शशिकांत गुप्ते
सामाचारों की सुर्खियों पर नजर गई। सामाचारों को सुनने और पढ़ने के बाद अचानक एक लोकोक्ति का स्मरण हुआ।
एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है।
इस लोकोक्ति में मछली प्रतीक मात्र है।
एक अटल सत्य है कि मनुष्य जैसा स्वार्थी प्राणी अन्य कोई प्राणी नहीं है। प्रायः मनुष्य आपस में एक दूसरें पर व्यंग्य करने के लिए लोकोक्ति का प्रयोग करता है। जितनी भी लोकोक्ति बनाई गई है, उनमें ज्यादातर तमाम वन्य प्राणियों और पशु,पक्षी,
जीव जंतुओं को प्रतीक बनाया है।
मनुष्य के अलावा धरा पर विद्यमान लगभग सभी प्राणी मूक ही होतें हैं। सिर्फ तोते को छोड़कर।
बहरहाल मुद्दा है एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है। एक व्यवहारिक सवाल उपस्थित होता है कि, मछली की पूरी दिनचर्या मतलब अनिवार्य नित्यकर्म से लेकर जीवन की सभी गतिविधियां पानी ही व्यतीत होती है? तब यह क्यों, कैसे,किस लिए, कहा जाता है कि मछली तालाब को गंदा करती है?
यदि मछली के पास वाणी होती तो वह जरूर कहती कि, कोई एक व्यक्ति यदि किसी भी क्षेत्र का माहौल खराब करता है, उसका दोष हम मछलियों पर क्यों मढ़ा जाता है?
मनुष्य पहले अपने सामाजिक क्षेत्र रूपी तालाब को हर तरह से प्रदूषित करता है। प्रदूषण से समाज का सौहाद्रपूर्ण माहौल वैमनस्यता में परिवर्तित होने लगता है। वैमनस्यता जब हिंसक रूप ले लेती है,तब मनुष्य मछली को दोषी करार देतें हुए उक्त कहावत का उच्चारण करता है।
Morning walk मतलब सुबह की सैर करते हुए मस्तिष्क में उपर्युक्त विचारों का द्वंद चल रहा था।
उसी समय देखा एक बिल्ली रास्ता पार कर रही थी,लेकिन वह अचानक रुक गई।
मैने कौतूहलवश बिल्ली से पूछा आप रुक क्यों गई,बिल्ली ने व्यंग्यात्मक जवाब दिया,मै चुंहे के का पीछा कर ही रही थी तब आदमी ने मेरा रास्ता काट दिया। अपशगुन हो गया।
मैने पूछा आप भी शगुन-अप शगुन मानती हो?,
बिल्ली ने हँसते हुए जवाब दिया, मै मज़ाक कर रही हूँ। मै तो शेर की मौसी हूँ।
ऐसी दकियानूसी बातों को मानती ही नहीं हूँ।
आप मनुष्यों में स्वार्थ भरा हुआ है, मै तो स्वाभाविक रूप से रास्ता पार करती हूँ। मनुष्य मेरे रास्ता पार करने को रास्ता काटना कहता है। जब मैं रास्ता पार करती हूँ तब मनुष्य इसलिए रुक जाता है कि उसके पूर्व कोई दूसरा मनुष्य रास्ता पार करें, मतलब जो कुछ अनिष्ट होना है वह दूसरें मनुष्य के साथ हो। क्या यही मानवता है?
मैने कहा यह बात सोलह आने सच है। बिल्ली कुछ कहती इसके पूर्व मैने बिल्ली से पूछा,आपका शारीरिक भूगोल देख कर तो कतई विश्वास नहीं होता कि,आप नौ सौ चुंहे खाने की क्षमता रखती हो?
मेरा प्रश्न सुनकर बिल्ली खिसियाने की मुड़ में आ जाती,इसके पूर्व मैंने बिल्ली की स्तुति करते हुए कहा शेर तो आपकी ही बहन का बेटा है।
स्वयं की स्तुति सुनकर वह सामान्य हुई,और कहने लगी, मनुष्य को पाप करतें हुए शर्म नहीं आती है। विभिन्न प्रकार के पापकर्म करने के बाद तीर्थक्षेत्र में भ्रमवश भ्रमण करने जाता है कि,उसके द्वारा किए हुए सारे पाप धुल जाएंगे। ऐसे निष्कृष्ट कर्म करने वाले मनुष्य की आलोचना करने के लिए, बिल्ली पर नौ सौ चुंहे खाने का आरोप लगता है?
हमारी चर्चा चल ही रही थी,उसी समय एक व्यक्ति मोबाइल पर किसी को भद्दी गालियां देकर कोस रहा था,उसे देख बिल्ली बोली इसतरह के अपशब्द बोलने वाले के लिए आप यह कहावत बोलोगे खिसियानी बिल्ली….)
कभी प्रत्यक्ष देखा है किसी बिल्ली को खम्बा नोंचते हुए?
मैने अपनी समझदारी का परिचय देतें हुए बिल्ली से विदा ली,यह सोच कर कहीं बिल्ली सच में खिसिया न जाएं।
बिल्ली के साथ हुई चर्चा ने पुनः मछली वाली कहावत का स्मरण करवाया। मनुष्य पहले तो सामाजिक सौहाद्र रूपी तालाब को असंवेदनशील शब्दों से प्रदूषित करता है। जब समूचा तालाब प्रदूषित हो जाता है,तब उक्त कहावत बोल कर मछली को बदनाम करता है।
इन्ही विचारों के चलतें किसी शायर का यह शेर याद आ गया।
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा
सुबह की सैर से वापस घर आने पर उक्त विचारों को पूर्णविराम देने के पूर्व संत कबीरसाहब इस दोहे का स्मरण हुआ।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
इस दोहे में जो उपदेश है, वह सिर्फ उन मनुष्यों के लिए है, जिनके सीने में दिल नाम का अवयय होता है। जिनके सीने में दिल होता है वे कभी भी असंवेदनशील, असंवैधानिक भाषा का प्रयोग कर ही नहीं सकतें हैं।
एक अहम सवाल है दूध का दूध और पानी का पानी वाली कहावत चरितार्थ होना संभव है, जब दूध के खालिस होने पर ही संदेह है?
शशिकांत गुप्ते इंदौर





