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स्त्री सामान या महाभारत की मैदान नहीं

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सुधा सिंह

       _स्त्री फूल की तरह कोमल है।  फूल को रगड़कर ,नोचकर ,उसके शरीर पर निशान बनाकर, बाहर भीतर घिसकर या फटाफट उसमें गंदगी डालकर उससे प्यार नही किया जा सकता।_

  स्त्री का शरीर और उसकी योनि की नसें बेहद संवेदनशील होती हैं।बहुत ज्यादा शूक्ष्म होती हैं।

आज जो महिलाए डॉक्टर के पास जा रही है उसका एक कारण ये भी है कि उनके शारीरिक सम्बन्धो में हिंसा या महज शोषणजनित अतृप्ति है।

    क्षणिक वासना के वेग के चलते न तो पुरुष को होश रहता और न स्त्री इतनी हिम्मत कर पाती है की पुरुष को “न” कह सके।

     _बच्चेदानी में हजारो बीमारी लग जाती है। महावारी में भयानक दर्द ,ocd ,pocd.. और भी पता नही क्या- क्या उसे सहन करना पड़ता है।_

पुरुष एक्टिव है स्वभाव से और स्त्री पैसिव ! इसलिए पुरुष को समझना चाहिए कि पल भर की वासना के लिए किसी स्त्री का शरीर खराब न करे।

      _वैसे भी अगर सेक्स को भी धर्य और तरीके से किया जाए और एक ठहराव हो भीतर : तो उसके परिणाम दोनों व्यक्तियों के लिए सुखद होते है। सन्तुष्टि भी मिलती है।_

      जोश में आकर अपनी नामर्द शक्ति का प्रदर्शन करने वाले पुरुष कभी भी स्त्री को सन्तुष्टि उपलब्ध नही करा पाते।

    विवाहितों ने भी अनुभव किया होगा कि सालो तक सेक्स करने पर भी उनके भीतर सेव इच्छा ज्यों की त्यो है।

इसका कारण यही है कि उन्हें गहराई ही नही जानी कभी इस चीज की। बस जल्दी से निचुड़कर शीघ्रपतित होते रहे.

    _45 मिनेट से पहले तो स्त्री का शरीर खुलता ही नही, वह गरम ही नहीं होती की वो तुम्हे अपनी बाहों में भरे या तुम्हे अनुमति दे कि तुम उसके भीतर प्रवेश करो। मज़बूरी में सब करे, अलग वात है._

     _केवल पेनिट्रेशन को सेक्स समझकर शीघ्रतापूर्वक निचुड़ने वाले बलात्कारी है। अपने ही साथी का बल पूर्वक हरण करना और फिर अतृप्त छोड़ देना बलात्कार ही होता है।_

        आज जो 90 फीसदी महिला ऑर्गेज़्म से अनजान है. उसका कारण सेक्स की अज्ञानता नहीं पेनिस का मुर्दापन है। पुरुष इस बात को अहंकार पर चोट न समझे ब्लिक अपने आपको बेहतर बनाने का प्रयास करें।

     _खुद को मर्द बनाएं. अपनी महिला मित्र के पैर छुए. उससे अनुमति ले. उसके प्रति श्रद्धा भाव रखे. उसके बाद इस बात का ध्यान रखे कि उसे दर्द न दें और परम आनंद दें._

       अमूमन औरत अछूती ही रह जाती है तुम्हारे स्पर्श से. तुम भी सिर्फ़ उसका मुर्दा शरीर भोगकर, स्त्री से अछूते लौटकर आते हो।

       _बहुत धीरे-धीरे स्त्रीशरीर तैयार होता है. बहुत धीरे- धीरे वो द्वार खुलते है जब तुम्हे अनुमति मिले। ये सब समझने के लिए भीतर स्थिरता चाहिए। बिना मैडिटेशन के ये सम्भव नही।_

     बिना ध्यान के जीवन उथला ही रहता है। अगर गहराई चाहिए जीवन मे तो ध्यान बहुत जरूरी है. होश, ठहराव, स्थिरता, धीरज, प्रेम, श्रद्धा, तृप्ति, मुक्ति : ये सारे शब्द केवल ध्यान करने से ही जीवन मे अर्थ पाएंगे। 

Ramswaroop Mantri

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