ही पुराना है। बड़े पैमाने पर राज्य-प्रायोजित आतंकवाद 1960 एवं 1970 के दशक में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में उभरा और आज धार्मिक आतंकवाद के साथ राज्य-प्रायोजित आतंकवाद ने विश्व भर में आतंकवादी गतिविधियों की प्रकृति काफी परिवर्तित कर दी है।
राज्य-प्रोयाजित आतंकवाद की एक विशेषता यह है इसे प्रचार माध्यमों का ध्यान आकर्षित करने अथवा संभावित व्यक्तियों को लक्षित करने की बजाए कतिपय स्पष्टतया परिभाषित विदेशी नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये प्रारंभ किया जाता है। इस कारण यह बहुत कम बाधाओं के अधीन कार्य करता है और अत्यधिक नुकसान पहुँचाता है।
संयुक्त राज्य के अधीन पश्चिमी शक्तियों ने संपूर्ण शीत युद्ध में सभी राष्ट्रवादियों और साम्यवाद-विरोधियों का समर्थन किया। सोवियत संघ भी इस प्रयोग में पीछे नहीं रहा। भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही पाकिस्तान से इस समस्या का सामना कर रहा है।
5. स्वापक-आतंकवाद (Narco-terrorism) :
स्वापक-आतंकवाद ऐसी संकल्पना है जिसे ‘आतंकवाद के प्रकार’ और ‘आतंकवाद के साधन’ दोनों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग कोलंबिया और पेरू में किया गया था।
प्रारंभ में दक्षिण अमेरिका में मादक पदार्थों के अवैध व्यापार से संबद्ध आतंकवाद के परिप्रेक्ष्य में प्रयुक्त किया गया यह शब्द अब विश्व भर और सबसे अधिक मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में आतंकवादी गुटों और गतिविधियों से संबंद्ध हो गया है।
स्वापक-आतंकवाद की परिभाषा कनाडियाई सुरक्षा सेवा द्वारा ‘स्वापक पदार्थों के अवैध व्यापारियों की क्रमबद्ध धमकी अथवा हिंसा द्वारा सरकार की नीतियों को प्रभावित करने के प्रयास’ के रूप में दी गई है।
हालाँकि स्वापक-आतंकवाद को आतंकवाद के साधन अथवा आतंकवाद के वित्तीयन के साधन के रूप में भी देखा जा सकता है।स्वापक-आतंकवाद दो आपराधिक गतिविधियों- मादक पदार्थ का अवैध व्यापार और आतंकवादी हिंसा को संयोजित करता है।
स्वापक-आतंकवाद मुख्यत: आर्थिक कारणों द्वारा प्रेरित होता है। क्योंकि यह आतंकवादी संगठनों को अपनी गतिविधियों के लिये न्यूनतम लागत से काफी अधिक राशि जुटाने में सहायता करता है।
उदाहरण के लिये पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (ISI) एजेंसी द्वारा समर्थन प्राप्त इस्लामी आतंकवादी गुटों को भारत की कश्मीर घाटी और देश के अन्य भागों में भी मादक पदार्थों के अवैध व्यापार करने में सक्रिय पाया गया है।
आतंकवाद का परिभाषीकरण :
दो कारण हैं जो ‘आतंकवाद’’ शब्द की एक व्यापक परिभाषा की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं-
आतंकवाद की समस्या को समझना। देश के भीतर आतंकवाद से निपटने और विदेशों से आतकवादियों के प्रत्यर्पण के लिये विशेष कानून बनाना।
आतंकवाद को वैश्विक घटना मानने के बावजूद आतंकवाद की अंतर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत परिभाषा देने के लिये पूर्व में किये प्रयास व्यर्थ सिद्ध हुए हैं।
ऐसा मुख्यतः दो कारणों से है। पहला, किसी एक देश में ‘आतंकवादी’ को दूसरे देश में ‘स्वतंत्रता सेनानी’ के रूप में देखा जा सकता है। दूसरा, यह विदित है कि कुछ राष्ट्र स्वयं अपनी एजेंसियों अथवा किराये पर लिये गए एजेंटों के माध्यम से कानूनी रूप से स्थापित अन्य देशों की सरकार को पलटने अथवा अस्थिर करने या अन्य राष्ट्र के महत्त्वपूर्ण राजनीतिक अथवा सरकारी व्यक्तियों की हत्या कराने के लिये गुप्त रूप से विभिन्न किस्म के आपराधिक कार्यों का सहारा लेते हैं अथवा उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।
