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इंदिरा  का आपातकाल और मोदी का अघोषित आपातकाल

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सुसंस्कृति परिहार

बार बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी को इंदिरा गांधी के द्वारा लगाए गए आपातकाल के तानों को सहना पड़ रहा है। वो क्या था जो इस काल को नहीं जानते उन्हें यह मालूम होना चाहिए 25जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था।  तब तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी थी उसके बाद कैबिनेट और संसद (जुलाई से अगस्त 1 9 75 तक) द्वारा अनुमोदित किया गया था। इस तर्क के आधार पर कि आसन्न आंतरिक और बाहरी खतरे थे भारतीय गणराज्य को। जबकिइसकी जड़ में 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। और श्रीमती गांधी के चिर प्रतिद्वंदी राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था। 

राजनारायण सिंह की दलील थी कि इन्दिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था। इसके बावजूद श्रीमती गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा था कि इन्दिरा गांधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।

इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गईं। इन्दिरा गांधी ने अदालत के इस निर्णय को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। जिसके तहत बड़े विरोधी नेताओं को जेल में डाल दिया गया।प्रिंट मीडिया पर नज़र रखी जाने लगी। लेकिन आम जनता में बहुतेरे लोग ऐसे थे जो इस व्यवस्था से खुश थे वे कहते नहीं थकते थे रेल समय पर चल रही हैं हर दफ्तर में अधिकारी कर्मचारी उपस्थित मिलते थे।उनके  मामलों को सुना जा रहा था  सारी व्यवस्थाएं चाक चौबंद थीं लेकिन दूसरी ओर अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक ,नेताओं को जेलऔर संविधान में बदलाव के खिलाफ निरंतर जनमानस को जगाया गया।यह ज़रूरी था।

इसके परिणाम स्वरूप देश में विरोध की लहर वेग से चली  परिणाम स्वरुप भारतीय आम चुनाव, 1977 में स्वतंत्र भारत में पहली बार सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भारत पर नियंत्रण खो दिया । कांग्रेस ने अपनी शक्ति खो दी और कमजोर हो गई। पार्टी को करीब 200 सीटों का नुकसान हुआ। जयप्रकाश नारायण द्वारा चार प्रमुख विपक्षी दलों को जनता पार्टी में एकीकृत किया गया था।

मोरारजी जी देसाई प्रधानमंत्री बने।आपातकाल के दुर्भाग्यपूर्ण कालखंड की कोख से 1977 में जिस नए गैर-कांग्रेसी प्रयोग का जन्म हुआ उसने 1980 आते-आते दम तोड़ दिया। जनता पार्टी में शामिल विभिन्न घटक दलों के नेताओं ने अपनी आपसी कलह से कांग्रेस और इंदिरा गांधी के फिर से सत्ता में लौटने का रास्ता साफ कर दिया। इंदिरा गांधी की पुनर्वापसी हुई।

यह मानते हुए कि यह आपातकाल भारत के लिए एक काला अध्याय था जिसमें सत्ता के प्रति लोभ ने  21माह ये दुर्दिन दिखाए किंतु यह भी आश्चर्यजनक बिंदु है वहीं इंदिरा पुनः सत्तारूढ़ होती हैं अपनी गलती स्वीकारती  हैं तथा संविधान में ये प्रावधान भी करती है कि भविष्य में ऐसी गलती कोई ना कर सके।यह 45वें संविधान संशोधन में उल्लेखित है

अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की उद्घोषणा (प्रोक्लेमेशन) संविधान को आपातकाल की पूरी अवधि के लिए संघीय (युनिटरी) राज्य में बदलकर प्रभावी रूप से संशोधित करती है और नागरिकों को अदालत में उनके निलंबित हुए मौलिक अधिकारों, जैसे कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार, के लिए याचिका दायर करने की अनुमति देती है। इसके नतीजतन, यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है कि यह प्राधिकरण (अथॉरिटी) उचित रूप से नियोजित है और इसका दुरुपयोग नहीं किया जा रहा है। नतीजतन, यह कहा जाता है कि आपातकाल की उद्घोषणा तभी जारी की जानी चाहिए जब भारत या उसके क्षेत्र की सुरक्षा युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से खतरे में हो। आंतरिक अशांति, जो सशस्त्र विद्रोह के स्तर तक नहीं पहुंचती है वह उद्घोषणा जारी करने का आधार नहीं होगी।

