अग्नि आलोक
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*समय चिंतन : आजादी की जगह

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 पुष्पा गुप्ता

रात को सुरक्षाकर्मी ने आकर बताया कि सर आजादी आयी हुईं हैं।

नेता कुछ सोच में पड़ गया। 

पूछा,’आजादी!!! कौन आजादी! ‘

अब सुरक्षाकर्मी इसका क्या जवाब देता। वह हाथ बांधे खड़ा रहा।

नेता फिर कुछ सोचते हुए बोला,’अच्छा भेजो! देखते हैं!’ सुरक्षाकर्मी जब जाने लगा तो नेता बोला,’सुनो!अच्छे से तलाशी ले लेना!’

‘जी सर’ कहकर वह चला गया। थोड़ी देर बाद आजादी उसके सामने थी।

नेता ने उसे देखा। उसने पहचानने की कोशिश की। कई बार आंखें चकमक चकमक कीं। फिर उसे ध्यानपूर्वक देखा।

‘इत्ती रात को!’, नेता की आंखें अभी तक आजादी के ऊपर से हटी नहीं थीं।

‘हां,इमरजेंसी थी!’ आजादी ने आने का औचित्य बताया।

‘ हूं..’ नेता ने बस इतना ही कहा।

‘मैं कब से खड़ी थी। आपसे मिलना चाह रही थी, मगर मुझे आने ही नहीं दे रहे थे सब!’ आजादी ने एक सांस में सब बताया।

‘आते ही शिकायत कर रही हैं आप!’ नेता ने बहुत प्यार से कहा।

‘ न-न… अपना हाल बता रही हूं!’ आजादी ने सफाई दी। 

‘ऐसे थोड़े न कोई आ सकता!’ नेता मुस्कुराते हुए बोला।

आजादी ने नेता को हैरत से देखा।

‘देश अब आजाद है।’ आजादी ने जोर से कहा।

यह सुनते ही नेता उठा। अपना कुरता झाड़ा। टॉयलेट में घुसा। थोड़ी देर बाद आजादी के कानों में फ्लश करने की आवाज आई। नेता बाहर आया। आजादी को कुर्सी पर अभी तक बैठे देख उसका मुंह बिचका। उसने भारी मन से फिर से औपचारिकता निभाई।

‘और बताएं कैसे आना हुआ!’ यह पूछते हुए वह सोफे पर बैठ गया।

आजादी तो जैसे इस अवसर के लिए ही बैठी थी। आजादी ने बताना शुरु किया,

‘जब मैं यहां के लिए आ रही थी तो मैंने देखा कि एक गांव में भीड़ लगी हुई है। कई बंदूकें तनी हुईं हैं। कुछ लोग अपशब्दों की बौछार कर रहे हैं,तो कुछ लोग हाथ जोड़ कर विनती कर रहे हैं। जब मैंने मामला पता किया तो पता चला कि दूल्हे को घोड़ी पर कुछ लोग बैठने नहीं दे रहे। मैंने विरोध करने वालों से कहा कि बैठने दो भाई,अब काहे का टंटा…अब तो आजादी है। यह सुनते ही लोगों ने मुझे दौड़ा लिया…बोले कि…’ 

आजादी अभी बता ही रही थी कि बीच में नेता ने टोका,’फिर मैं क्या कर सकता हूं! यह तो पुलिस का मामला है।’

‘आप आला कमान हैं। सारे निर्णय यहीं से लिए जाते हैं…यहां आने से पहले मैंने पता कर लिया है। तभी तो आप के पास आई हूं…’

आला कमान शब्द सुनकर नेता को अच्छा लगा। कुरते के बटनों ने सहसा बहुत अधिक कसाव महसूस किया।

