अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

इप्टा स्थापना दिवस…….जन नाट्य संघ का सूत्र वाक्य है….  पीपुल्स थियेटर स्टार्स द पीपुल

Share

सुसंस्कृति परिहार
इप्टा यानि भारतीय जन नाट्य संघ का सूत्र वाक्य है ‘पीपुल्स थियेटर स्टार्स द पीपुल’ अर्थात, जनता के रंगमंच की असली नायक जनता है। इसका प्रतीक चिन्ह सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्त प्रसाद की कृति नगाड़ावादक है, जो संचार के सबसे प्राचीन माध्यम की याद दिलाता है। स्थापना औपनिवेशीकरण, साम्राज्यवाद व फासीवाद के विरोध में ‘इप्टा’ की स्थापना 25 मई 1943 को की गयी थी। ‘इप्टा’ का यह नामकरण सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था।
चालीस के दशक में पूरी दुनिया पर जब दूसरे विश्वयुद्ध के रूप में फ़ासीवाद का ख़तरा मंडरा रहा था और भारत में ब्रितानी साम्राज्यवाद की हुक़ूमत थी।इसी दौर में जगह-जगह कलाकार-साहित्यकार-बुद्धिजीवी एक साथ आ रहे थे वे अपनी कला के माध्यम से लोगों में चेतना पैदा करने की कोशि‍श कर रहे थे।ऐसे में पहले बेंगलुरू और फिर मुंबई में श्रीलंकाई मूल के अनिल डिसिल्वा ने पीपुल्स थि‍एटर की शुरुआत की।
आगे चलकर 25 मई 1943 को बंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने इप्टा की स्थापना की इस अवसर की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने आह्वान किया“लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटक लेखक आओ, हाथ से और दिमाग से काम करने वाले आओ और स्वंय को आजादी और सामाजिक न्याय की नयी दुनिया के निर्माण के लिये समर्पित कर दो” इप्टा के पहले महासचिव अनिल डी. सिल्वा को बनाया गया जिन्होंने बंगलोर और मुंबई में पहले पहल थियेटर बनाया था। महासचिव ने इस दौरान इप्टा का उद्देश्य सुनिश्चित करते हुए कहा कि “जनता में विश्व की प्रगतिशील शक्तियों के साथ मिलकर साहस और निश्चय के साथ अपने दुश्मन के विरुद्ध संघर्ष का उत्साह पैदा करे…तथा उसमें यह विश्वास बनाये रखे कि एकजुट ताकत के रूप में वह अजेय है ।”इस मौक़े पर एक प्रस्ताव भी पारित किया गया।इसे इप्टा का घोषणा-पत्र कहना ज़्यादा उचित रहेगा।
इसमें कहा गया कि “भारतीय जननाट्य संघ के बैनर तले होने वाला ये सम्मेलन रंगमंच और परंपरागत कलाओं को फिर से ज़िंदा कर लोगों के सामने लाने और संगठन बनने के लिए पूरे भारत में जननाट्य आंदोलन तुरंत शुरू करने की ज़रूरत को स्वीकार करता है.”

