शशिकांत गुप्ते
बहुत हुई मुफ्त सेवा। राजनीति मुफ्त शब्द से मुक्त होगी?
मुफ्त तीर्थ यात्रा का लुफ्त उठाने से जो वंचित रह गएं हैं,वे पुण्य प्राप्त करने लाभार्थी होने से भी वंचित रह गए।
दो लोगों की रेवड़ियां बांटने की प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम यह हुआ कि, आमजन अपने पूर्व संचित पापों कर्मो से मुक्ति पाने से वंचित रह जाएगा?
इस मुद्दे पर मैने मेरे मित्र से गहन चर्चा की।
सीतारामजी तो व्यंग्यकार हैं, उन्होंने अपनी व्यंग्य की भाषा में समझाने के लिए, प्रख्यात
हास्य,व्यंग के कवि स्व. काका हाथरसी का एक व्यंग्य सुनाया।
काकाजी ने हास्य,व्यंग्य की अपनी एक कविता में लिखा है।
नेत्रदान का प्रचार सुन काका के मन में एक प्रश्न उपस्थित हुआ।
यदि नेत्र दान करने के बाद हमारी आँख किसी दृष्टिहीन युवक को लगाई,और उस युवक ने यदि किसी सुकुमारी को आँख मारी तो उस युवक का क्या जाएगा, आँख तो हमारी है, पाप तो हमें लगेगा?
काका हाथरसी के उक्त व्यंग्य से एक अहम सवाल उठता है कि जो भी सरकार अपने सरकारी खर्चे से जनता को मुफ्त तीर्थ यात्रा करवाती है,तो पुण्य तो सरकार को ही मिलेगा?
मैने सीतारामजी से कहा आप ग़लत सोच रहें हैं। पुण्य तो देश की जनता को ही मिलेगा। कारण लोकतंत्र में जनता ही देश की मालिक होती है। सरकार का पैसा मतलब जनता का पैसा।
सीतारामजी ने यह तो सैद्धांतिक बात है। हम तो व्यवहारिक बात कर रहें हैं।
मैने सीतारामजी से कहा कि, यह व्यवहारिक बात नहीं है यह तो Commercial मतलब व्यवसायिक बात है। मुफ्त तीर्थ यात्रा के जो लाभार्थी है,वे चुनाव के दौरान एहसान फ़रामोश नहीं हो सकतें हैं? एहसान का बदला उन्हें चुकाना ही पड़ता है। ये अंदर की बात है।
सीतारामजी ने मुझसे पूछा आप कब जा रहे हो तीर्थ यात्रा पर?
मैने कहा संत रविदास ने कहा है, मन चंगा तो कठौती में गंगा
तीर्थ यात्रा से प्राप्त पुण्य से अगला जन्म सुधर जाएगा लेकिन इस जन्म में शेष जितने भी सावन देखना की बाध्यता है,उतने सावन महंगाई की समस्या से जूझना ही पड़ेगा। देश के भावी कर्णधारों की बढ़ती बेरोजगरों संख्या से चिंतित होना ही पड़ेगा।
युवावस्था में सेवानिवृत्त होने के बाद युवाओं को Watchmen की वर्दी में देखने की मानसिक पीड़ा सहन करना ही पड़ेगी।
सीतारामजी ने पूछा आपने अंग्रेजी में Watchmen क्यों बोला?
मैने जवाब दिया हिंदी चौकीदार शब्द का प्रयोग जोख़िम भरा भी हो सकता है।
सीतारामजी ने कहा अभी चौकीदार शब्द असंसदीय शब्दों की सूची में नहीं आया है।
मैने सीतारामजी को शायर इक़बाल अशर,के इस शेर के माध्यम से जवाब दिया।
पहले तो कहा गया था कि,लब आजाद है तेरे
मै बोलने लगा तो डराया गया मुझे
मैने कहा मै डरता नही हूँ।
मुझे शायर उमैर नजमी की ग़ज़ल के शेर याद आ गए।
बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है
बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है
(तहम्मुल का अर्थ सहनशीलता)
मै एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार
मुझे कहानी में डाल गुस्सा निकालना है
सीतारामजी ने कहा सच में जज्बा होना चाहिए।
मुफ्त के वादों को पूर्ण विराम देने के बाद सम्भवतः अगली घोषणा ये भी हो सकती है कि,विपक्ष मुक्त का भारत भी नहीं हो सकता है।
Nothing is impossible.
कुछ भी असंभव नहीं है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





