,मुनेश त्यागी
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अटाला में बवाल के आरोपी जावेद मोहम्मद का 5 करोड़ का मकान देखते ही देखते जमींदोज कर दिया गया। उस पर आरोप लगाया गया कि 1800 वर्ग फीट जमीन पर बिना नक्शे के पूरा मकान निर्माण किया था। वैसे यह मकान 10-15 साल पहले बनाया गया था और इसी तरह के बहुत सारे मकान वहां कॉलोनी में स्थित है। बाद में पता चला कि यह मकान तो जावेद का था ही नहीं, बल्कि यह तो उनकी पत्नी का था जिसे उनके पिता ने उसे दिया था।
यहीं पर प्रश्न उठता है कि क्या प्राधिकरण ने बिना कागज देखे ही उनकी पत्नी का मकान गिरा दिया और उनकी एक न सुनी? यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि प्रशासन शासन किस कानूनी नियम के तहत मकान पर बुलडोजर चलाकर उसे जमींदोज कर रहा था? शासन प्रशासन के पास इसका कोई जवाब नहीं है और वह अगले बगले झांक रहा है।
दूसरे सहारनपुर के एक वायरल हुए वीडियो में पुलिस हिरासत में हवालातियों के साथ बहुत ही क्रूर और निर्मम तरीके से तथा कानून के सभी प्रावधानों को ताक पर रखकर बुरी तरह से पीट रही है। 2 पुलिसकर्मी बहूत ही अमानवीय तरीके से उनकी पिटाई कर रहे हैं जबकि कानूनी प्रावधान यह है कि हिरासत में लिए गए किसी भी कैदी के साथ मारपीट नहीं की जा सकती, उसे हाथ तक नहीं लगाया जा सकता।
यहीं पर अहम सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर यह हमारे देश प्रदेश में क्या हो रहा है? हमारे देश में संविधान है, कानून का शासन है, कोर्ट कचहरी है, f.i.r. होती है, आरोप लगते हैं, अदालत में सुनवाई, गवाही, बहस और सजा का फैसला होता है। यह सब बाकायदा एक प्रक्रिया के तहत होता है। तब पुलिस प्रशासन को यह सब अधिकार किसने दे दिए कि वह कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना, कानून की जरूरी प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर, लोगों के मकानों को बुलडोजर चला कर ढहा दे, कोई सुनवाई का मौका न दे और हवालात में बंद लोगों पर बड़े ही निर्मम तरीके से लाठियां बरसा कर उनके हाथ पैर तोड़ दे और जेल में बंद कर दे?
इस सबको लेकर संविधान और कानून के शासन को पैरों तले रौंदने को लेकर कानून पसंद, संविधान के रक्षकों में और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में बेहद गुस्सा, रोष और बेचैनी है। इस सबको लेकर, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों समेत सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकीलों को भारत के मुख्य न्यायाधीश को याचिका देनी पड़ी कि भारत में यह सब क्या हो रहा है? कानून और फैसलों के बगैर निर्दोषों को अमानवीय तरीके से हवालात में मारा पीटा जा रहा है। निर्दोषों के घरों को बुलडोजर से ढहाया जा रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय को दिए पत्र में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश इन घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेकर कानूनी कार्रवाई करे। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना को लिखे पत्र में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज वी सुदर्शन रेड्डी, न्यायमूर्ति वी गोपाल गौवड़ा, न्यायमूर्ति ए के गांगुली, दिल्ली उच्च न्यायालय के जज ए पी शाह, मद्रास हाई कोर्ट के जज के चंदू और न्यायमूर्ति मोहम्मद अनक के नाम शामिल हैं। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के 5 सीनियर अधिवक्ताओं के नाम भी शामिल हैं।