इप्टा के काम को आंकने के लिए उसके ये शब्द ही कसौटी बने थे और आज भी हैं।भारतीय जन नाट्य संघ या ‘इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन’ अथवा ‘इप्टा’ (अंग्रेज़ी: Indian People’s Theatre Association) कोलकाता में स्थित रंगमंच कर्मियों का एक संघ है। असम व पश्चिम बंगाल में इसे ‘भारतीय गण नाट्य संघ’ व आन्ध्र प्रदेश में ‘प्रजा नाट्य मंडली’ के नाम से जाना जाता है।
( इप्टा ) भारत में थिएटर-कलाकारों का सबसे पुराना संघ है । भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान 1943 में इप्टा का गठन किया गया था , इसलिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित विषयों को ही बढ़ावा दिया । इसका लक्ष्य भारत के लोगों में सांस्कृतिक जागृति लाना था। ।ऐसे कलाकार जो सामाजिक सरोकारों जुड़े हुए थे और कला के विविध रूपों यथा संगीत, नृत्य, फ़िल्म व रंगकर्म आदि को वृहद मानव कल्याण के परिप्रेक्ष्य में देखते थे, एक-एक कर इप्टा से जुड़ते गये। प्रसिद्ध व्यक्ति इप्टा के सफर में बहुत से नामचीन लोगों ने अपना योगदान दिया है, जिनमें से कुछ नाम पं. रविशंकर, हबीब तनवीर, कैफ़ी आज़मी, शबाना आज़मी, सलिल चौधरी, शैलेन्द्र, साहिर लुधियानवी, राजेन्द्र रघुवंशी, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, एम. एस. सथ्यू, फ़ारुख़ शेख़, अंजन श्रीवास्तव आदि हैं। अखिल भारतीय स्तर पर 25 मई 1993 को बंबई (अब मुंबई) में स्थापित इप्टा की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट जारी किया। इस समय देशभर में इप्टा की 600 से भी अधिक इकाइयां सक्रिय हैं।
इप्टा आज़ादी के आंदोलन के दौरान मेहनतकश अवाम की आवाज़ बनकर उभरा और देखते ही देखते अपने हुनर से कला के नए प्रतिमान गढ़ते चला गया।
भारत को आजादी मिलने पर घड़ी की सुई रात के 12 बजाती है और मेहनतकशों का मजमा नाचने-गाने लगता है। एक आवाज़ हवा में लहराती है और सब उसके साथ-साथ झूमते हैं:झूम-झूम के नाचो आज/गाओ ख़ुशी के गीत/झूठ की आख़िर हार हुई/सच की आख़िर जीत./फिर आज़ाद पवन में अपना झंडा है लहराया/आज हिमाला फि‍र सर को ऊँचा कर के मुसकाया/गंगा-जमुना के होंठों पे फि‍र है गीत ख़ुशी के/इस धरती की दौलत अपनी इस अम्बर की छाया/झूम- झूम के नाचो आज…ये इप्टा के कलाकार थे जो मज़दूर स्त्री-पुरुषों के साथ मुंबई की सड़कों पर पूरी रात नाच-गाकर आज़ादी का स्वागत कर रहे थे।ये गीत ख़ास इसी मौक़े के लिए लिखा गया था। इप्टा के सेंट्रल स्क्वॉड के प्रेम धवन की आवाज़ थी और धुन किसी और ने नहीं, उस दौर के लोग बताते हैं, पंडित रविशंकर ने बनाई थी।इनके साथ मराठी के मशहूर गायक अमर शेख़ की पाटदार आवाज़ भी लोगों को झुमा रही थी।ये देशभक्त संस्कृतिकर्मियों की टोली थी. इनके लिए देशभक्ति का मतलब, हमेशा से जीती जागती जनता रही है।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बंगाल का भीषण अकाल हो या जापान का हमला या फिर आज़ादी की लड़ाई। इप्टा ने अपने गीतों और नाटकों को लोगों की आवाज़ बनाया-पूरब देस में डुग्गी बाजी, फैला दुख का जाल/दुख की अग्नी कौन बुझाए, सूख गए सब ताल/जिन हाथों ने मोती रोले, आज वही कंगाल/रे साथी, आज वही कंगाल/भूखा है बंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल।

इप्टा ने देश में चले सबसे बड़े दो आंदोलन सी ए ए आंदोलन और किसान आंदोलन और उनकी मांगों के समर्थन में खड़ी रही । इप्टा के एक सांस्कृतिक जत्थे ने दिल्ली की जाकर उनमें जोश जगाने का काम भी किया और उनके संघर्ष में अपनी भी आवाज़ शामिल की। इप्टा के मंच से किसानों को जनवादी आंदोलन में मिली उनकी जीत पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि यह जीत तमाम मेहनतकश जनता की ऐतिहासिक जीत है। हालांकि मज़दूर आंदोलन में भागीदारी से इप्टा के जनगीतों बहुत लोकप्रिय हुए और वे विभिन्न आंदोलनों का हिस्सा बनते चले गए।इप्टा के ऐसे कई जनगीत और नज्म हैं, जो आज भी किसान और ट्रेड यूनियनों की बैठकों व आंदोलन में जोश से गाए जाते हैं। मसलन ‘हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’, ‘तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पर यक़ीन कर, अगर कहीं भी स्वर्ग है उतार ला ज़मींन पर’ (शैलेन्द्र), ‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ (फैज अहमद फैज), ’जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहां जा रहा है’ (मख़दूम), ‘भड़का रहे हैं आग लबे नग़्मागार से हम, ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम’, ‘सरकश बने हैं गीत बगावत के गाये हैं/बरसों नए निजाम के नक्शे बनाये हैं।’ ‘‘वह सुबह कभी तो आएगी/बीतेंगे कभी तो दिन आखिर, यह भूख के और बेकारी के।’ (साहिर लुधियानवी)

