अशोक कुमार
पूंजीवादी व्यवस्था में कोई लोकतंत्र वगैरह नहीं होता । पूंजीवादी समाज में मूल रूप से शोषकवर्ग वर्ग यानी पूंजीपति वर्ग की मेहनतकश वर्ग के ऊपर तानाशाही ही होती है । इस तानाशाही को ही शासकवर्ग यानी शोषकवर्ग लोकतंत्र कहकर खूब प्रचारित करता रहता है
। वर्गों में बंटे सिर्फ़ वोट देने का अधिकार मिल जाने से ही लोकतंत्र नहीं हो जाता, क्योंकि बुर्जुआ लोकतंत्र में पीड़ित मेहनतकश वर्ग जनता हर पांच वर्षों के बाद अपने वोट के ज़रिए सिर्फ़ शोषकों,लुटेरों,जुमलेबाजों,दगाबाजों, भ्रष्टाचारियों, दंगाइयों, माफियाओं, फ़ासिस्टों और अशिष्टों को ही चुनती है ! वोट का अधिकार शासकवर्ग द्वारा पीड़ित वर्ग से उसके समस्त लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लेने का तमाशा भर है और कुछ नहीं ! आर्थिक जनतंत्र की स्थापना किए बग़ैर लोकतंत्र एक ढकोसला है । वर्गों में बंटे समाज में लोकतंत्र संभव हो ही नहीं सकता । इसीलिए तो इस व्यवस्था में समाज के विभिन्न पीड़ित वर्गों द्वारा निरंतर और दिन-रात आंदोलन और संघर्ष जारी रहते हैं । इस व्यवस्था में समाज का कोई भी वर्ग शायद ही सुखी होता हो । आज इस व्यवस्था में न कोई दलित सुखी और संतुष्ट हैं, न आम मेहनतकश हिन्दू, न मुस्लिम, न ईसाई, न स्त्री, न पुरुष, न युवा, न वृद्ध । अगर इस व्यवस्था में कोई सुखपूर्ण और भोगविलासपूर्ण जीवन जी रहा है तो वह है कामचोर शोषक पूंजीपतिवर्ग । इसीलिए बुर्जुआ लोकतंत्र केवल बुर्जुआ वर्ग के लिए ही लोकतंत्र होता है । वास्तविक डेमोक्रेसी हो तो ऐसा होना ही असम्भव है । इसीलिए वर्तमान बुर्जुआ लोकतंत्र को भीड़तंत्र कहना ही उचित होगा । वास्तविक लोकतंत्र तो उसी समाज में संभव हो सकता है जिसमें वर्गों को जड़मूल से नष्ट कर दिया गया हो और आर्थिक जनतंत्र की स्थापना कर दी गई हो क्योंकि मेहनतकश जनता को वोट के अधिकार की नहीं बल्कि आर्थिक समानता की ज़रूरत है । आर्थिक समानता हो तो स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता छाया की तरह पीछे चले आते हैं । वर्तमान सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था के चलते ऐसा संभव नहीं हो सकता । समाज के विभिन्न वर्गों के बीच चल रहे आपसी संघर्षों के मूल में यही आर्थिक असमानता मुख्य कारण है । शेष कारण भी हैं लेकिन वे गौण हैं ।
साभार – श्री अशोक कुमार , संपर्क – 99719 86428
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा





