पुष्पा गुप्ता
_’वन रैंक वन पैंशन’ योजना के नाम पर सत्ता में आई मोदी सरकार की ‘नो रैंक नो पैंशन’ वाली अग्निपथ योजना क़िस कॉन्सेप्ट पर आधारित है और यह क़िस तरह से न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा है? आइये देखते हैं :_
यह सेना के ठेकाकरण का ऐसा प्रयास है जिसकी परिणति शुद्ध रूप से एक व्यापारिक संस्था ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सेना के माध्यम से सम्पूर्ण भारत को अपने अधिकार में ले लेने के तौर पर हम इतिहास में पहले देख और उसके अत्याचारों को भोग चुके हैं।
जहाँगीर ने ईस्वी सन 1618 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ किये गये एक व्यापारिक समझौते के तहत, कंपनी और ब्रिटेन के सभी व्यापारियों को इस उपमहाद्वीप के प्रत्येक बंदरगाह पर ख़रीदने तथा बेचने के लिए जगहों के इस्तेमाल की इजाजत दी थी।
_आगे चलकर मुगलों ने अंग्रेजों को करों में छूट, निर्बाध आवागमन और स्वतंत्र व्यापार की आज्ञा दे दी। इसके साथ ही उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली क्योंकि भारत में मुक्त व्यापार की अनुमति मानो अंग्रेजों के लिए लूट मचाने का एक लिखित आदेश थी। इससे मुगलों की भारत में जड़ें कमजोर होती चली गईं और अंग्रेजों का वर्चस्व बढ़ता गया।_
सन 1750 तक भारत में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ता गया तो उन्होंने मौके का फायदा उठाया और मुगल साम्राज्य के विरुद्ध क्षेत्रीय ताकतों को उभारते और फिर संधि करते हुए उन्हें अपने अधीन कर लिया। अंततः 1858 तक हिंदुस्तान में मुगल राजवंश की सत्ता हमेशा के लिए समाप्त हो गई और गोवा व कुछेक अन्य अपवादों के अलावा शेष भारत पर उनका आधिपत्य हो गया।
अब इसी तरह वर्तमान समय में एक शहंशाह की तरह सत्ता का संचालन कर रहे नरेंद्र मोदी एक-एक कर सभी सरकारी कंपनियों को औने-पौने दामों में अपने मित्र अडाणी-अंबानी को सौंपते जा रहे हैं तो बहुत जल्दी देश के अधिकांश पीएसयू इन्हीं के हाथों बिक चुके होंगे।
_फिर तो स्वाभाविक रूप से अडाणी-अंबानी को भी अपने तेल शोधक कारखानों, खदानों, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों आदि जैसे विशाल व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और सैकड़ों हैक्टर में फैले हुए इनके परिसरों की सुरक्षा के लिए युवा और प्रशिक्षित लड़ाकों वाली निजी सेना रखने की आवश्यकता होगी ही।_
इसीलिए उन्हें प्रशिक्षित लड़ाके उपलब्ध कराने के लिए यह अग्निपथ योजना शुरू की जा रही है। इसके शुरुआती 5-6 वर्षों में रिटायर होने वाले अग्निवीर इनकी कंपनियों में खप जाएंगे। यही बात तो सत्ताधारी वर्ग खूब जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है।
_भारत में सरकार की सहमति से निजी क्षेत्र द्वारा अपनी सेना रखने का चलन इस दशक के खत्म होने से पहले आप अपनी आंखों से देखेंगे। जिन्हें हमारी सरकार आंतरिक सुरक्षा के ठेके देगी। इस योजना का ड्राफ्ट तैयार है।_
संभवतः यह सब जल्दी ही सामने आएगा क्योंकि तैयारी हो चुकी है और शुरुआत उत्तर प्रदेश से की जाने वाली है।
निजी सेना यानी भाड़े के सैनिक (mercenary) रखना कोई नई बात नहीं है। विदेशों में यह बहुत पहले ही शुरू हो चुका है। पिछले अनेक दशकों से देखा जा रहा है कि दुनियाभर में कई जगहों पर युद्ध में भाड़े के सैनिकों का सहारा लिया गया है। अग्निवीर उसी का भारतीय संस्करण है। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका ने ऐसे ही भाड़े के सैनिकों का इस्तेमाल किया था।
_यूक्रेन के साथ अपने वर्तमान युद्ध में रूस ने वहां की एक निजी सैन्य कंपनी वैगनर के सैनिक यूक्रेन की राजधानी कीव में तैनात किये हैं।_
जरा पीछे मुड़कर देखिए कि ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ जैसे खुलेआम चलाये गये अभियान को अमेरिकी सरकार और जनता ने उनके आंतरिक चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप क्यों नहीं माना? जबकि इसके विपरीत पर्दे के पीछे से डोनाल्ड ट्रंप की मदद करने के लिए पुतिन के खिलाफ वहां हंगामा खड़ा हो गया था।
इसका कारण दुनिया की सबसे धनाढ्य लॉबी अमेरिकी यहूदियों के साथ संघ के मधुर सम्बंध हैं, जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर लाने को उद्यत विश्व की दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियों वाले पूंजीपतियों का समूह है और भारत में मोदी उनका ही रास्ता साफ कर रहे हैं। जो एक तरह से न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा है।
