नई दिल्ली
कांग्रेस के केरल विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार शुरू कर दिया है। केरल में ज्यादातर पांच साल बाद सत्ता बदल जाती है। पर इस बार स्थितियां अलग हैं। एक तरफ जहां वामदलों के खिलाफ कांग्रेस की धार कमजोर हुई है, वहीं भाजपा की बढ़त ने पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में पार्टी के लिए जीत की दहलीज तक पहुंचना आसान नहीं है।
केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वामदल अलग-अलग गठबंधन में चुनाव लड़ते रहे हैं। वर्ष 2011 के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व में यूडीएफ ने जीत दर्ज की, तो 2016 में वामदलों की अगुआई वाले एलडीफ ने सत्ता हासिल की। दोनों गठबंधन के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहा है। पर अब दोनों की धार कमजोर पड़ गई है।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम पश्चिम बंगाल और असम में वामदलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में भी वामदल गठबंधन का हिस्सा थे। ऐसे में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन सरकार को घेरने में मुश्किल होगी। क्योंकि, कई राज्यों में हम वामदलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रहे हैं।
पार्टी का कहना है कि वर्ष 2016 में पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। उस वक्त भी पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव साथ हुए थे, इसलिए ज्यादा सवाल नहीं उठे। पर पिछले पांच साल में केरल के बाहर कांग्रेस और वामदलों में तालमेल बढ़ा है। ऐसे में भाजपा पूरी शिद्दत के साथ इस मुद्दे को उठाएगी।
पार्टी चुनाव प्रचार में विजयन सरकार के खिलाफ मुद्दों को उठाएगी
उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि पश्चिम बंगाल और असम में कांग्रेस वामदलों की तारीफ करे और केरल में इनकी आलोचना करे। यह सही है कि मुख्यमंत्री विजयन सरकार के खिलाफ कई मुद्दे हैं। पार्टी चुनाव प्रचार में उन मुद्दों को उठाएगी। पर उसका कितना असर होगा, इसका आंकलन चुनाव में होगा।
केरल में भाजपा का जनाधार बढ़ा है। वर्ष 2011 में भाजपा को छह फीसदी वोट मिला था। वहीं, 2016 के चुनाव में भाजपा को दस फीसदी वोट मिला। कांग्रेस के कई नेता मानते हैं कि वामदलों के खिलाफ कांग्रेस के कमजोर होने की वजह के बड़ी तादाद में मतदाता भाजपा की तरफ गए हैं। क्योंकि, भाजपा वामदलों के खिलाफ लडती दिख रही है।