इन दिनों देश में एक-दूसरे के प्रति फैलाई जा रही नफ़रत को इप्टा ने कला के माध्यम से मिटाने की मुहिम चलाई है। इप्टा की ‘’ढाई आखर प्रेम की यात्रा’’ में लोगों को खासकर युवाओं को जागरूक किया जा रहा है। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) आज़ादी के 75 साल के मौके पर ‘‘ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा’’ निकाली जा रही है। यह यात्रा 9 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के रायपुर से शुरू होकर तमाम राज्यों में होती हुई 22 मई को मध्यप्रदेश के इंदौर में संपन्न होगी।इस यात्रा को देश के प्रमुख राज्यों में काफी सराहा गया । बहुत लोग जुटे नफरत के खिलाफ।इप्टा की इस मुहिम को अन्य लेखक व सांस्कृतिक संगठनों प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस), जनवादी लेखक संघ (जलेस), जन संस्कृति मंच (जसम), दलित लेखक संघ (दलेस) और जन नाट्य मंच (जनम) ने भी अपना सहयोग और समर्थन दिया है।

इसे अपने क्रांतिकारी तेवर के कारण जब तब परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है बंबई और कई जगहों पर उसके कई गीतों और कार्यक्रमों पर रोक लगी। लखनऊ में तो प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ के नाट्य रूपांतर पर रोक का आदेश, ठीक मंचन के बीच में आ गया।इसका नाट्य रूपांतर रज़िया सज्जाद ज़हीर ने किया था और मशहूर उपान्यसकार अमृत लाल नागर इसके निर्देशक थे।इन पर आरोप लगा कि इन्होंने अपने राजनैतिक विचारों के हिसाब से ईदगाह की स्क्र‍िप्ट को तोड़ा मरोड़ा है।हालांकि, बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया और सरकार की कार्रवाई को संविधान की भावना के विरुद्ध माना.फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म हम देखेंगे पर भी बहुत विवाद हुआ।सफ़र हाशमी को नुक्कड़ नाटक करते समय जान से हाथ धोना पड़ा।मगर ये सब करते हुए इप्टा को आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद सरकारी दमन का भी सामना करना पड़ा पर यह कारवां रुका नहीं बराबर चल रहा निरंतर अपनी मंजिल की ओर—

”भारतीय जन नाट्य संघ पर कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े होने का इल्ज़ाम भी लगता है क्योंकि जनता को जागृत कर उसे अपने हकों के लिए तैयार करना है जो सदियों से फासिस्टवादियों ने छीन रखें हैं को कम्युनिज्म का काम माना जाता है।बलराज साहनी ने इस विषय पर साफ कहा था कि इप्टा ना तो किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा है। न किसी गुट से। इप्टा सभी राजनीतिक दलों और गैर-राजनीतिक लोगों का स्वागत करता है।इस संघ का सदस्य होने की एकमात्र शर्त है- देशभक्ति और अपनी जन संस्कृति पर गर्व.”

वर्तमान में इप्टा की ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण और ज़रूरी है यह देश में फ़ैल रही नफरत की भावना के बढ़ते प्रवाह को रोकने का एक ऐसा सिलसिला है जो सतत चलते रहना ज़रूरी है इस यात्रा का समापन हो सकता है लेकिन ‘पीपुल्स थियेटर स्टार्स द पीपुल’ अर्थात, जनता के रंगमंच की असली नायक जनता है और इसे साथ लेकर इप्टा ही चल सकती है।उसके साथ लेखकों, कलाकारों और जनता का जुड़ाव है।वह मनोरंजन के साथ गीत,संगीत, नाटक के साथ जल्दी घुल-मिल जाती है।जो लोग इस संस्था को ज़िंदा बनाए रखने में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं उन्हें सलाम।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें