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शिव के नाम पर कोहराम, हिन्दू- मुसलमान और शिव-तत्व

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ज्योतिषाचार्य पवन कुमार

  _शिव को लेकर एकबार फिर वैसा ही कोहराम खड़ा किया जा रहा है ,जैसा तीन दशक पूर्व राम को लेकर किया गया था . कृष्ण को लेकर भी होगा .लेकिन कुल मिला कर देश को इन सबसे मिलेगा क्या !_
      मुसलमानों से बदले का फलसफा तो समझ में आता है .लेकिन हम और किन -किन से बदला लें ? यहाँ के मूलनिवासी आर्यों की औलादों  से बदला लें कि तुम्हारे पुरंदर ने हमारे नगरों को ध्वस्त कर दिया ;या क्षत्रिय जन ब्राह्मणों से बदला लें कि तुम्हारे फरसाराम ने हमारे लोगों का इक्कीस  बार संहार किया.
  _यहाँ के शूद्र द्विजों से और अफगान -पठान मुग़ल संततियों से बदला लें . या हम सब मिल कर एक दफा इंग्लैंड पर हमला क्यों नहीं करें ?_ 
  1970 के दशक में हमारी पीढ़ी युवा थी . हमलोग इक्कीसवीं सदी का स्वप्न देखते थे . हम कल्पना करते थे कि उस सदी में समाजवादी व्यवस्था होगी . सब सुशिक्षित ,रोजगारशुदा , सुखी और प्रसन्न होंगे.
 _खूब अवकाश होगा लोगों के पास और घर -घर में ऐसा सांस्कृतिक माहौल होगा कि लोग अतिथियों से काव्य -चर्चा करेंगे._
   लोगों में धार्मिकता की जगह आध्यात्मिकता विकसित हो चुकी होगी और हर व्यक्ति विश्व -नागरिक होगा . लेकिन आह ! कैसी दुनिया में आ गए हमलोग . लोग अधिक हिन्दू अधिक मुस्लिम हो गए.

ओबैसी ,मोहन भागवत और पादरी -पुरोहित -मुल्ले हमारी छाती पर आकर बैठ गए . अपने युवा दौर में हम चाँद पर जाने वाले नील आर्मस्ट्रांग और प्यार व क्रांति के कवि पाब्लो नेरुदा की चर्चा करते थे ,आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चर्चा करने केलिए अभिशप्त हैं.
हमारे मन में भी तब राम ,कृष्ण ,शिव थे ; लेकिन उनका अपना अंदाज़ था . वे सब हमारे जेहन के हिस्सा थे , हमारी धड़कन थे . हम पौराणिकता और इतिहास के अन्तर्सम्बन्धों को समझते थे और उन्हें माथे पर ढोते नहीं , उनसे खेलते और खुलते थे.

