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जरूरत ’57 के इतिहास को आजाद नजर से देखने की

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अरुणकुमार त्रिपाठी

भारतीय राष्ट्रवाद की नींव….10 मई, 1857

आज जब भारत पर किसी औपनिवेशिक सत्ता का आतंक नहीं है और हम आजादी के साथ उसका अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो लाजिमी है कि हम अपने उस इतिहास को स्वतंत्र नजरिए से देखें और लोगों को यह बताएं कि भारतीय राष्ट्रवाद की नींव उपनिवेशवाद के विरुद्ध हिंदू-मुस्लिम एकता पर टिकी हुई है।

आजादी के अमृत महोत्सव के इस मौके पर 10 मई की तारीख का स्मरण बहुत आवश्यक है। यही वह दिन है जब 1857 में मेरठ के सैनिकों ने अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध बगावत करके अपने साथियों को जेल से छुड़ा लिया था और गांव वालों की मदद से अंग्रेज अधिकारियों से प्रतिशोध लेकर शाम को दिल्ली की ओर कूच कर दिया था। अगले दिन दिल्ली पहुंच उन सैनिकों ने बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह बताते हुए दिल्ली को आजाद घोषित कर दिया था। हालांकि देश भर के लोगों ने बगावत का दिन 31 मई तय किया था और योजना थी कि उसी दिन पूरे देश में अंग्रेजों पर एक साथ हमला बोलकर उन्हें भारत से सदा के लिए भगा दिया जाएगा। पर कलकत्ते से लगे बैरकपुर में मंगल पांडेय ने 29 मार्च को ही विद्रोह की शुरुआत कर दी थी और उसके लिए उन्हें 8 अप्रेल को फांसी भी दे दी गई थी। उसी तरह मेरठ में भी घटनाक्रम कुछ ऐसा घूमा कि तय तारीख से 21 दिन पहले ही बगावत हो गई।

अंग्रेज इतिहासकारों का मानना है यदि भारतीयों ने एक साथ हमला किया होता तो अंग्रेजों के पैर पूरी तरह उखड़ जाते। पर यह इतिहास का काउंटर फैक्टर है। इस पर बहस का कोई मतलब नहीं होता। यह बहस हमें ऐसे अखाड़े में उतारती है जहां कहा जाता है कि ऐसा होता तो वैसा होता। जबकि इतिहास का मतलब है कि ऐसा ही था।

आश्चर्य है कि 10 मई के गौरवशाली इतिहास को मनाने की शुरुआत भारत से नहीं बल्कि लंदन से हुई। भारत में तो ब्रिटिश सरकार के दमन का खौफ इतना था कि कोई उसका नाम लेने का साहस नहीं कर पाता था। यही कारण है कि भारतीय इतिहास के इस महान कालखंड का इतिहास भी यूरोपीय नजरिए से ही जेडब्लू के और जीबी मैलेसन द्वारा लिखा गया है। 1907 में जब इस विप्लव के पचास साल हुए तो अंग्रेजों ने सोचा कि क्यों न नील हेवलाक, हडसन कूपर और लारेंस जैसे अपने उन नायकों का गौरवशाली स्मरण किया जाए जिन्होंने क्रूरता की सारी हदें पार कर, निर्दोष औरतों और बच्चों पर नृशंस अत्याचार करके गदरियों का दमन किया था। अंग्रेजों की इसी कोशिश की प्रतिक्रिया में इंग्लैंड में रह रहे बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर के नेतृत्व में ‘अभिनव भारत’ के साथियों ने इसे मनाने का सिलसिला शुरू किया। उनका ख्याल था कि क्यों न हम अपने नाना साहेब, झांसी की रानी, तात्या टोपे, वीर कुंवर सिंह और मौलवी अहमदउल्लाह और अजीमुल्ला खां की वीरता को याद करें।

निश्चित तौर पर 10 मई की इस घटना में विद्रोही सैनिकों की ओर से भी हिंसा हुई, पर उस हिंसा को भड़काने की सारी जिम्मेदारी उन विदेशी शासकों पर जाती है जो भारतीयों के धर्म, स्वाभिमान व संसाधनों से खिलवाड़ कर उनसे पशुवत व्यवहार करने पर आमादा थे। मेरठ में जिन 85 सैनिकों ने गाय व सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को हाथ लगाने से मना कर दिया था उनमें 48 मुसलमान और 37 हिंदू थे। अंग्रेजों ने सबके सामने उनके हाथों में हथकड़ियां, पांवों में बेड़ियां डाली थीं और तब भारतीयों का खून खौल उठा था। 10 मई की इस तारीख को सावरकर ने ही नहीं मनाया बल्कि विदेशों में बसे तमाम भारतीयों ने मनाने का सिलसिला शुरू किया। अमरीका में गदर पार्टी वालों ने उसे अपनाया, उस पर भगत सिंह ने ‘किरती’ अखबार में ‘दस मई का शुभ दिन’ जैसा प्रसिद्ध लेख भी लिखा।

सवाल उठता है कि 10 मई और उससे निकले 1857 के महासंग्राम को बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में खड़े हुए कांग्रेस के आंदोलन ने जोर-शोर से क्यों नहीं मनाया? यह भी सवाल है कि भारत के आजाद होने के बाद भी इतिहासकारों ने 1857 के साथ न्याय क्यों नहीं किया? रमेश चंद्र मजुमदार और सुरेंद्रनाथ सेन और ताराचंद जैसे भारतीय इतिहासकारों ने साफ लिखा है कि अव्वल में तो सत्तावन के विद्रोह को सफल नहीं होना था और अगर सफल हो जाता तो भारत पिछड़ा रह जाता। जबकि कार्ल मार्क्स जैसे क्रांतिकारी विचारकों ने भी भारतीय क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए अंग्रेजों की इस बात के लिए पीठ थपथपाई है कि उन्होंने भारतीय ग्रामीण समाज के तानाशाही ठहराव को तोड़ दिया और इतिहास के जादुई उपकरण बनते हुए पूंजीवाद के विकास का रास्ता साफ किया है।

इसलिए आज जब भारत पर किसी औपनिवेशिक सत्ता का आतंक नहीं है और हम आजादी के साथ आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो लाजिमी है कि हम अपने उस इतिहास को स्वतंत्र नजरिए से देखें और लोगों को यह बताएं कि भारतीय राष्ट्रवाद की नींव उपनिवेशवाद के विरुद्ध हिंदू-मुस्लिम एकता पर टिकी हुई है और अगर यह एकता भंग होती है तो आजादी और राष्ट्र हासिल होने के बावजूद हमारा विभाजन होता है।

Ramswaroop Mantri

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