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 भारत को पुलिस राज्य बनने से बचाओ

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मुनेश त्यागी

भारत में औपचारिक रूप से पुलिस की व्यवस्था अट्ठारह सौ इकसठ बासठ में अंग्रेजों द्वारा की गई थी। उस समय पुलिस का मुख्य काम देश की आजादी के लिए लड़ने वालों को रोकना, परेशान करना और झूठे के आरोपों में गिरफ्तार करके जेल में ठूंसना था और पूरी आजादी के आंदोलन के दौरान पुलिस इसी प्रकार से लुटेरे अंग्रेज साम्राज्यवादियों और भारत को लूटने और गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों का दमनकारी दस्ता बनी रही।
  1947 में हमारा देश आजाद हुआ और तब उम्मीद की गई थी कि अब पुलिस सामंतों , पूंजीपतियों,मक्कारों और धन्ना सेठों का दमनकारी दस्ता न बनकर भारत में सुराज कायम करने में मदद करेगी और हक के लिए लड़ने वाले किसानों, मजदूरों, मेहनतकशों और आम जनता को परेशान नहीं करेगी, उन्हें झूठे केसों में फंसा कर जेल में नहीं ठूंसेगी और यह उम्मीद भी की गई थी कि अब पुलिस असली अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करके उन्हें सजा दिलवायेगी।
 आजादी के मिलने के कुछ दिन बाद तक तो पुलिस ने लगभग सही काम किया, मगर जल्द ही यह आशा और विश्वास मिट्टी में मिल गए, जब पुलिस उसी पुराने ढर्रे पर लौट आई और सामंतों,  पूंजीपतियों, पैसे वालों और रसूख वालों का दमनकारी दस्ता और लठैत बन गई और उसने जनविरोधी रूप धारण कर लिया। हालात यहां तक बिगड़ गये कि कुछ साल पहले राष्ट्रीय पुलिस कमीशन की रिपोर्ट में बताया गया है कि पुलिस 60 फ़ीसदी मामलों में निर्दोष लोगों को झूठे केस में फंसा कर जेल भेज देती है। पुलिस पुलिस पर दुष्यंत कुमार का यह शेर बिल्कुल फिट बैठता है कि 

“जिस तरह चाहे बजाओ इस सभा में,
हम नहीं है आदमी हम झुंझुने हैं।

यहीं पर हम यह भी कहना चाहेंगे कि 75 साल के आजाद भारत में पुलिस व्यवस्था को सुधारने और व्यवस्थित करने के समुचित प्रयास नहीं किए गए हैं। पर्याप्त संख्या में पुलिस बलों की भर्ती नहीं की गई है और पुलिस लगभग अराजकता का शिकार बनी रही। उसके वेतन, भत्तों और कार्य दशाओं में समुचित सुधार और बदलाव नहीं किए गए और दिनों दिन पुलिस अव्यवस्था का शिकार बनी रही और उस पर जनविरोधी होने के आरोप लगते रहे।
आज पुलिस प्रणाली ने विकराल रूप धारण कर लिया है। अब पुलिस पर सीधे-सीधे जन विरोधी, अराजकता, भ्रष्टाचार, जातिवादी, साम्प्रदायिक और जन शोषक जैसे आरोप लगने लगे हैं और अब पुलिस की मनमानी और अत्याचारों को देखकर न्यायालयों को कहना पड़ा कि भारत धीरे-धीरे पुलिस राज्य में तब्दील होता जा रहा है और बड़ी मुश्किल से हासिल किए गए लोकतंत्र को इस तरह से बर्बाद नहीं होने दिया जा सकता। अभी दो दिन पहले भारत के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि पुलिस अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रही है और वह निर्दोष लोगों को झूठे केस में फंसाती है जिससे मुकदमों का अंबार बढ़ रहा है। पुलिस की कानूनी विरोधी और जन विरोधी कार्य प्रणाली के तहत इससे बड़ा और क्या सबूत हो सकता है कि जब भारत के न्यायाधीश भारत के पुलिस राज्य में तब्दील हो जाने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं।
उपरोक्त हालात के आलोक में हम यही कहेंगे कि पुलिस की कार्यप्रणाली को जनमित्र बनाने की जरूरत है। उसे अब जनता का दुश्मन बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती। हम जोर देकर कहेंगे कि पुलिस व्यवस्था और कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार किए जाएं और उसे पीपुल्स फ्रेंडली बनाया जाए और उसे सामंती, पूंजीपति, राजनीतिक आकाओं, जातिवादियों, साम्प्रदायिक ताकतों और धन्ना सेठों की गिरफ्त से बाहर निकाला जाए। हमारा यह भी कहना है कि यदि पुलिस को आजाद विभाग की तरह काम करने नहीं दिया जाए और उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप बंद किया जाए, तो भारत में कानून व्यवस्था की दशा सुधरेगी और असली अपराधियों को पकड़ने में भी मदद मिलेगी।
पर असली सवाल यह है कि पुलिस को आजाद विभाग के रूप में कब काम करने दिया जाएगा? हम रोजाना देख रहे हैं की विभिन्न तरह की राजनीतिक सोच ने, पुलिस को एक खिलौना बना दिया है और राजनीतिक दल पुलिस के कार्य में जबरदस्त हस्तक्षेप करते हैं और पुलिस से कानून विरोधी और संविधान विरोधी कार्यवाहियां करने को मजबूर करते हैं। पुलिस सही ढंग से अपना काम कर सके, इसके लिए पुलिस कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप को तुरंत रोकना होगा।
अभी कल हमने देखा कि किस तरह से शातिर और साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ाने वाले और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले अपराधी को बचाने के लिए, दिल्ली हरियाणा और पंजाब पुलिस को विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों ने, आपस में भिडा दिया और मामले को पुलिस बनाम पुलिस बना दिया। यह स्थिति बड़ी भयावह है और अफसोस जनक है। आज के जमाने में यह सबसे जरूरी हो गया है कि भारत को आर्थिक रूप में विश्व शक्ति बनने के लिए पुलिस को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार काम करना पड़ेगा। पुलिस एनकाउंटर जैसे काम करके पुलिस खुद को ही मुंसिफ का दर्जा देने का काम कर सकती। उसे इसकी इजाजत भी नहीं दी जा सकती, नहीं तो भारत एक बर्बर और असभ्य समाज में परिवर्तित हो जाएगा।
हमारी पुलिस के निष्पक्ष और पेशेवर आचरण से ही भारतीय राज्य की निष्पक्षता को आगे रखना होगा, उसे कानून के शासन के अनुसार और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अपने काम को अंजाम देना होगा और जनता का विश्वास जीतना होगा। उसे आज भारत को पुलिस राज्य बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

Ramswaroop Mantri

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