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खेल… खेल…खेल में?

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शशिकांत गुप्ते

सामान्यज्ञान के आधार पर खेल को मन बहलाव के लिए की जाने वाली क्रीड़ा कहा जाता है। खेल शारीरिक और दिमागी भी होतें हैं।

खेल के कारण मनोरंजन के साथ मानव के शरीर और दिमाग़ की कसरत भी होती है।

अंसख्य प्रकार के खेल हैं। प्रत्येक खेल के अपने नियम होतें हैं।

घरेलू, मैदानी खेल के अतिरिक्त सभागृह में खेले और प्रदर्शित  होने वालें खेल भी होतें हैं।जादुई खेल,शारीरक सौष्ठव के खेल आदि।नाटक के मंचन को भी खेल ही कहतें हैं।

भौतिकवादी मानसिकता के पनपने से खेल सिर्फ खेल तक सीमित न रहतें हुए, पूंजीवाद की गिरफ्त में आ गए।

खेल में प्रतिस्पर्धा होती है। यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ मानसिकता के साथ खिलाड़ी की भावना से होती है।

मोबाईल फोन पर अत्याधुनिक तकनीक के माध्यम से बहुत वीडियो गेम आ गएं हैं। इनमें बहुत से खेल अबोध बालकों के लिए हानिकारक भी सिद्ध हुएं है।

किसी भी खेल में प्रतिस्पर्धा स्वस्थ मानसिकता के साथ खिलाड़ी की भावना की जाए तो वह समझदारी है। 

खेल,मनोरंजन के साथ शारीरिक और दिमाग़ी कसरत करने बजाए खेल सिर्फ आर्थिक हार जीत के लिए खेलें जा रहें हैं। इस हार जीत को ही सट्टा कहतें हैं। सट्टे को सरलता समझने के लिए Speculation कहतें हैं। यही सट्टा जब जुआ (Gambling) में परिवर्तित हो जाता है, तब खेल की नैतिकता खत्म हो जाती है। खिलाड़ी भ्रष्ट हो जातें हैं। खिलाड़ियों में खिलाडी की भावना (Sportsman spiri) रहती ही नहीं है।

सट्टा मतलब बगैर श्रम किए, तमाम कायदे कानूनों को धता बताते हुए कालेधन से खेलें जाना वाला जुआ होता है। 

इस में सलग्न लोगों में रातों रात लखपति बनने लालसा सतत जागृत रहती है। यही लालसा इनलोगों में भ्रम पैदा करती है।भ्रम के कारण यह लोग इस कहावत को चरितार्थ करतें हैं कि, *चढ़ जा बेटा सूली पर भला करेंगे भगवान।*

इस कहावत में इंगित प्रलोभन के कारण सट्टे के खेल के कारण बहुत से लोग स्वयं की सूली पर चढ़ जातें हैं। आए दिन सामाचारों में खबर पढ़ने सुनने को मिलती है, सट्टे में हार के कारण फलाँ ने स्वयं फाँसी लगा ली,या जहर खा या पी लिया।

आश्चर्य तो तब होता है, जब चुनाव होतें हैं,तब चुनावों में सट्टा बाजार सक्रिय होता है। जिस किसी उम्मीदवार की सट्टा बाजार में सबसे कम कीमत होती है,वही जीतने वाला उम्मीदवार कहलाता है।

सर्वोदय के प्रणेता,गांधीजी के अनुयायी,स्वतंत्रता सैनानी आचार्य  विनोबा भावेजी ने कहा है, चुनाव लड़ो नहीं खेलों।

वर्तमान में ना तो चुनाव खेला जा रहा है ना ही लड़ा जा रहा है। चुनाव सिर्फ जीता जा रहा है।

पचास के दशक तक राजनैतिक दलों की अलग अलग पेटियां होती थी। पश्चात बैलेट बॉक्स का चलन हुआ,अब ईवीएम मशीन है।

सभी दल मतदाताओं से अपील करतें हैं फलाँ चुनाव चिन्ह का बटन दबाओ और हमें आशीर्वाद दो।

एक दल कभी नहीं कहता है कि अमुक बटन ही दबाओ। यह दल आश्वश्त होता है कोई भी मतदाता किसी भी चुनाव चिन्ह का बटन दबाएगा……?

यह भी सियासी खेल ही है। सियासत में एक खेल भी इनदिनों बहुत खेला जा रहा, कोई भी दल चुनाव जीते सरकार बनाने के खेल में जो दल निपुण हैं वही सरकार बनाने सफल हो जाता है।

प्रख्यात शायर  दुष्यन्त कुमारजी का शेर है।

*कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं हो सकता*

*एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों”*

सियासत के मौजूदा चलन में इस तरह कहा जा सकता है।

*कौन कहता है कि सत्ता प्राप्त नहीं हो सकती*

*एक जुमला तबीयत से जनता के बीच उछालो तो सही*

सब कुछ खेल खेल में हो रहा है।

कहा गया है न Every thing fair Love, war, game, and politics.

प्यार, युद्ध,खेल और राजनीति में सब जायज़ है।

खेल तो अंतः खेल है।

मराठी भाषा में एक कहावत है।

*ऊंदरा चा जीव जातो,मांजरा चा खेळ होतों।*

बिल्ली का खेल होता है और चुंहे की जान जाती है।

बिल्ली चुंहे को तड़पा तड़पा कर मारती है। पहले वह चुंहे को अपने पंजे में दबोचती है,घायल करती है,छोड़ देती है। ऐसा बिल्ली बार बार करती है। चूहा भागने की असफल कोशिश करता है। बिल्ली चुंहे को अधमरा कर खाती है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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