अग्नि आलोक
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दूसरा जीवन 

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हो गई है शाम आज,
सवेरा कल भी होगा..!
घनघोर अंधकार के बाद,
उजाला कल भी होगा…!
मकसद नहीं जीवन का हमारे,
रुक जाना डरकर परिस्थियों से,
हम परिंदे हैं उन्मुक्त गगन के,
रोकने वाला ना कोई होगा,
जीवन-यात्रा है दूर तक की..!
आओ हम भी आगे बढे़ चले।
जिंदगी है एक रेल सी हमारी,
दूरी भी लंबी तय करनी है,
रूको नहीं, डरो नहीं..!
ओ साथी…!
तलाश में खुशियों से भरी,
जिंदगी की..!
चलो..! साथ बढे़ चले,
कुछ यादगार पल जुड़ जाएंगे,
चलना भी सिखा जाएंगे कुछ पल हमें,
क्या है अपना इस जग में ?
सब व्यस्त है तलाश में,
किराए की खुशियों की..!

अंदर ही अंदर मन को ममोस कर..!
जीता रहता हैं अपना दूसरा जीवन,
नियम कभी नहीं बदलेगा,
इस जीवन का..!
रूबरू होते रहेंगे जमाने के,
नित नए तौर-तरिकों से..!
कुछ नहीं बदलेगा..!
ना बदलेगा जमाना,
सिर्फ हमारे लिए..!
आओं बढ़ते चले,
उस अनजान मंजिल की ओर,
रखे चेहरे पर मुस्कान…!
हो गई है शाम आज,
सवेरा कल भी होगा..!
घनघोर अंधकार के बाद,
उजाला कल भी होगा..!

शंभू राय
सिलीगुड़ी, पं० बंगाल

Ramswaroop Mantri

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