‘जिस वर्ग से दूल्हा आता है, वो हमारा वोट बैंक नहीं हैं।’ नेता ने दो टूक कहा।

‘वोट बैंक क्या होता है!’ आजादी को समझ में नहीं आया।

नेता ने आजादी को देखा। वह भोली दीख रही थी। उसने महसूस किया कि वह चाहे जितने साल की हो गई हो, मगर मैच्योर तो बिल्कुल ही नहीं हुई।

‘वोट बैंक एक ऐसा बैंक होता है, जहां संविधान को लॉकर में बंद करके रख दिया जाता है।’ नेता ने मन ही मन में इस बात को दो-तीन बार बोला। जैसे वह कोई संकल्प दोहरा रहा हो। फिर आगे मन में उसने यह भी कहा। ‘और जब कभी सत्ता का मन होता है, तो सत्ता द्वारा लॉकर खोलकर उस पर एक नजर मार ली जाती है।’ और अब जाकर उसके मन की बात पूरी हुई।

आजादी के सवाल को टालते हुए वह बोला,आपका पर्सनल कोई काम हो तो बोलिए!’ 

आजादी झट से बोली,’ कल एक होटल में जाते समय उसके बाहर मुझे एक अर्ध नग्न मिला। मैंने निगाहें नीची कर लीं…जैसे…’

‘अब लोग उलजुलूल फैशन करने लगे हैं ‘ नेता बीच में बोल दिया।

‘पहले मुझे भी ऐसा लगा। जब तक उस होटल में मैं नहीं घुसी थी। खाना खाने के बाद मैंने खाने का बिल देखा,तो मामला समझ में आया। बिल चुकाने में ही उसके कपड़े उतर गए होंगे। किसी तरह से मेरी इज्जत बची! आजकल घूमते वक्त मुझे कई लोग ऐसे ही दिख रहे हैं। महंगाई ने दो जून की रोटी मुहाल कर दी है…मैंने खुद जाकर दुकानों में रेट लिस्ट चेक की है। और तो और बेरोजगारी कोढ़ में खाज वाला काम कर रही है…’ यह कहकर आजादी चुप हो गई। अब वह कुछ हल्का महसूस कर रही थी। इस बार नेता जी ने उसे नहीं टोका। आजादी को हैरत हुई।

‘देखो रही बात बेरोजगारी की…तो युवाओं को हमने दूसरे काम दे रखे हैं और वह उसी में खुश हैं… तुम्हें इसकी चिंता करने की जरूर नहीं है…’

आजादी वह दूसरे काम समझना चाहती थी, मगर उसने अपना सारा ध्यान महंगाई पर केंद्रित किया,’और महंगाई!!! मैंने खुद देखा है कि इधर दाम में काफी बढ़ोतरी हुई है…’

‘स्याला वाकई! दाम काफी बढ़ गए हैं!’ नेता आजादी से न बोलकर खुद से बोला।

मगर आजादी ने सुन लिया। वह खुशी से फूली नहीं समायी। वह चहकते हुए बोली,

‘मेरी किसी बात से तो सहमत हुए.. अच्छा लगा कि आप को आटे दाल का भाव पता है!’

नेता ने आजादी को देखा। वह उस पर मोहित हुआ। मुस्कुराते हुए बोला,’मैं विधायक की बात कर रहा हूं आंटी जी.. और आप आटे दाल जैसी तुच्छ बातों को लेकर बैठी हैं!’

आजादी सकपका गई।  

नेता आगे बोला,’पता है,सरकार गिराना-बनाना कितना महंगा हो चला है आजकल! पहले विधायक एक दो करोड़ में मान जाते थे,अब स्याला पचास करोड़ से कम पे कोई राजी ही नहीं होता!’ नेता थूक घोटते हुए बोला।

‘हां तो आपको क्या कमी है!आपका कोठार तो भरा हुआ है!’ कमरे में चारो ओर अपनी आंखों को घूमाते हुए आजादी बोली।

‘पन मार्जिन कम होता है न! यह सब धंधे की बात है,आप नहीं समझोगी!’ नेता थोड़ा झुंझलाया।

‘आपके दुख के आगे तो उन लोगों का दुख कुछ भी नहीं!’ आजादी जब यह सब कह रही थी तो उसकी आंखें जगमगाते झूमर को देख रही थीं।

नेता चुप रहा। वह जानता था कि आजादी उस पर तंज कस रही है।

‘कहां आप विधायक खरीद रहे हैं और कहां जनता रोटी नहीं खरीद पा रही!’ आजादी तुरंत ही मुद्दे की बात पर आ गई। 

‘झूठ बात, ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। सब प्रोपेगेंडा है।’ नेता गुस्से से बोला। कुछ सेकेंड रुक कर आगे बोला,’राष्ट्र निर्माण में कुर्बानी तो देनी ही पड़ती है!’ 

‘सरकार बनाने को आप राष्ट्र निर्माण कहते हैं!भूल गए आप इस राष्ट्र के लिए कितनी कुर्बानी दी गई है!’ न चाहते हुए भी आजादी का दर्द छलछला गया।

नेता चुप रहा। उसका मन ही नहीं हुआ कि इस बात की कोई सफाई दी जाए। 

‘वैसे राष्ट्र निर्माण का कोई खाका है!’ आजादी ने पूछा।

‘खाका नहीं खाकी है!’ यह कहकर नेता हँस पड़ा।

‘अरे महाराज!राष्ट्र निर्माण कैसे करेंगे!’  आजादी ने खीजते हुए पूछा।

‘ठोक-बजा कर’

‘मैं समझी नहीं!’

‘जो गद्दार हैं उनको ठोका जाएगा और जो राष्ट्र निर्माण में रोड़े अटकाएंगे उनको बजाया जाएगा!’ नेता जोश में बोला। उसके चहेरे पर चमक आ गई। आंखें लाल हो गईं। सीना फूल गया। वह सोफे से पांच-छः फीट उठा हुआ महसूस हो रहा था।

ये सब देख-सुन आजादी घबरा गई। उसकी सासें तेज हो गईं।

आजादी की ऐसी हालत देख नेता मुस्कुराया। बोला ‘अरे मैं तो मजाक कर रहा हूं!’

आजादी को यकीन न हुआ। वह अब भी घबराई हुई थी।

नेता आजादी को दुलारते हुए बोला,’ ये तो मुहावरा है। एक जुमला है बस! ठोक-बजा कर मतलब देख-परख कर! अपन कहते नहीं है कि कोई भी चीज लेने से पहले ठोक-बजा कर देख लेना चाहिए! है कि नहीं!’

आजादी ने सामान्य होने की कोशिश की।

‘कुछ रचनात्मक भी होना चाहिए!’ आजादी ने गंभीर होकर कहा।

‘वैसे इससे ज्यादा रचनात्मक क्या होगा, पर आपकी तसल्ली के लिए बता दूं कि इसके अलावा भी हम बहुत कुछ रचनात्मक कर रहे हैं!’ नेता ने सगर्व बताया।

‘मसलन’ 

‘हम इतिहास को दुरुस्त कर रहे हैं!’ नेता ने अपना हाथ मसलते हुए कहा।

‘इतिहास को कोई कैसे बदल सकता है!’ आजादी को हैरत हुई।

‘लिख के!’

‘लिख के!’

‘हां अपने आदमी से लिखवाकर!’ 

‘यह तो झूठ होगा! मक्कारी होगी!’ आजादी ने विरोध किया।

‘अगर इसके आगे आपने एक लफ्ज भी कहा तो गद्दारी होगी!’ नेता की आवाज भारी हो गई।

आजादी सहम गई। उसकी हालत देख नेता को हँसी आ गई।

आजादी को घुटन महसूस होने लगी। उसे लगा कि अगर यहां कुछ देर और रही तो उसका दम निकल जाएगा! वह नेता से बोली,’अच्छा तो मैं चलूं!’

‘अरे ऐसे कैसे!आपके आने की खुशी में तो हम अभियान चला रहे हैं!’ 

‘कैसा अभियान!’

‘डी पी बदलो महाउत्सव अभियान!’ नेता ने खुश होते हुए यह बात बताई।

‘जी,डीपी बदलो अभियान! इसमें क्या होगा जी!’ आजादी अब कुछ नरम पड़ी।

‘इसमें लोग अपने मोबाइल की डीपी बदल कर तिरंगा लगाएंगे! और हां एक बात और…जीडीपी नहीं डीपी अभियान!’ नेता ने समझाया।। 

‘जी,मैंने भी तो वही कहा जी,डी पी बदलो अभियान!’ आजादी ने विनम्रतापूर्वक कहा।

नेता ने आजादी को घूरा। अचानक उसका चेहरा सख्त होने लगा। उसके शरीर में कुछ परिवर्तन होने लगे।

‘यहां आने से पहले तुम किससे मिली थी!’ नेता अचानक आप से तुम पर आ गया। आजादी के बोलने से पहले वह बोला,’गैंग से मिल कर आई हो न!’ नेता सोफे से उछल कर खड़ा हो गया।

‘कौन सा गैंग!’ आजादी ने डरते-डरते पूछा।

‘तुम्हारे तेवर देखकर शक तो मुझे पहले ही हो गया था… तब से तुमको बर्दाश्त कर रहा हूं! सवाल पे सवाल पूछे जा रही है!अरे वो ढपली बजाने वाले लौंडे-लफाड़ियों की टोली से मिली हो न तुम!’ नेता आजादी के हाथ उमेठते हुए बोला।

आजादी जोर से चीखी। 

कांपते हुए बोली,’मिली नहीं हूं,हां पर वे मिले थे!’

‘हमें चाहिए आजादी!’, नेता दांत पीसते हुए अजब ढंग से बोला।

‘यहां तो बहुत पड़पड़ बोल रही हो! वहां तुमसे कहा नहीं गया कि मैं तो तुम्हारे सामने हूं और तुम स्यालों को अब कौन-सी आजादी लेनी है!’ नेता ने अपने होठों को चबाया। नेता की भाव भंगिमा देख आजादी की जान सूख गई।

‘बोल न!’, नेता चीखा।

‘वे कह रहे थे कि मैं अधूरी है। उन्हें पूरी आजादी चाहिए!’ यह कहकर आजादी चुप हो गई।

‘चुप क्यों हो गई!आगे बोल!’ नेता ने आजादी के कान पकड़े।

‘वे कह रहे थे कि जहां बोलने तक की आजादी न हो, उसे क्या आजाद मुल्क कहेंगे!’ आजादी सिसकियां लेती हुई बोली।

‘बोलने की आजादी नहीं हैं! झूठ बोलते हैं वे सब! लोग बोल रहे हैं! खुले आम बोल रहे हैं! और खूब बोल रहे हैं! रुक तुझे मैं सबूत देता हूं!’

नेता ने अपने मोबाइल पर कुछ सर्च किया और एक वीडियो उसके सामने कर दिया।आजादी ने देखा कि मोबाइल में एक लड़की कह रही थी कि आजादी तो अंग्रेजों से हमें लीज पर मिली है।

इसी क्रम में नेता ने झट दूसरा वीडियो भी दिखाया।

जिसमें एक बहुचर्चित अभिनेत्री कह रही थी कि आजादी तो हमें भीख में मिली थी। असली आजादी तो हमें कुछ वर्षो पहले मिली है।

यह सब देख आजादी स्तब्ध थी। 

उसने हिम्मत कर नेता से पूछा,’फिर मैं कौन हूं!!!’

‘फिलहाल तुम मेरी बंधक हो!’ नेता ने स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट कर दी।

  उस रात आजादी को नेता के बंगले में घुसते हुए तो लोगों ने देखा, मगर बाहर निकलते हुए उसे किसी ने नहीं देखा!

     (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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