आरती शर्मा
_पिछले दिन बांदा के एक न्यायालय ने हत्या के एक मामले में अभियुक्तों को आजन्म कारावास से दंडित किया है। आज आपको उस प्रकरण के बहाने इस टॉपिक पर जानकारी दे रही हूं :_
चित्रकूट के जंगलों में दो दशक तक शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ तथा अम्बिका पटेल उर्फ ठोकिया का आतंक हुआ करता था। पुलिस बहुत दिनों तक उनकी तलाश में जंगलों में भटकती रही,कई पुलिस कर्मी शहीद या घायल हुए लेकिन पुलिस ने हार नहीं मानी।
वर्ष २००७ की २२जुलाई को उ.प्र.पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने एक मुठभेड़ में ददुआ को मार गिराया।उसी दिन यसटीयफ की दूसरी टीम से ठोकिया गिरोह से दूसरे जंगल में मुठभेड़ हुई जिसमें एक डकैत मइया दीन पटेल मारा गया,शेष भागने में सफल रहे। एक ही दिन पुलिस को मिली दो सफलता ने उनका उत्साह वर्धन किया।
कानूनन जब कभी कोई व्यक्ति पुलिस के द्वारा मारा जाएगा,मृतक का पंचायतनामा (इंक्वेस्ट रिपोर्ट) मजिस्ट्रेट द्वारा भरा जाएगा।
इस मामले में भी पंचायत नामा मजिस्ट्रेट को भरना था लेकिन बार बार सूचित होने पर भी जब मजिस्ट्रेट नहीं पहुंचे ,मजबूरन शाम को यसटीयफ डकैत का शव लेकर जंगल से बाहर निकलने का फैसला कर वाहनों से निकल रहे थे।
अब तक रात हो चली थी।रास्ते में एक संकरे स्थान पर दोनों तरफ के टीले से पुलिस दल पर फायरिंग होने लगी। पुलिस दल जब तक संभलता और फायरिंग का जवाब देता,तब तक देर हो चुकी थी। डकैत तो पुलिस फायरिंग से भाग गए लेकिन छोड़ गए छ पुलिस जवानों तथा एक गाइड के शव।ठोकिया गिरोह अपने साथी की मृत्यु का बदला लेने के लिए बघोलन जंगल के सुरक्षित स्थल पर घात लगाकर हमला किया था।
उ.प्र.पुलिस के लिए यह अपूरणीय क्षति थी।ददुआ को मारकर पुलिस ने जो यश अर्जित किया था,इस मुठभेड़ ने उसे धो दिया।इस मामले में यसटीयफ के सीओ धीरेन्द्र राय ने कर्वी थाने पर १६ नामजद तथा अन्य अज्ञात के विरुद्ध मुकदमा लिखाया।
पुलिस ने ठोकिया के इस हमले को चुनौती के रूप में लिया और कालांतर ठोकिया और उसके कुछ साथी मारे गए,कुछ गिरफ्तार/आत्मसमर्पण किए। पुलिस ने उक्त मुकदमें में अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय भेजा।
न्यायालय ने १५ वर्ष विचारण के बाद पिछले दिन अपना फैसला सुनाया जिसमें १३ अभियुक्तों को छ पुलिस कर्मी तथा एक गाइड की हत्या का दोषी पाने पर आजीवन कारावास तथा २५-२५हजार रू. से दंडित किया।
छ पुलिस कर्मी तथा एक अन्य की बदला लेने के लिए घात लगाकर जानबूझकर हत्या करने पर भी यदि फांसी नहीं होगी तो कब होगी? जनहित में सिपाहियों द्वारा डकैतों के विरुद्ध अभियान वर्षों से चल रहा था।
जनहित में कार्य करने वाले जनसेवकों की यह नृशंस हत्या थी जो दुर्लभ से दुर्लभतम (Rare of the rarest) थी,यदि इसमें भी फांसी नहीं मिलेगी तो कब मिलेगी.
दूसरे इस वाद के निस्तारण में १५ वर्ष का समय लगना उचित नहीं है।ऐसे मामलों में फैसला शीध्र आना चाहिए जिससे अपराधियों पर प्रभाव पड़े।न्याय में विलंब न्याय को नकारना है।
जब सेना, पुलिस के जवानों की हत्या होती है तो जनता में उसकी प्रतिक्रिया सामान्य सी होती है। यदि एक हिंदू की मुसलमान या मुसलमान की हिंदू हत्या कर दे तो पूरा देश सर पर उठा लिया जाता है।
_हत्या किसी की हो,उस पर तत्परता से कठोर कार्रवाई हो,यदि हत्या किसी लोक सेवक की हो तो उस केस में हर स्तर से अधिक तत्परता की आवश्यकता होगी।_
(चेतना विकास मिशन)






बिल्कुल सही बात।👍💐 सेना और पुलिस के जवान देश की सुरक्षा में तत्पर होते हैं। उनके शहीद होने पर कोर्ट द्वारा फैसले शीघ्र किए जाने चाहिए।👍ताकि शहीदों के पीड़ित परिवारों को राहत राशि जल्दी मिल सके।👍
जय हिंद।👍💐
thenks