रजनीश भारती
सन्1945 में आठ मई को हिटलर की सेना ने आत्मसमर्पण किया था, और 9 मई को सोवियत संघ ने फासीवाद पर विजय की घोषणा किया था। यह मजदूर वर्ग की सरकार थी जिसने पूरी दुनिया को हिटलर, मुसोलिनी और तोजो के ताप से बचाया था।
आपको मालूम होगा कि 1844 में मार्क्स ने कहा था, अब विश्व इतिहास के भविष्य का नायक पूंजीपति नहीं मजदूर वर्ग बनेगा। तब किसी को यकीन नहीं हो रहा था। फरवरी 1848 में मार्क्स एंगेल्स द्वारा लिखित कम्यूनिस्ट पार्टी घोषणापत्र का प्रकाशन हुआ था जिस प्रभाव से मजदूरों का आन्दोलन बढ़ने लगा। 1871 में पेरिस कम्यून क्रान्ति हुई जिसमें मजदूरों ने फ्रान्स में पूंजीपतियों का तख्ता पलट दिया, 72 दिन सरकार चलाई इसके बाद कई देशों के पूंजीपतियों ने अपनी सेना के बल पर मजदूर वर्ग की पहली सत्ता को खून की दरिया में डुबो दिया था। इसके बाद मजदूरों किसानों ने अपनी कम्यूनिस्ट पार्टी बनाकर 1917 में 142 लाख सैनिकों वाली रूस की जारशाही हुकूमत का तख्ता पलट दिया। इसके बाद दुनिया भर के पूंजीपति कांप उठे।
सभी मिलकर मजदूर वर्ग की राजसत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए युद्ध छेड़ दिया। परन्तु टस से मस नहीं कर सके। फिर 1939 में बाजार के पुनर्बंटवारे के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच महायुद्ध शुरू हो गया। स्टालिन ने रूस को साम्राज्यवादी युद्धों से अलग करने के लिए हिटलर से अनाक्रमण संधि कर लिया था। इंग्लैंड और उसके कई सहयोगी देश तथा कई दर्जन गुलाम देश एक तरफ थे दूसरी तरफ थे इटली, जापान और जर्मनी।
जर्मनी का तानाशाह हिटलर जापान तानाशाह तोजो और इटली का तानाशाह मुसोलिनी था। तीनों की फासीवादी तिकड़ी से विश्व के बड़े-बड़े शूरमा काँप रहे थे। उनकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि फ्रान्स जैसा ताकतवर देश एक हफ्ता नहीं टिक पाया और हथियार डाल दिया। एक-एक करके सभी पड़ोसी देशों को जीतते हुए हिटलर इतना ताकतवर हो चुका था कि उसकी भारी बमबारी से त्रस्त होकर इंगलैण्ड जैसा देश भी आत्मसमर्पण करने जा ही रहा था कि इसी वक्त हिटलर ने अनाक्रमण संधि तोड़कर रूस पर हमला कर दिया जिससे इंग्लैंड को थोड़ी राहत मिल गयी। दरअसल दुनियाभर के पूंजीपतियों ने जब देखा कि अब हिटलर जैसा एक महादानव तैयार हो चुका है, जो सोवियत संघ को निगल सकता है और मजदूर वर्ग की इकलौती राजसत्ता को उखाड़ कर फेंक सकता है तो सारे पूंजीपतियों ने हिटलर की पीठ ठोंककर रूस पर हमला करवा दिया। हमला करते समय हिटलर ने घोषणा किया था कि हम तीन महीने में रूस को नेस्तनाबूद कर देंगे। मगर पन्द्रह दिन के अन्दर ही जब जर्मन सेना मास्को तक पहुंच गयी तो दुनिया के बड़े-बड़े पूंजीवादी रणनीतिकारों को लगने लगा कि अब तो एक महीने में ही रूस घुटना टेक देगा। गांधी जी को भी ऐसा ही लगने लगा था। शायद इसीलिए वे ब्रिटिश साम्राज्य की स्वामिभक्ति छोड़कर हिटलर को ‘डीयर फ्रेंड’ जैसे शब्दों से संबोधित करते हुए कई चिट्ठियां लिखे थे। उस वक्त अंग्रेजों ने गांधी जी को जर्मन का एजेण्ट तक कहा था। बहरहाल जब हिटलर की सेना 15 दिन में ही मास्को तक पहुंच गयी थी तो बहुत लोगों ने सोचा कि चन्द दिनों में ही स्टालिन की लालसेना हथियार डाल देगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। दरअसल बात ये थी कि लालसेना जानती थी कि हिटलर की सेना के हथियार हमसे ज्यादा उन्नत तकनीकों से बने हैं, अत: आमने सामने की लड़ाई में उसे परास्त नहीं किया जा सकता। उसे गुरिल्ला वार से ही पछाड़ा जा सकता है। इसी रणनीति के तहत हिटलर की सेना को अंदर घुसने दिया गया। इसके बाद युद्ध के मुख्य रूप में गुरिल्ला युद्ध को अपनाया गया। छापामार युद्ध में हिटलर की सेना को हराते हुए उनसे हथियार छीनते हुए उन्हीं के उन्नत हथियारों से उन्हीं को पछाड़ते हुए रूस की लाल सेना जीत पर जीत दर्ज करने लगी। इस दौरान लाल सेना ने कई उन्नत हथियारों को भी ईजाद किया।अप्रैल 1945 आते-आते रूस की लाल सेना जर्मन की राजधानी बर्लिन के करीब पहुंच गई। स्टालिन के ताप से डरा हुआ था। जिस हिटलर से पूरी दुनिया खौफ खाती थी, वह हिटलर स्टालिन के ताप से डर कर तहखाने में छिपा हुआ था। जब उस को बताया गया कि लाल सेना बर्लिन से महज 12 मील दूर है। यह सुनकर हिटलर कांप उठा और वहीं जहर खा कर मर गया।
*रजनीश भारती**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा*





