
सुसंस्कृति परिहार
जबलपुर की सामाजिक संस्था है कदम जिसकी स्थापना बीस जनवरी ,1995 को समग्र उत्तरदायित्व बोध के साथ जीवन जीना जैसी सोच को साकार करने के लिए की गई।इसी सोच के तहत दायित्व बोध यात्रा के साथ वृक्षारोपण को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है।कदम ने प्लांट फार पीस के तहत 17 जुलाई 2004 से जन्मोत्सव पर पौधारोपण का प्रारंभ किया इसलिए 17जुलाई यह कदम पौधारोपण दिवस के नाम मनाया जाता है।अब तक इनके असंख्य पोधे पेड़ बन गए हैं । इसके साथ ही 17मई के दिन को समग्र उत्तर दायित्व दिवस मनाते हैं।
इस बार इस दिवस पर ‘समग्र उत्तर दायित्व बोध’ पर नगर के सुपरिचित कथाकार ज्ञानरंजन जी को इसी विषय पर व्याख्यान देने आमंत्रित किया गया जो शहर के इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना बतौर याद की जाएगी।वज़ह यह है कि अमूमन ज्ञानरंजन जी साहित्यिक सांस्कृतिक संगोष्ठियों में अभी तक अपनी तमाम ऊर्जा का इस्तेमाल करते रहे हैं।इसके साथ पहल पत्रिका उनकी पहचान है।वे मंच पर कभी कभार ही नज़र आते हैं वे अक्सर वह पिछली पंक्ति में ही दिखाई देते हैं।उनका इस आयोजन में पहुंचकर संबोधित करना आश्चर्य जनक रहा।उनके कारण ही इस आयोजन में साहित्य और कला जगत से जुड़े लोग भी पहुंचे। उन्होंने अपने संबोधन में पहले इस बात ज़िक्र भी किया कि क़दम संस्था के निर्माता योगेश गनोरे जी के लम्बे और निरन्तर आग्रह के बाद बहुत संकोच के साथ आज मैं यहाँ उपस्थित हूँ।
विषय पर आते हुए कहा आज हमारी दुनिया में क्या हो रहा है। बीसवीं सदी के बाद अब इक्कीसवीं सदी में सत्ता, राजनीति, समाज, संस्कृति, पर्यावरण और शक्ति की संरचनाओं के सम्मुख मनुष्य की नियति से जुड़े जो कठिन प्रश्न उठे हैं उनका सामना कठिन हो गया है।हमारे समय में करोड़ों चीज़ें गायब हो रही हैं। यह चोरी नहीं सभ्यता पर डकैती है। क्योंकि गायब होने की गति तूफानी है। यह कैसा समय है कि जल्लाद आनंद से झूम रहे हैं ।वे मानते हैं हमारी दुनिया विकल्पहीन नहीं है, पर उस तक पहुँचने के लिए कठोर क़दम उठाने होंगे। समग्र दायित्वबोध एक चुनौती है; इसमें एक नहीं असंख्य चुनौतियाँ शामिल हैं। इन्हें दिमाग के दर्पण में देखें और विमर्श करें। छोटे-छोटे समूह बनायें और क़दम बढ़ाएं। क़दम की तस्वीर अभी तो सुन्दर है। कभी-कभी तस्वीरें और छवियां एक व्यक्ति के जीवन में दूर भविष्य तक जीवित रह सकती हैं। धलेकिन जब विस्तार होता है तो भीड़ सदस्य बनने लगती है। चेतना मंद होने लगती है। उद्देश्य की पवित्रता सफलताओं के आगे सोने लगती है।
सुख मिलने लगता है। आप जो क़दम के नियंता हैं, योजनाकार हैं, बलिदानी हैं, संगतकार हैं कैसे देखेंगे कि मात्र श्रेय लेने वाले भी तो आपके आंगन के चारों तरफ नहीं मंडरा रहे हैं।बहरहाल, आप जिस सीढ़ी पर हैं वहाँ से भविष्य को देखने के लिए गजानन माधव मुक्तिबोध की कुछ सुनहरी पंक्तियों का उदाहरण दूंगा -‘‘वीरान मैदान, अंधेरी रात, खोया हुआ रास्ता, हाथ में एक पीली मद्धम लालटेन। यह लालटेन समूचे पथ को पहले से उद्घाटित करने में असमर्थ है। केवल थोड़ी सी जगह पर ही उसका प्रकाश है। ज्यों ज्यों वह क़दम बढ़ाता जायेगा, थोड़ा थोड़ा उद्घाटन होता जायेगा। चलने वाला पहले से नहीं जानता कि क्या उद्घाटित होगा। उसे अपनी पीली मद्धम लालटेन का ही सहारा है। वह शुरू में यह भी नहीं बता सकता कि रास्ता किस ओर घूमेगा और किन किन वास्वतिकताओं का सामना करना पड़ेगा।’’इससे पूर्व सामाजिक कार्यकर्ता प्रो० भारती शुक्ला ने सहभागिता करते हुए कहा कि समग्र दायित्व बोध को समझने के पहले हमें समग्रता को समझना जरूरी है इस संदर्भ में जब मैने सोचा तो महसूस हुआ कि हम किस कदर खंडित जीवन जीते हैं और खंड खंड पाखंड रचते रहते हैं जीवन भर।समग्र दायित्व बोध में प्रकृति भी शामिल है,तमाम लेंगिकताएं भी शामिल है।