_अमेरिका की सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (CSIS) की वर्ष 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार शीत युद्ध के बाद विभिन्न देशों की सरकारों तथा गैर सरकारी संस्थानों में प्राइवेट सिक्यूरिटी कंपनी (Private Security Companies—पीएससी) और प्राइवेट मिलिट्री कंपनी (Private Military Companies—पीएमसी) की मांग में तेजी आई है।_
, भाड़े के ये सैनिक प्रायः अंशकालिक यानी ‘फ्रीलांस सैनिक’ होते हैं जो सस्ते और अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम देते हैं। इनकी छोटी इकाई को किसी खास मिशन पर भेजा जा सकता है और इनकी जवाबदेही कम होती है।
निजी सैन्य कंपनी (Private Military Company—पीएमसी) राष्ट्रीय सरकारों, राज्य सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा निजी कंपनियों को सैन्य सेवाएं प्रदान करती है।
_ये कंपनियां निजीकृत सैन्य उद्योग का एक महत्वपूर्ण और गहन विवादास्पद तत्व हैं जो युद्ध और सुरक्षा बल प्रदान करने में माहिर होती हैं। इनका काम छोटे पैमाने पर प्रशिक्षण मिशन चलाने से लेकर टैंक और हमले के हेलीकॉप्टर सहित शक्तिशाली हथियार प्लेटफार्मों से लैस कई सौ उच्च प्रशिक्षित सैनिकों से बनी लड़ाकू इकाइयां प्रदान करना होता है। यहां तक कि इनका इस्तेमाल विदेशी सरकारों को गिराने में भी किया जाता है।_
निजी सैन्य कंपनी के लड़ाकुओं को छोटे-छोटे मिशन या सीमित क्षेत्र में दायित्वों के निर्वहन के विपरीत नियमित सैनिकों की तरह बड़े स्तर पर युद्ध में झौंकने की शुरुआत अमेरिका द्वारा इराक के खिलाफ की गई थी। जिसमें एक पूर्व अमेरिकी नेवी सील एरिक प्रिंस द्वारा संचालित प्राइवेट सैन्य कंपनी ब्लैकवाटर के भाड़े के सैनिकों को तैनात किया गया था।
हालांकि इसमें ज्यादातर रिटायर्ड अमेरिकी सैनिक थे। इन सैनिकों का काम युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना को हर संभव सहयोग देना था। इराक युद्ध के बाद एरिक प्रिंस प्राइवेट अमेरिकी मिलिट्री का पोस्टर ब्वॉय बन गया था।
UN की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा—
भाड़े पर सैनिक देने वाली अमेरिकी कंपनी ब्लैकवाटर के पूर्व प्रमुख एरिक ने तीन वर्ष पहले लीबिया में सरकार गिराने के लिए 600 करोड़ में सौदा किया था।
_संयुक्त राष्ट्र संघ की एक गोपनीय जांच रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सहयोगी और ब्लैकवाटर कंपनी के पूर्व प्रमुख प्रिंस एरिक ने लीबिया में सरकार गिराने के लिए एक लीबियाई कमांडर को हथियार देने का प्रस्ताव दिया था।_
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रिंस एरिक ने 2019 में लीबिया के एक सैन्य कमांडर को भाड़े के विदेशी सैनिक, अटैक एयरक्राफ्ट, गनबोट और साइबर युद्ध की क्षमता देने का करीब 600 करोड़ रुपए का सौदा किया था।
इसमें चुनींदा लीबियाई कमांडरों पर नजर रखने और उनको मारने की योजना थी। ताकि लीबिया की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को गिराया जा सके।
इराक युद्ध के दौरान ब्लैकवाटर के सैनिकों के पास नियमित सेना को युद्ध में दिये जाने वाले पॉल स्लॉग, इवेन लिबर्टी, डस्टिन हर्ड व निकोलस स्लॉटर मशीनगन, ग्रेनेड लॉन्चर जैसे हथियार और स्नाइपर से लैस एक बख्तरबंद काफिला तथा वे सारी सुविधाएं और आर्टलरी थी जिनका सेना इस्तेमाल करती है।
_इस काफिले ने इराक की राजधानी बगदाद में निसौर चौर पर निहत्थे और निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसाईं थीं। इस घटना में दो बच्चों समेत 17 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना पर बहुत हल्ला मचा और मामले की जांच की गई। जांच में यूएस फेडरल कोर्ट ने 2014 में ब्लैक वाटर कंपनी के 4 गार्ड्स को दोषी पाया और चारों को 30-30 साल की सजा सुनाई गई थी लेकिन दिसंबर 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन सभी को माफी दे दी।_
अमेरिकी कोर्ट द्वारा ब्लैकवाटर पर प्रतिबंध लगाने के बाद कंपनी ने अपना नाम बदल कर एक्सई सर्विस रख लिया और आज भी यह प्राइवेट सेना अपनी सर्विसेस दे रही है।
[चेतना विकास मिशन)