पत्र में सर्वोच्च न्यायालय से मांग की गई है कि राज्य पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई जुल्म जातियों का स्वत: संज्ञान लिया जाए। पत्र में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों को सुनावाई का अवसर न देकर यूपी प्रशासन इन लोगों के खिलाफ हिंसा को स्वीकृति दे रहा है और इस सब को ऐसा करने के लिए यूपी के मुख्यमंत्री अधिकारियों को शह दे रहे हैं। इस पत्र को देने वालों ने कहा है कि प्रदर्शनकारियों के घर ढाना न्यायिक प्रक्रिया के बाहर है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज गोविंद माथुर ने कहा है कि सभ्य समाज में, कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि बगैर कानूनी प्रक्रिया के पूरा किए मकान ध्वस्त कर दिया जाए, किसी को जुर्म साबित किए बिना सजा नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्तियों के ये बयान हमारे प्रदेश के शासन प्रशासन के चाल चलन चेहरे और रवैया पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। ये सवाल आम जनता ने नहीं उठाए हैं बल्कि कानून में दक्ष और विशेषज्ञों ने उठाए हैं और सरकार के पास इनका कोई जवाब नहीं है।
उपरोक्त कदम असाधारण परिस्थितियों में उठाए उठाये गये न्यायिक अधिकारियों, न्याय मूर्तियों और वकीलों के ऐतिहासिक और असाधारण कदम हैं और कानून को हाथ में लेकर लोगों के घर ढहाना और हवालात में प्रदर्शनकारियों को निर्मम तरीके से पीटने वालों के खिलाफ एक गंभीर और जरूरी चेतावनी है और देश के शासन प्रशासन पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
लगता है इससे न्यायमूर्तियों की आंखें खुलेगी इस अत्याचार और संविधान और कानून के शासन को रौंदे जाने के समय वे मौन नहीं रह सकते। उन्हें सरकारी जुल्मों और अत्याचारों के खिलाफ स्वत संज्ञान लेकर निर्दोष जनता के बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा। इन गंभीर हालतों वे चुप नहीं बैठ सकते और तमाशबीन बने नहीं रह सकते।
यहीं पर एक और बहुत ही अहम सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार और अधिकारियों की ये कार्यवाहियां मानवाधिकारों का एकदम सीधा उल्लंघन नहीं हैं? मानवाधिकार घोषणा पत्र 1948 की धारा 5,7,8,9 किसी भी आदमी के मानवाधिकार हैं और धारा 11 के अनुसार जब तक किसी आरोपी को न्यायालय द्वारा दोषी करार न दे दिया जाए, तब तक उसे निर्दोष ही समझा जाएगा।
यही पर हमारा सवाल है कि क्या इन प्रदर्शनकारियों पर f.i.r. होकर मुकदमा चला?, उन्हें आरोप पत्र देकर साक्ष्य और जिरह का मौका दिया गया? क्या उन्हें का पूरा मौका दिया गया? क्या उन्हें गुनाहगार पाया गया है? अगर नहीं तो क्या शासन प्रशासन या पुलिस को इन्हें मारने पीटने या घर जमींदोज करने का अधिकार था? कानून की दृष्टि में ये सब लोग निर्दोष हैं और मकान को बुलडोजर चलाकर ढहा देना एकदम गैरकानूनी, मनमाना, रंजिशन, असंवैधानिक और कानून के शासन का घनघोर और खुल्ला उल्लंघन है।
ऐसे अधिकारियों पर अविलंब सख्त से सख्त कानूनी कार्यवाही करके उन्हें उनके पदों से बर्खास्त कर देना चाहिए और उनको देय कानूनी पैसे को हड़प लेना चाहिए और पूरे अधिकारी वर्ग को यह चेतावनी दी जानी चाहिए। तभी भारत में कानून का शासन स्थापित हो सकेगा और जब तक ऐसे दोषी और नाकाबिल अधिकारियों के खिलाफ, समय से तुरंत और सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती है, उन्हें उनके पदों से और नौकरी से नहीं हटाया जाता है, तब तक इस तरह के सरकारी अत्याचार और जुल्मों सितम रुकने वाले नहीं हैं।