शिव के बारे में :
हिन्दू -पौराणिकता में शिव और कृष्ण मुझे कुछ अधिक आकर्षित करते हैं . राम के प्रति मेरा आकर्षण कम है . लेकिन उनकी कथा पर केंद्रित रामायण मुझे प्रभावित करती रही है . यह इसलिए नहीं कि उसमें राम की कथा है ; बल्कि इसलिए कि उसमें राम द्वारा रावण के पराजित होने और फिर लव -कुश द्वारा उनके पिता राम के पराजित होने की कथा है.
राम -रावण युद्ध से कहीं आकर्षक राम और उनके पुत्रों के बीच का युद्ध है ,जिसमें राम पराजित होते हैं . लेकिन शिव -कथा अजीब है . उस कथा में कोई युद्ध नहीं है . शिव और उनके गृहस्थ -जीवन की कथा है . इस कथा में शिव का अल्हड़पन ,उनका मस्त जीवन ,उनका प्रेम ,उनकी तंगहाल गृहस्थी जैसी चीजें हैं.
राम और कृष्ण की तरह वह न अवतार लेते हैं ,न राजा बनते हैं . वह आमजन से भी नीचे स्तर का जीवन जीते हैं . कोई व्यक्तिगत पूँजी नहीं है उनके पास . बाघ और हिरन का छाला ,डमरू , त्रिशूल , गले में सांप और नंदी बैल, जिसे हमलोग बसहा कहते थे . वृहत्तर रूप में जो शिव हैं उनकी जटाओं में गंगा और माथे पर चन्द्रमा है.
पूरा वाला चन्द्रमा नहीं . दूज का नाज़ुक -सा चाँद . इस रूप पर मैं बार -बार सोचता हूँ और हैरान होता हूँ . शिव की निर्मिति जिस भारतीय जन -मन ने की है,उसके सामूहिक मनोविज्ञान और उसकी सौन्दर्यवृत्ति पर मैं नतमस्तक होता हूँ . हिन्दू पौराणिकता का यह ‘ सर्वहारा- देवता ‘ हमारे कानों में कुछ कहना चाहता है . वह इस आधुनिक ज़माने से भी संवाद करना चाहता है.
शिव अजूबा देवता है . लोकदेवता . जन या गणदेवता . और शायद इसीलिए उन्हें महादेव कहा गया . देवताओं के भी देवता . सिंधु सभ्यता में संभवतः यही पशुपति हैं . वह ऊँचे पहाड़ों पर निवास करते हैं . गिरिजन हैं.
कैलाश पर्वत पर होने से उन्हें कैलाश बिहारी कहा गया . ऋग्वेद में शिव तो नहीं हैं , लेकिन होशियार लोगों ने उन्हें रूद्र के रूप में देखा है. ऊँचे मानसरोवर से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम तक उनकी व्याप्ति है.
सोमनाथ , ओम्कारेश्वर, मल्लिकार्जुन ,महाकालेश्वर ,नागेश्वर , काशीविश्वनाथ ,बैद्यनाथ ,त्रियंबकेश्वर ,गरिनेश्वेर और केदारनाथ उनके ख़ास अड्डे हैं . ऐसा फैलाव किसी अन्य हिन्दू देवता का नहीं है . हिन्दू पौराणिकता के दस अवतारों में वह नहीं हैं.
लेकिन कहा जा सकता है कि वह इन सबसे ऊपर और कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं . फागुन महीने के कृष्ण -पक्ष की तेहरहवीं तारीख को लोग शिव – दिवस के रूप में मनाते हैं. इस तारीख को महाशिवरात्रि कहा जाता है . उनका जन्मदिन नहीं है यह.
अजन्मे का जन्मदिन क्या होगा ! यह तारीख शिव के विवाह की है . उनके प्रेम की है . इसी रोज गौरा ने अपने तप यानी कठिन -प्रेम से उन्हें हासिल किया था . पश्चिम में लोग वैलेंटाइन दिवस मनाते हैं . लगभग वैसा ही . भारत भर की हिन्दू स्त्रियां शिव को अपनी पूजा -अर्चना से खुश कर देना चाहती हैं . वही उनके आराध्य हैं.
कृष्ण से भी बड़े . कृष्ण तो द्वारिकाधीश थे . अपुन शिव तो औघड़ हैं . कुछ नहीं है ,उसके पास ;और सबकुछ है . . हमारी जनता की उत्सवप्रियता धन्य है . उत्तर -दक्खिन ,पूरब -पश्चिम सभी दिशाओं के भारतीय हिन्दू पूरे उत्साह के साथ इसे श्रद्धा पूर्वक त्यौहार का रूप देते हैं . फिर हर साल सावन महीने के हर सोमवार को पूजा -अर्चना की होड़ हो जाती है.
पौराणिक शिव की जमात में भूत -पिशाच भी होते थे . आज उनके भक्तों की जमात में प्रधानमंत्री होते हैं . कथा है एक दुष्ट ने शिव की पूजा की और उनके ही दिये वरदान से उन्हें मारने की कोशिश की . शिव भागते रहे ,दुष्ट उन्हें खदेड़ता रहा . इतने भोले हैं वह . हमारे प्रधानमंत्री ने थोड़ी -सी पूजा -अर्चना की और तीन सौ से अधिक सीटें झटक ली . कमाल के हैं शिव ! कुछ भी नहीं देखते किसे क्या दे रहे हैं . इसे ही कहते हैं ,औघड़ -दानी ! भोले -बाबा.
मैं नहीं समझता उन के चरित्र की और अधिक व्याख्या की कोई आवश्यकता है . हर भारतीय उनसे ,उनकी कथा -परंपरा से सुपरिचित है.

लोकगीतों ,संस्कार गीतों में सब से अधिक जो एक देवता प्रतिष्ठित है ,वह शिव है . विशेष कर हिन्दू घरों में होने वाले विवाह- संस्कार में शिव केंद्रीय देवता होते हैं. मांगलिकता , शुभता , कल्याण आदि के मूर्त रूप . हर विवाहित जोड़ा शिव की अभ्यर्थना करना चाहता है.
खास कर कुमारी कन्यायें सोलह सोमवारों को विधिपूर्वक शिव की इसलिए अराधना करती हैं कि उन्हें शिव जैसा दिलदार पति मिले . शिव राजा नहीं हैं ,रंक हैं . बघछाले के वस्त्र में रहने वाले औघड़ जीव . डमरू की डमडम , भांग -धतूरे का व्यसन ,जो मिल गया खा लिया ,नंदी की सवारी और कुल मिला कर गंगा और चन्द्रमा की पूँजी.
यही तो है शिव -स्वरूप जिस पर भारतीय नारियां जाने कब से फ़िदा हैं . इन नारियों को समझने में हमारे साहित्य और संस्कृति ने प्रायः अनुदारता का ही परिचय दिया है.