वर्ष 2005 में संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने आतंकवाद को ‘लोगों को भयभीत करने अथवा सरकार या किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन को कोई कार्य करने अथवा नहीं करने के लिये बाध्य किये जाने के प्रयोजन से नागरिकों अथवा निहत्थे लोगों को मारने अथवा गंभीर शारीरिक क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से किये गए किसी कार्य के रूप में परिभाषित किया।
संयुक्त राज्य रक्षा विभाग ने आतंकवाद को ‘प्राय: राजनीतिक, धार्मिक अथवा वैचारिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये सरकार अथवा समाज को अवपीड़ित या भयभीत करने हेतु व्यक्तियों अथवा संपत्ति के विरुद्ध बल अथवा हिंसा का गैर-कानूनी अथवा धमकी भरे प्रयोग’ के रूप में परिभाषित किया है।
*मूलभूत तथ्य का मनोविज्ञान और समाधान की बात :*
आतंकवाद की घटना निश्चित रूप से उस सबसे जुड़ी है, जो समाज में हो रहा है। समाज बिखर रहा है।
उसकी पुरानी व्यवस्था, अनुशासन, नैतिकता, धर्म सब कुछ गलत बुनियाद पर खड़ा मालूम होता है। लोगों की अंतरात्मा पर अब उसकी कोई पकड़ नहीं रही।
_आतंकवाद का मतलब इतना ही है कि लोग मानते हैं कि मनुष्य को नष्ट करने से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो अविनाशी है, बस पदार्थ ही पदार्थ है। और पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता, सिर्फ उसका आकार बदला जा सकता है। एक बार मनुष्य को केवल पदार्थ का संयोजन माना गया और उसके भीतर के आध्यात्मिक तत्व को कोई स्थान नहीं दिया गया तो मारना एक खेल हो जाता है।_
इस धरती पर आणविक अस्त्रों का अंबार लगा हुआ है, और क्या आपको खयाल है कि आणविक अस्त्रों की वजह से राष्ट्र असंगत हो गए हैं? आणविक अस्त्रों की ताकत इतनी बड़ी है कि कुछ ही क्षणों में पूरे भूगोल को नष्ट किया जा सकता है।
यदि पूरा विश्व एक साथ कुछ मिनटों में नष्ट किया जा सकता है तो विकल्प यह है कि पूरा विश्व एक हो जाए। अब वह बंटा हुआ नहीं रह सकता। उसका अलग रहना खतरनाक है, क्योंकि देश अलग रहे तो किसी भी क्षण युद्ध हो सकता है।
_अब देशों की सीमाएं बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। सब कुछ स्वाहा करने के लिए सिर्फ एक युद्ध काफी है। और यह समझने के लिए मनुष्य के पास बहुत वक्त नहीं है कि हम ऐसा संसार बनाएं, जहां युद्ध की संभावना ही न रहे।_
आतंकवाद की बहुत सी अंतरधाराएं हैं। एक तो, आणविक अस्त्रों का निर्माण करने की पागल दौड़ में सभी राष्ट्र अपनी-अपनी शक्ति उस दिशा में उड़ेल रहे हैं।
_पुराने अस्त्र तिथिबाह्य (out of date) होते जा रहे हैं। वे राष्ट्रीय स्तर पर तिथिबाह्य तो हुए हैं लेकिन निजी तौर पर व्यक्ति उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। और आप एक अकेले व्यक्ति के खिलाफ तो आणविक अस्त्रों का उपयोग नहीं कर सकते।_
यह बिलकुल मूढ़तापूर्ण होगा। अगर एक अकेला आतंकवादी बम फेंकता है तो क्या आप उस पर एक मिसाइल बरसाएंगे? मेरा मुद्दा यह है कि आणविक अस्त्रों ने व्यक्तियों को पुराने अस्त्रों का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी है।
_यह स्वतंत्रता अतीत में संभव नहीं थी, क्योंकि सरकारें भी उन्हीं शस्त्रों का प्रयोग कर रही थीं। आतंकवाद के लिए अमीर देश जिम्मेदार हैं।_अब सरकारें पुराने अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट करने में लगी हैं, उन्हें समुंदर में फेंक रही हैं, गरीब देशों को बेच रही हैं, जो नए अस्त्र नहीं खरीद सकते। और सभी आतंकवादी उन गरीब देशों से आ रहे हैं, जो नए अस्त्र खरीदने की हैसियत नहीं रखते।
