डॉ. विकास मानव
(मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक, निदेशक : चेतना विकास मिशन)
_कर्म कौन करता है और फल कौन भोगता है : आपका तनमन या आप (आत्मा) ? आप का तनमन।_
आत्मा के बिना मन कैसे कर्म कर सकता है ? यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि आत्मा कर्ता नहीं है तो कर्मफल किसे प्राप्त होता है, भोग कौन भोगता है–मन या आत्मा?
इसे समझें :
मन क्या है ? आत्मा क्या है ?–ये ऐसे प्रश्न हैं जो सदियों से चिन्तन-मनन-अध्ययन के विषय रहे हैं। चिन्तन-मनन-अध्ययन के विषय इस मामले में कि इन विषयों पर स्पष्ट रूप से कहीं किसी ग्रन्थ में प्रकाश नहीं डाला गया है। वेद, उपनिषद, गीता आदि के ज्ञान के अनुसार आत्मा एक तत्व है– विशुद्ध, निर्मल, निरपेक्ष तत्व जो परमात्मा का अंश है।
मन क्या है ?
मन है–आत्मा की ही क्रियमाण अवस्था। आत्मा अक्रियाशील है, उसे मन की शक्ति,मन की चेतना प्रदान की गई है संसार-समाज का अंग बनने पर। आत्मा अक्रियाशील होने के कारण कैसे कर्म कर सकती है ?
यह स्थूल जगत्, भूलोक दरअसल कर्मलोक है जहाँ जीव को कर्म करना पड़ता है। मनुष्य ब्रह्मांड का सर्बश्रेष्ठ जीव इसलिये है क्योंकि उसके पास मन है। मनस्तत्व मनुष्य के अलावा और किसी के पास नहीं है। संसार के सभी जीव प्रकृति के अधीन हैं, माया के वशीभूत हैं। उनमें प्राणतत्व की प्रबलता है.
इसीलये वे *प्राणी* कहलाते हैं। लेकिन मनुष्य एकमात्र ऐसा जीव है जिसमें *प्राणतत्व* के अलावा *मनस्तत्व* भी है। वैसे मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह प्रकृति के अधीन है, लेकिन वह अपने पराक्रम और पुरुषार्थ से प्रकृति की अधीनता से स्वतंत्र हो सकता है।
जब आत्मा को पहली बार भव-चक्र का हिस्सा बनाया गया तो उसमें मनरूपी माया की क्रियमाण चेतना उसके साथ संयुक्त की गई। मन और आत्मा एक दूसरे से इतने गहरे में संयुक्त हो गए कि मन क्या है, आत्मा क्या है ?
यह एक तत्वदर्शी के सिवाय और कोई नहीं जानता। जो आत्मा को मन से पृथक करके, उसकी स्वतंत्र सत्ता की अनुभूति कर लेता है, वही सही मायने में तत्वदर्शी कहलाता है। वह तब जान जाता है, अनुभव भी कर लेता है कि आत्मा तो निरपेक्ष है, निर्लिप्त है जल-कमलवत। आत्मा को कर्म करने की न तो आवश्यकता है और न वह कर्म करती है।
आत्मा के साथ संयुक्त होकर मन ही सारा कार्य-व्यापार संचालित करता है जिसका आरोपण सीधा आत्मा के ऊपर होता है। बस, यहीं पर माया का सारा खेल है। यही अज्ञानता का पर्दा है।
मन के द्वारा किये गए सारे कार्य-व्यापार के लिए आत्मा अपने को उत्तरदायी मान लेती है।
अगर विचारपूर्वक देखा जाय तो आत्मा उस दर्पण के समान है जिसमें किसी भी वस्तु का प्रतिविम्ब उभर तो आता है, लेकिन जैसे ही वह वस्तु दर्पण के सामने से हटती है, वैसे ही दर्पण से प्रतिविम्ब समाप्त हो जाता है और दर्पण स्वच्छ और निर्मल दिखाई देने लगता है पूर्व की तरह।
दर्पण से विपरीत है– फ़िल्म की रील। जब रील किसी प्रतिविम्ब को पकड़ती है तो रील के नष्ट होने तक वह प्रतिविम्ब रील को नहीं छोड़ता। मन और आत्मा में दर्पण और फ़िल्म की रील की तरह अंतर है। दर्पण पर जब कोई प्रतिविम्ब पड़ता है तो दर्पण आत्मा की तरह किसी भी प्रतिविम्ब को पकड़ता नही।
आत्मा से मनरूपी प्रतिविम्ब जब एक वस्तु की भाँति अलग होता है तो निर्मल आत्मा अपने निज अलिप्त निरपेक्ष स्वरूप को पहचान लेती है। वह साक्षीभाव से यह भी देख लेती है कि वह किसी भी कर्म की कर्ता नहीं है, किसी भी कर्म के लिए उत्तरदायी भी नहीं है। वास्तविकता का ज्ञान ही सही मायने में मोक्ष है।
आप कहेँगे : इसका मतलब तो यह हुआ कि मन ही शरीर का स्वामी है, आत्मा नहीं। वह तो द्रष्टा है ?