शिव ऐसे पुरुष हैं जिन्हे अपने पुरुष होने का कोई घमंड नहीं है . यह सच है कि वह थोड़ा -सा स्त्री भी होना पसंद करते हैं . वह न अपने प्रेम को छुपाते हैं ; न ही अपनी यौनिकता को . वह पूरे मर्यादित हैं ,लेकिन रामचंद्र की तरह ‘मर्यादा – पुरुषोत्तम ‘की ताबीज नहीं लटकाये घूमते.
वह हर जगह हैं ; और कहीं नहीं हैं . करुणा ,दया और प्रेम के प्रतिरूप शिव किसी को डराते नहीं . वह आश्वस्त करते हैं . खुद मगन रहते हैं और सब को मगन रहने का अनकहा सन्देश देते हैं.
मैं काशी इलाके का हूँ . हमारी जुबान में लोकगीतों का जो समंदर है ,उनमें शिव कई रूपों में आते हैं . लेकिन उनका एक रूप सामान्य है . उनकी फटेहाल गृहस्थी से लोक – मन यथसंभव खेलता है . इन लोकगीतों को सामान्य तौर पर अनाम स्त्री रचनाकारों ने गढ़ा है.
अपने दुःख को शिव के साथ नत्थी कर वे तनिक हल्का हुई होंगी . उनके दुःख में उनके देवता साझीदार हो गए . इससे बड़ी उनकी उपलब्धि और क्या हो सकती है . एक गीत में पार्वती भात बनाने केलिए पतीले में अदहन चूल्हे पर रख कर धान कूटने का यत्न करती हैं और धूप में सूखने केलिए फैलाये उस धान की तरफ बढ़ती हैं जिसे कूट कर उन्हें चावल निकालने हैं.
लेकिन यह क्या ! भूखे नंदी ने धान खा लिया . अब बिचारी पार्वती करे तो क्या . बच्चे गणेश और कार्तिकेय बिलबिला रहे हैं . उन्हें क्या कहे ? गुस्से में अदहन उतार कर रख देती हैं और शिव से लड़ बैठती हैं . ऐसी फटेहाली है , जानती तो मैं विवाह नहीं करती.
वह शिव को गुस्से में ‘ लंगटा -कंगाल ‘ कहती हैं . पारिवारिक कलह चरम पर है . पार्वती आठ -आठ आंसू रो रही हैं और शिव की भर्तस्ना कर रही हैं . शिव भी कितना बर्दास्त करें . वह भी गौरा को जवाबते हैं :
देख अइली गौरा तोरा नैहरा के चाल
कोदो के भात मिलल , कुर्थी के दाल
बथुआ के साग देख के ठोकली कपाल
काहे कहल कंगाल ?
(चुप करो गौरा ! तुम्हारे मायके का हाल भी देख आया हूँ . जाने पर क्या मिला था खाने में ? कोदो का भात और कुर्थी के दाल . बथुआ का साग देख कर तो मैंने माथा ही पीट लिया था . मुझे कंगाल कहने के पहले अपने मायके पर भी सोचो .तुम भी कोई अमीर घर की नहीं हो .)
मैंने सुना है इसी आशय के लोक- गीत दूसरी बोलियों में भी हैं . ये गीत केवल यह कहते हैं कि शिव भारतीय जनमन के अंतर्मन से गहरे जुड़े हैं . वह केवल मंदिरों से जुड़े नहीं हैं.
इस पर विवाद हो सकता है कि शिव कितने हिन्दू हैं . हिंदुत्व का आधार यदि वर्णत्व है ,तब शिव उससे किनारे रहते हैं . शिव को वर्ण -धर्म में बांधना कभी संभव नहीं हुआ . शैवों ने वर्ण -धर्म की हर ज़माने में उपेक्षा की.
कर्णाटक का लिंगायत धर्म शैव है वह वेदों और वर्णधर्म की उपेक्षा करता है. यह अलग बात है अन्य कई चीजों की तरह शिव पर भी वर्णाश्रमी पुरोहितों ने कब्ज़ा जमा लिया है. लेकिन इसकी अलग कहानी है.
[चेतना विकास मिशन]

Ramswaroop Mantri

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