प्रकृति पर की चर्चा होते ही हम अक्सर यह कहते हैं सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट ही प्रकृति है या फिर हम कहते हैं प्रकृति सह अस्तित्व है जब की प्रकृति ना तो सह अस्तित्व है ना ही सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट बल्कि यह एक हिंसक विचार मुझे लगता है प्रकृति मैं कहीं भी कोई मूल्य निर्णय नहीं है हर स्पंदन प्रकृति में जैसा है वैसा ही ही है ना कोई छोटा ना, कोई बड़ा, ना गोरा ना ,काला यह हमारी भाषा की संरचना और हमारे मूल्य निर्णय हैं इसलिए प्रकृति से हमें यह सीखना होगा की समग्रता क्या है प्रकृति हमें मुक्त होना भी सिखाती है और यह मुक्ति वह आध्यात्मिक मुक्ति नहीं है जो हमें हिमालय की कंदरा में भेज दे बल्कि यह मुक्ति वर्चस्व से मुक्ति है, पितृसत्ता से मुक्ति है, हिंसा से मुक्ति है जातीयता के अंधेरों से मुक्ति है यदि हम पूरे समाज को इस समग्रता में समझे तो हमारे दायित्व बोध भी इसी तरह समग्र हो सकेंगे। आदिवासी जीवन शैली में हम इस मुक्ति और आल्हाद को महसूस कर सकते हैं जहां यौनिक हिंसा नहीं है बलात्कार नहीं है इसलिए हमें अपने वर्तमान के असंतोष से निपटने के लिए किसी काल्पनिक दुनिया में जाने की जरूरत नहीं है बल्कि वह दुनिया हमारे सामने हैं सिर्फ उसे स्वीकृति देने की बात है मुझे समग्रता की अनुभूति गांधी की अहिंसा में भी होती है और अंबेडकर की न्याय की अवधारणा में भी क्योंकि दोनों का रास्ता समानता से होकर गुजरता है।
इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए दूसरे सहभागी वक्ता वरिष्ठ पत्रकार और आलोचक नंदलाल सिंह ने माना कि वास्तव में वसुधा पर खतरा नागर सभ्यता द्वारा अरण्य संस्कृति पर हुए हमलों से प्रारंभ हुआ है। तपस्वियों मुनियों की जमात ने वन परिक्षेत्र में प्रविष्ट होकर जब यज्ञों पशुबलियों के माध्यम से अरण्य का पर्यावरणीय संतुलन बिगाड़ा। हालांकि तथाकथित जंगल के जंगली लोगों ने प्रतिकार किया यह सिलसिला आज भी जारी है।वसुधा आज मां जैसा सम्मानीय दर्जा खो चुकी है वह वीरभोग्या बन चुकी है।जिस संत्रास को आदिवासी क्षेत्र से निकली वंदना टेटे की कविता से उन्होंने कराया । हमें आदिवासियों के अपरिग्रही जीवन से धरती को बचाने की प्रेरणा लेनी होगी।सबसे पहले इस विषय पर युवा लेखक निशांत कौशिक ने समग्र उत्तरदायित्व को काफी विस्तार से रेखांकित किया ।
कुल मिलाकर आज धरा जो पीड़ाजनक स्थितियां हैं उनकी वजह हमारा प्रकृति विरोधी रुख ही है। प्रकृति को बचाना है तो उसके संसाधनों की रक्षा का उत्तरदायित्व भी लेना होगा वृक्ष लगाने के साथ वृक्ष बचाने की ज़रूरत है। इसके लिए संगठित प्रतिकार की क्षमता भी जुटानी होगी। हिमालय से लेकर अरब सागर मुंबई के लोग भी कटते जंगल से जूझ रहे हैं। आदिवासी क्षेत्रों में संघर्ष जारी है।कदम संस्था को भी अपना दायरा शहरों से बढ़ाकर कटते जंगलों तक ले जाना होगा।तभी समग्र उत्तर दायित्व दिवस मनाना पूर्ण सफल और सार्थक पहल होगी।इस सफल आयोजन के विषय की प्रस्तावना एवं सुसंचालन कवि विवेक चतुर्वेदी ने किया।Attachments area





