रोशन किशोर, आर्थिक समीक्षक
भारत की थोक मुद्रास्फीति अप्रैल में 15.08 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 27 वर्षों में सबसे अधिक है। इतनी महंगाई के लिए बड़े पैमाने पर बिजली और ईंधन की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी मुख्य रूप से जिम्मेदार है। महंगाई दर लगातार 13वें महीने में दोहरे अंकों में रही है। महंगाई के अंतर्निहित कारणों में वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में बाधा और यूक्रेन युद्ध भी शामिल हैं। 12 मई को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने डाटा जारी किया, जिसमें यह दिखाया गया है कि खुदरा मुद्रास्फीति, जैसा कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापा गया था, जो इस अप्रैल में 7.79 प्रतिशत थी, वह अप्रैल 2014 के 7.87 प्रतिशत के बाद उच्चतम स्तर पर है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा 17 मई को जारी आंकड़ों से पता चलता है कि थोक मूल्य सूचकांक द्वारा मापी गई मुद्रास्फीति अप्रैल में 15.08 प्रतिशत हो गई है। यह मार्च 1995 के बाद से भारत में सबसे अधिक थोक मुद्रास्फीति दर है।
थोक कीमतों से बढ़ती महंगाई को ठीक से समझा जा सकता है। मिसाल के लिए, अप्रैल 2011 में जो चीज 100 रुपये की थी, वह नवंबर 2020 में 125 रुपये की हो गई, 100 रुपये को 125 रुपये तक पहुंचने में 115 महीने लग गए। लेकिन इसके बाद के 17 महीनों में यानी अप्रैल 2022 में वही चीज 150 रुपये से ज्यादा की हो गई। मतलब विगत कुछ ही महीनों में महंगाई बहुत तेजी से बढ़ी है। आखिर थोक कीमतों में इतनी तेज वृद्धि के क्या कारण हैं? इस तेजी के अनेक कारण हैं। थोक मूल्य सूचकांक की सभी तीन मुख्य उप-श्रेणियों : प्राथमिक वस्तुओं (22.6 प्रतिशत भार), ईंधन व बिजली (13.15 प्रतिशत भार) और विनिर्मित उत्पादों (64.23 प्रतिशत भार) में नवंबर 2021 के बाद से मुद्रास्फीति दोहरे अंकों में बढ़ रही है। हालांकि, केवल ईंधन और बिजली उप-श्रेणी की बात करें, तो अक्तूबर 2021 से हर महीने महंगाई 30 प्रतिशत से अधिक वार्षिक वृद्धि दर्शा रही है। अप्रैल 2022 में लगातार छठे महीने गेहूं की थोक कीमत दोहरे अंकों (10.7 प्रतिशत) में बढ़ी है।
तथ्य यह है कि खाद्य कीमतें अब गैर-खाद्य कीमतों से पिछड़ रही हैं, इसका मतलब यह भी है कि किसानों को इस समय व्यापार की शर्तों या भुगतान की कीमतों के अनुपात में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ग्रामीण मांग के लिए अच्छा संकेत नहीं है। गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसे नीतिगत फैसले इस आशंका को बढ़ा सकते हैं और इससे समग्र मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में भी मामूली लाभ होगा। बहुत कम उत्पादन और मूल्य के प्रतिकूल होने से ग्रामीण कृषि मांग पर असर पड़ेगा। असल में, गेहूं निर्यात प्रतिबंध जोखिम को कम कर सकता है, पर सकल घरेलू उत्पाद के मोर्चे पर जोखिम बढ़ा देता है।
निश्चित रूप से भारत इस समय उच्च मुद्रास्फीति या महंगाई का सामना करने वाला एकमात्र देश नहीं है। कोविड-19 महामारी के कारण आपूर्ति शृंखला में लगातार व्यवधान आ रहा है। चीन में नवीनतम प्रकोप के बाद स्थितियां बदतर हुई हैं। पहले से कमजोर आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है, विकसित देशों में मांग बढ़ गई है। इन सबसे ऊपर यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक ईंधन और खाद्य आपूर्ति में एक बड़ी बाधा पैदा कर दी है।
यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि थोक मूल्य सूचकांक वास्तव में उपभोक्ताओं के बजाय उत्पादकों के बाजार का अधिक प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि थोक मूल्य सूचकांक में धातु और प्रमुख औद्योगिक रसायन जैसे उर्वरक शामिल हैं। इसमें व्यक्तिगत सेवाएं व आवास जैसी चीजें शामिल नहीं हैं। इसका मतलब है कि ये दोनों ही सूचकांक अलग-अलग उत्पादों की कीमतों के उतार-चढ़ाव को दर्शाते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापी गई भारत की बेंचमार्क मुद्रास्फीति दर अप्रैल में 7.79 प्रतिशत थी। मतलब मई 2014 में वर्तमान सरकार के पदभार ग्रहण करने के बाद से अभी सबसे अधिक महंगाई है। ध्यान रहे, नवंबर 2013 में मनमोहन सिंह की सरकार के समय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 11.5 प्रतिशत पर पहुंच गया था। अभी अधिकांश विश्लेषकों का अनुमान है कि मुद्रास्फीति दोहरे अंकों में नहीं पहुंचेगी। साल 2013-14 की तुलना में आज मुद्रास्फीति की स्थिति कितनी अलग है? जहां अतीत में खुदरा मूल्य सूचकांक की वृद्धि अधिक रही थी, वहीं थोक मूल्य सूचकांक इस समय अभूतपूर्व तेजी दिखा रहा है। इससे पता चलता है कि अभी महंगाई का असर उत्पादन या निर्माण पर ज्यादा है और उपभोक्ताओं पर थोड़ा कम। विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्पादकों का एक वर्ग महंगाई के एक हिस्से को अभी भी खुद झेल रहा है और उनके उत्पाद के दाम समय के अनुकूल नहीं बढ़े हैं।
अभी हम भारतीय अर्थव्यवस्था में बेमेल मांग-आपूर्ति के बारे में क्या कह सकते हैं? अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तकों की साफ-सुथरी दुनिया में मुद्रास्फीति या महंगाई ज्यादातर अल्पावधि में आपूर्ति की तुलना में अधिक मांग का नतीजा होती है। विश्व स्तर पर झटके के बावजूद भारत में इस समय मुद्र्रास्फीति को बढ़ाने में अतिरिक्त मांग का कितना योगदान है? इस संबंध में पूरे आंकड़े नहीं हैं, इसलिए इस प्रश्न का समाधान मुश्किल हो जाता है। क्या अभी देश में संगठित क्षेत्र के कुछ हिस्सों में मजबूत सुधार का अनुभव हो रहा है? विनिर्माण और सेवा क्षेत्र, दोनों में जुलाई और अगस्त 2021 से विस्तार दिख रहा है। संगठित उद्योग जगत में क्षमता का भरपूर उपयोग हो रहा है। हालांकि, यहां भी डाटा छोटे नमूनों पर ही आधारित है, फिर भी संभावना है कि संगठित क्षेत्र का प्रदर्शन सुधरा है। भारतीय अर्थव्यवस्था के कम से कम एक हिस्से ने हाल के दिनों में तेज मांग देखी है। फिर भी समग्रता में अभी मांग की पूरी वापसी नहीं हुई है। जो आंकडे़ उपलब्ध हैं, वह संकेत करते हैं कि मूल रूप से उपभोक्ता समुदाय के एक बड़े हिस्से में मांग में गिरावट जारी है। शहरों के एक हिस्से में लोगों की क्रय शक्ति कम हुई है। इससे हमारी आर्थिक नीति के सामने चुनौती जटिल हो जाती है।
अब मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में वृद्धि और तरलता को कम करने के लिए थोड़ा दबाव है। सरकार अगर पेट्रो पदार्थों की कीमतों को उपभोक्ताओं से साझा करे, तो सरकारी खजाने के लिए दुविधा खड़ी हो जाएगी। खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति के खिलाफ कुछ किया जाए, तो किसानों की आय को नुकसान पहुंचेगा। वाकई, भारतीय अर्थव्यवस्था चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रही है।





