(जितने सभ्य, उतनी वैश्याएं)
~ डॉ. नीलम ज्योति

वैश्यावृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
कोठे तो आवाद हो ही रहे हैं, सभ्य लोगों के धर-दफ्तर भी वैष्यावृत्ति में तब्दील होते जा रहे हैं।
अब तो पुरूष वैश्याओं की तादात भी बढ़ रही है। ‘पति’ से असंतुष्टि या उसके अभाव के कारण पुरूष को खरीदने – बुक करने में’ मशगूल हैं संभ्रांत महिलाएं। बाकायदा मजदूरों की तरह मंडी लगने लगी है पुरूष की।
बराबरी का, महिला स्वतंत्रता का जमाना: वे भी पीछे क्यों रहें।
कभी आपने सोचा कि वेश्याएं कैसे पैदा हो गयी? किसी आदिवासी गांव में जाकर वेश्या खोज सकते हे आप।
आज भी बस्तर के गांव में वेश्या खोजनी मुश्किल है। और कोई कल्पना में भी मानने को राज़ी नहीं होगा कि स्त्रीयां ऐसी भी हो सकती है। जो अपनी इज्जत बेचती हो। अपना संभोग बेचती हो।
लेकिन सभ्य आदमी जितना सभ्य होता चला गया। उतनी वेश्याएं बढ़ती चली गयी—क्यों?
यह फूलों को खाने की कोशिश शुरू हुई है। और आदमी की जिंदगी में कितने विकृत रूप से सेक्स ने जगह बनायी है, इसका अगर हम हिसाब लगाने चलेंगे तो हैरान रह जायेंगे कि आदमी को क्या हुआ है? इसका जिम्मा किस पर, किन लोगों पर।
इसका जिम्मा उन लोगों पर है, जिन्होंने आदमी को—सेक्स को समझना नहीं लड़ना सिखाया।
जिन्होंने सप्रेशन सिखाया है, जिन्होंने दमन सिखाया है।
दमन के कारण सेक्स की शक्ति जगह-जगह से फूट कर गलत रास्तों से बहनी शुरू हो गयी है।
हमारा सारा समाज रूग्ण और पीड़ित हो गया है।
इस रूग्ण समाज को अगर बदलना है तो हमें यह स्वीकार कर लेना होगा कि कास का आकर्षण है।
क्यों है काम का आकर्षण?
काम के आकर्षण का जो बुनियादी आधार है, उस आधार को अगर हम पकड़ लें तो मनुष्य को हम काम के जगत से उपर उठा सकते है।
और मनुष्य निश्चित काम के जगत से ऊपर उठ जाये, तो ही राम का जगत शुरू होता है।
खजुराहो के मंदिरों के सामने मैं खड़ा था। दस-पाँच मित्रों को लेकर मैं वहां गया था।
खजुराहो के मंदिर के चारों तरफ की दीवाल पर जो मैथुन चित्र है, काम-वासनाओं की मूर्तियां है। मेरे मित्र कहने लगे कि मंदिर के चारों तरफ यह क्या है ?
मैंने उनसे कहा, जिन्होंने यह मंदिर बनाये थे वे बड़े समझदार थे। उनकी मान्यता थी कि जीवन की बाहर की परिधि पर काम है। और जो लोग अभी काम से उलझे है, उनको मंदिर में भीतर प्रवेश का कोई हक नहीं है।
फिर मैंने अपने मित्र से कहा भीतर चलें, फिर उन्हें भीतर लेकर गया। वहां तो कोई काम प्रतिमा न थी।
वहां भगवान की मूर्ति थी। वे कहने लगे कि भीतर कोई प्रतिमा नहीं है।
मैंने उनसे कहां कि जीवन की बाहर की परिधि काम वासना है। जीवन की बाहर की परिधि दीवाल पर काम-वासना है। जीवन के भीतर भगवान का मंदिर है।
लेकिन जो अभी कामवासना में उलझे है, वे भगवान के मंदिर में प्रवेश के अधिकारी नहीं हो सकते है। उन्हें अभी बहार की दिवाल का ही चक्कर लगाना पड़ेगा।
मगर-
ऐसी आधुनिकता से मनुष्यता रुग्ण हो जाएगी, सड़ जाएगी।
(चेतना विकास मंच)