निस्संदेह, स्वामित्व का भाव तो मन में ही रहता है, वही अपने स्वभाव और गुण के कारण अपने को शरीर का स्वामी समझ बैठा है। वैसे देखा जाय तो वह भी स्वामी नहीं है, वह तो शरीर रूपी भवन का किरायेदार जैसा है। किरायेदार घर बदलता रहता है जन्म-जन्मान्तर तक और वह अपनी ओछी सोच की वजह से भवन का स्वामी मान रहा है तो कोई कर भी क्या सकता है ? आत्मा में कोई भाव नहीं है, कोई विचार भी नहीं है।
भाव, विचार, भावना, कामना–ये सब मन की उपज हैं, संसार की उपज हैं। आत्मा निर्भाव है, निर्विचार है, निरपेक्ष है, निर्लिप्त है।
आप अब पूछेंगे : तो क्या आत्मा को द्रष्टा मान लिया जाय ?
तो इसमें न मानने की कौन-सी बात है ? आत्मा सभी क्रियाओं की, सभी गतिविधियों की मात्र द्रष्टा है, साक्षी है। जैसे नदी में बहते हुये जल को नदी के किनारे खड़ा हुआ पेड़ साक्षीभाव से देखता रहता है, जल बहता जाता है, पेड़ को उससे कोई सरोकार नहीं।
उसी तरह शुद्ध-बुद्ध-निर्लिप्त-निरपेक्ष आत्मा सब कुछ घटित होते हुए देखती रहती, क्योंकि आत्मा एक तत्व है–निष्क्रिय, निर्लिप्त उस परमात्मा की तरह जो स्वयम् में एक परमतत्त्व है।
परमात्मा भी अक्रियाशील् है अपने आप में। परमात्मा की जो क्रियमाण शक्ति है, वही तो भगवती है, काली है, लक्ष्मी है, सरस्वती है। वही दुर्गा है। वही माया है। परमात्मा अपने आप में अक्रिय है। जो कार्य वह करना चाहता है, जो कार्य होता हुआ दिखलाई देता है, उसका माध्यम बनती है माया, शक्ति या प्रकृति।
आत्मा भी इसी प्रकार कोई कर्म स्वयम् नहीं करती है। मन की शक्ति स्वयम् सारा कार्य करती है, लेकिन मन के अज्ञान रूपी अंधकार के आवरण की वजह से आत्मा को यह आभास होता है कि यह कार्य उसीने किया है। इसीलिये वह अपने को कर्म का उत्तरदायी और दोषी मान लेती है।
सुख-दुःख, सफलता-असफलता, शांति-अशांति–ये सभी मन की सतह पर उत्पन्न होने वाले विकार हैं। चूंकि आत्मा स्वयम् को ही कर्मो के प्रति लिप्त होकर अज्ञानतावश उत्तरदायी मानती है, इसीलिये वह कर्मफल और अच्छे–बुरे भोग उस समय तक भोगती है, जिस समय तक वह अज्ञान में पड़ी रहती है।
जिस पल उसे इस बात का ज्ञान होता है कि आत्मा उसी परमतत्व का एक लघु स्वरूप है, आत्मा का सारा अज्ञान नष्ट हो जाता है। अब वह निखर कर शुभ्र्, ज्योतिर्मयी प्रकाशपुंज के स्वरूप में अपने ही निज स्वरूप का साक्षात्कार करती है, आत्मज्ञान करती है और कर डालती है सारी भ्रान्तियों का पर्दाफाश।
_फिर तो वह जान जाती है कि इन सारी अज्ञानमयी भ्रांतियों का एकमात्र कारण है मन। आत्मा न तो कर्म की कर्ता है और न ही कर्मफल की भोक्ता।_
[चेतना विकास मिशन)