यही वजह है कि वर्तमान सरकार सीधे सीधे आपातकाल का इस्तेमाल नहीं कर रही जबकि अघोषित आपातकाल के तहत लगभग मीडिया को खरीदकर उसकी आवाज बंद कर चुकी है।अल्पमत होते हुए भाजपा सरकार  बनाने में भी विधायकों की खरीद-फरोख्त कर जनता के मत का अपमान कर रही है। सामाजिक कार्यकर्ताओं  जो दलित और आदिवासियों के बीच जन जागृति अभियान चला रहे हैं और बुद्धि जीवियों  ,स्वतंत्र पत्रकारों पर जो झूठ के खिलाफ जनहित में सतत लिख रहे हैं उन पर  राष्ट्रद्रोह के मुकदमे दर्ज किए गए हैं। सरकार समर्थक संघ के अनुशंसी संगठनों द्वारा डा०नरेन्द्र दाभोलकर,कलबुर्गी,पानसरे ,गौरी लंकेश की सरेआम हत्या अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती उनके खान पान और पोशाक पर निगरानी , मजदूर हितैषी कानूनों की वापसी।शिक्षा , स्वास्थ्य और रक्षा बजट में कटौती तथा सबसे अहम आम ज़रुरतों के सामान पर लगने वाली जी एस टी है। देश की संपत्ति बिक रही है। सरकारी संस्थान  खत्म हो रहे हैं।22करोड़ बेरोजगार हैं। खाद्यान्न सुरक्षा लगभग बंद होने की कगार पर है मंहगाई चरम पर है। आवाज़ उठाने वाले  आंदोलनों को कुचला जा रहा है। ई डी का डरावना स्वरुप बनाकर ईमानदार को भी सताया जा रहा है ।मंदी का आलम है नोट हद पार कर गिर रहा है। बैंकों की हालत खराब है।जमा राशि मिलेगी या नहीं। असमंजस बना हुआ है। सरकार कहती है सब चंगा सी।उसे मंहगाई कहीं नज़र नहीं आती।

इस अघोषित आपातकाल का लक्ष्य अपने चंद मित्रों को विश्व का नंबर वन अमीर बनाना है ।साथ ही साथ गरीबी और कमरतोड़ मंहगाई से शिक्षा को ग्रहण लगाना है क्योंकि पढ़ लिख कर ही व्यक्ति में साहस और प्रतिरोध जन्म लेता है तभी तोआगे चलकर मनुवादी संविधान लागू करना आसान होगा।

कुल मिलाकर भले हम आज़ादी का अमृत काल मना रहे हों किन्तु यह साफ नज़र आ रहा है कि यह आपातकाल हमें अपनी तमाम आज़ादियों और अधिकारों से धीरे धीरे वंचित करता जा रहा है और वे हमें तिरंगा और आज़ादी का संदेश दे रहे हैं जबकि तिरंगा खुद संघ कार्यालय में आज भी छटपटाहट महसूस कर रहा है। उसे स्वदेशी संसाधनों की जगह अंबानी के पोलियस्टर और चीन के सहयोग से बाजार की वस्तु बनाया जा रहा है।यह तिलस्म टूटना चाहिए।यह करोड़ों के व्यापार का नया फार्मूला है।

यह जो आपातकाल है वह तमाम देश का कचूमर निकाल रहा है संविधान में जितनी स्वायत्त संस्थाएं हैं मसलन चुनाव आयोग,प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रपति, राज्यपाल, न्यायपालिका, मीडिया सबके सब धराशाई हैं।यह बहुत ख़तरनाक समय है।उस आपातकाल से 21माह में निजात मिल गई थी पर यह तो आठ साल बाद भी शान से अपना सिक्का जमाए हुए हैं।अब यह देश की अवाम के हाथ है कि वह इस आपातकाल को कब समझेगी और कब जागेगी। कहीं यह तो नहीं होने वाला देश नहीं बिकने दूंगा और वह बिकता जा रहा है। तिरंगे की उछाल से भी डर लगता है क्योंकि यह गुप्त आपातकाल जो है।

Ramswaroop Mantri

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