उन्हें जो अस्त्र बेचे गए हैं, उनके द्वारा ही वे हमला करते हैं। और उनके साथ एक अजीब सुरक्षा है। आप उन पर आणविक अस्त्र या बम फेंक नहीं सकते।
आतंकवाद विकराल रूप धारण करने वाला है और उसका कारण अति विचित्र है, वह यह कि अब तीसरा विश्व युद्ध नहीं होगा। और मूढ़ राजनीतिकों के पास कोई विकल्प नहीं है।
>आतंकवाद का मतलब है कि अब तक जो सामाजिक रूप से किया जा रहा था, अब व्यक्तिगत तल पर होगा। यह और बढ़ेगा। यह तभी बदलेगा, जब हम आदमी की समझ को जड़ से बदलेंगे, जो कि हिमालय लांघने जैसा दुरूह काम है। क्योंकि वे ही लोग जिन्हें तुम बदलना चाहोगे, तुमसे लड़ेंगे। वे आसानी से बदलना नहीं चाहेंगे।
आदमी के अंदर बसा हुआ प्राचीन शिकारी युद्ध में संतुष्ट हो जाता था। अब युद्ध की संभावना न रही, और शायद अब कभी नहीं होगा। उस शिकारी ने पुनः सिर उठाया है, और सामूहिक रूप से हम लड़ नहीं सकते। तो एक ही रास्ता बचा है हर व्यक्ति अपनी दबी हुई भाप को निकाले।
चीजें अंतर्संबंधित हैं। सबसे पहली बात बदलनी है वह है, मनुष्य को उत्सव की कला सिखानी चाहिए। इस कला को सारे धर्मों ने मार डाला है। जो असली मुजरिम हैं, उन्हें तो गिरफ्तार नहीं किया जाता।
ये आतंकवादी और अन्य अपराधी तो शिकार हैं, ये तो तथाकथित धर्म हैं जो वास्तविक मुजरिम हैं, क्योंकि उन्होंने मनुष्य की आनंद की सारी संभावना को ही नष्ट कर डाला है। उन्होंने जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का मजा लेने की संभावना को ही जला दिया।
उन्होंने उस सबको निंदित कर दिया जो प्रकृति ने तुम्हें आनंदित होने के लिए दिया है। जिससे तुम उत्तेजित होते हो, प्रसन्न होते हो। उन्होंने सब कुछ छीन लिया। और कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें वे नहीं छीन सकते क्योंकि वे तुम्हारी जैविकी का हिस्सा हैं।
जैसे कि सेक्स, उन्होंने इसे इतना निंदित किया कि वह विषाक्त हो गया है।
जो व्यक्ति सुविधा में या ऐशो-आराम में जी रहा है, वह कभी आतंकवादी नहीं हो सकता। धर्मों ने ऐश्वर्य की निंदा की और गरीबी की प्रशंसा की। अब धनी आदमी कभी आतंकवादी नहीं हो सकता। वह तो संचालक हो सकता है।
_सिर्फ गरीब, जो कि 'धन्यभागी हैं।' वे ही आतंकवादी हो सकते हैं। उनके पास खोने को कुछ नहीं है। और वे समूचे समाज के खिलाफ उबल रहे हैं, क्योंकि सभी उच्च वर्ग के पास वे चीजें हैं, जो इनके पास नहीं हैं।_
लोग भय में जी रहे हैं, नफरत में जी रहे हैं, आनंद में नहीं। अगर हम मनुष्य के मन का तहखाना साफ कर सकें…और उसे किया जा सकता है।
_ध्यान रहे, आतंकवाद बमों में नहीं हैं, किसी के हाथों में नहीं है, वह तुम्हारे अवचेतन में है। यदि इसका उपाय नहीं किया गया तो हालात बदतर से बदतर होते जाएंगे। और लगता है कि सब तरह के अंधे लोगों के हाथों में बम हैं। और वे अंधाधुंध फेंक रहे हैं। हवाई जहाजों में, बसों और कारों में, अजनबियों के बीच…अचानक कोई आकर तुम पर बंदूक दाग देगा। और तुमने उसका कुछ बिगाड़ा नहीं था।_
तो व्यक्तिगत हिंसा में वृद्धि होगी…हो ही रही है। और तुम्हारी सरकारें और तुम्हारे धर्म नई स्थिति को समझे बगैर पुरानी रणनीतियों को अपनाए चले जाएंगे।
_नई स्थिति यह है कि प्रत्येक मनुष्य को आतंरिक चिकित्सा से गुजरना जरूरी है, उसे अपने अवचेतन उद्देश्यों को समझना जरूरी है। प्रत्येक को ध्यान करना आवश्यक है ताकि वह शांत हो जाए, उसकी तल्खी ठंडी हो जाए और वह संसार को नए परिप्रेक्ष्य से देखे, मौन से सराबोर हो जाए।_(चेतना विकास मिशन)





