अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

मूर्त्तिपूजा और यथार्थ

Share

डॉ. विकास मानव

     _12 से 1 के बीच सोता हूँ, 5 बजे के लिए.. आज नीद 3 बजे रात मे आई और चार बजे उठना हो गया। बिस्तर पर बैठे-बैठे अचानक विचार मे आया कि नीचे तो टाइल्स लगी है. इन्ही पत्थरों को अनेक स्थानों से खोदकर इकट्ठा करते हैं, और मंदिर/मस्जिद  बना लेते हैं. मूर्त्ति भी अपनी कल्पनानुसार बनाकर बिठाते और पूजा करते हैं।_
     तो इस पत्थर और उस पत्थर मे केवल कलाकारी का अंतर कहलाया, फिर इस पत्थर पर पैर क्यो़ रखें? आखिर भगवान् तो इस पत्थर मे भी हैं। प्रायः हम चैतन्यतापूर्वक बार-बार स्वयं से ही तर्क करते रहते हैं, पर आज कुछ विशेष ही हो गया।

इस मंचपर भी मूर्तिपूजा के विरोध मे तर्क देकर उसे अंधविश्वास ही समझा जाता है और उसके पक्ष मे भी तर्क दिए जाते हैं कि मूर्तिपूजा अन्धविश्वास नही है।


हमारे मष्तिस्क मे भी इसपर अंतर्द्वन्द चलता रहता है. फिर दोनों पक्ष सत्य लगते हैं. किसी की मान्यता अलग बात है, उससे छेड़छाड़ नही करना चाहिए, लेकिन यथार्थ बात जो विदित होती है उसे ही वेद कहते हैं, इस सिद्धांत के आधारपर यह कहना तो बनता ही है कि मूर्तिपूजा अज्ञान है।
कैसे किः-
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
यह श्रीकृष्णगीता अ०/९/४ का श्लोक है, जिसका अर्थ जैसा कि हमने समझा है कि जो व्यक्त जगत् है (यानी अ०/७/४/मे वर्णित प्रकृति) वह निराकार की मूर्ति बन गयी. इसके बाद इसमें जीव का (अ०/७/५) का संयोग हो गया।
अब यदि हम मानलें कि व्यक्त जगत् उसकी मूर्ति है तो है, प्रमाणित है,दिखाई दे रहा है, हम प्रतिपल इनकी पूजाकर रहे हैं। इसमे सूर्य्य,द्यौ,वायु, अंतरिक्ष, पृथिवी सभी हैं और सभी की हम पूजा करते हैं।
पूजा का अर्थ यदि,,पूज्यति, निवेदयति, प्रार्थयति, स्तोमयति है तो नित्यपूजा, नित्य उत्सव है, आनन्द है। किसी घनघोर जंगल मे नदी है, पहाड़ है,बर्फ पड़ रही है स्वयं जाने पर पता चल जाता है कि यहीं परमानन्द है, वापस आने तक की इच्छा नही होती।
बद्री,केदार, माऊन्ट आबू,वैष्णोदेवी, नैनीताल,पचमढ़ी, मसूरी या झील पर्वत, नदी के तट पर बैठने का आनंद कुछ और ही है।
इसी पत्थर के टुकड़े को तराशकर घर मे रख लिया और उसी को परमात्मा मान लिया तो खंडित होने के कारण उसका टुकड़ा(छोटा सा अंश) रह गया।
अब यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हमे इसी टुकड़े मे ही आनंद है या सर्वतोभाव मे। श्रीकृष्ण का आशयमात्र ज्ञान और अज्ञान को समझा देना था। आगेवाला कार्य अर्जुन का था वह लड़े या सरेन्डर कर दे।
यदि हमारा लक्ष्य परमात्मा का सम्पूर्ण स्वरूप है तो हमारे लिए मूर्तिपूजा का कोई शास्त्रीय आधार नही है.
यदि उसके १/४/ भाग का है तो भी यह सम्पूर्ण प्रकृति ही है और यदि १/२/ भाग का है तो इसमे चेतनशक्ति के साथ मिलाकर जानने की कोशिश मे भी जानने मे नही आएगा.
और यदि सम्पूर्ण का सेवन(पूजन) करना है तो वहाँ गीता/७/१९/ तत्काल लागू हो जाएगा।
[चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें