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जग हंसाई कराने वाला अजीबोगरीब फैसला

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मुनेश त्यागी एडवोकेट

      भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बाबरी विध्वंस को लेकर यूपी सरकार के खिलाफ अवमानना की 30 साल पुरानी याचिका को रद्द कर दिया है। यहां पर सवाल यह है कि क्या बाबरी मस्जिद ढहाने वाले दोषियों को कानून सम्मत सजा मिल पाई है?  न्यायालय का यह फैसला प्रथम दृष्टया एक घोर अन्यायपूर्ण और संविधान विरोधी फैसला है। एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में यह क्या हो रहा है,? अभी अगले आने वाले दिनों में और क्या-क्या दिन देखने पड़ेंगे?

    भारत का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे प्रतिमाओं का रखा जाना गलत और अपवित्र काम था। भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी मान चुका है कि ए एस आई यह तथ्य स्थापित नहीं कर पाया है कि मंदिर को गिराकर वहां पर मस्जिद बनाई गई थी। भारत का सर्वोच्च न्यायालय यह भी कह चुका है कि हिंदुओं का यह  मानना कि श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था, यह आस्था का सवाल है, लेकिन मालिकाना हक को धर्म और आस्था के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता। हम यहीं पर यह भी अवगत कराना चाहते हैं की दशरथ का अयोध्या महल बाबरी मस्जिद से 5 किलोमीटर दूर पर स्थित है, तो फिर श्रीराम बाबरी मस्जिद के बीच वाले गुंबद में कैसे पैदा हो गए थे? यह एक सोचने वाला प्रश्न है।

    भारत का सर्वोच्च न्यायालय यह भी मान चुका है कि वहां मूर्तियां रखी गई थीं और इमाम को मारा गया था। भारत का सर्वोच्च न्यायालय यह भी स्थापित कर चुका है कि बाबरी मस्जिद को ग़लत तरीके से तोड़ा गया था। ठीक है, वहां मंदिर बनाया जा रहा है, वहां पर पूजा पाठ कर लीजिए। जब सर्वोच्च न्यायालय यह मान चुका है कि बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी और बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों वाले मंच के ऊपर से कह रहे थे कि हमें बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर गर्व है और भी यह भी नारे लगा रहे थे कि,,,

 यह अंदर की बात है, 

 पुलिस हमारे साथ है 

 और यह भी कि,,

कसम राम की खाते हैं 

हम  मंदिर वहीं बनाएंगे

तो फिर उन्हें सजा क्यों नहीं दी जा रही है? यहां पर अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही खड़ा हो गया है कि जब आरोपी खुद ही कह रहे हैं कि हमने मस्जिद गिराई है, हमने बाबरी मस्जिद तोड़ी थी तो फिर उन्हें कठोर सजा से रियायत क्यों दी जा रही है?

    यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। इससे सर्वोच्च न्यायालय की मान, प्रतिष्ठा और गरिमा को लगातार ठेस पहुंच रही है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला कानून के शासन को तोड़ने मरोड़ने वालों और आगे से अपराध करने वालों की हौसला अफजाई करेगा। अब कई अपराधी लोग संविधान और कानून के शासन को तोड़ने में आगे से कोई गुरेज नहीं करेंगे और अब वे बेखौफ होकर कानून की धज्जियां उड़ा देंगे। उनके अंदर से कानून और अदालतों का डर और खौफ निकल जाएगा।

      क्या मामलों में समय से फैसला न आने के कारण मुकदमों को बंद किया जा सकता है? दुनिया के किसी भी देश में ऐसा कोई फैसला देखने को नहीं मिलेगा। भारत में लाखों करोड़ों मुकदमें पिछले 30-40 सालों से लंबित हैं, तो क्या उन्हें इस आधार पर समाप्त कर देना चाहिए कि वे बहुत समय से लंबित है। यह तो मुकदमा खत्म करने का कोई आधार नहीं हो सकता।

     जर्मनी में हिटलरी क्रूरता और जुल्मों सितम करने वालों के खिलाफ, अपराध करने वालों के खिलाफ 50-60 साल तक मुकदमें चले थे और उन्हें कठोर से कठोर सजाएं दी गई थीं। बांग्लादेश में अपराध करने वालों के खिलाफ 30 40 साल तक मुकदमे चले थे और उन्हें कानून के हिसाब से कड़ी सजा दी गई थी।

     आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और उनके जैसे हजारों अपराधी अंधभक्त अब कानून के शासन, संविधान और न्यायपालिका की बात करने वालों पर बहुत जोर जोर से ठहाका मारकर हंस रहे होंगे, क्योंकि भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें ऐसा करने का सीधा-साधा मौका दे दिया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह अजीबोगरीब फैसला भारत में कानून के शासन और संवैधानिक प्रावधानों को बहुत हद तक प्रभावित और कमजोर करेगा।

    इस अजीब फैसले से भारत के सर्वोच्च न्यायालय की और पूरी न्यायपालिका की देश-विदेश में जग हंसाई होगी और यह फैसला अपराधियों को छोड़ने के लिए एक नई नजीर पैदा करेगा, जिससे भारत की न्याय व्यवस्था का मजाक ही उड़ेगा। सच में यह फैसला भारत की न्यायपालिका और न्याय व्यवस्था की सिद्धांतों के अनुसार नहीं है। हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह करेंगे कि वह इस फैसले का पुनर्निरीक्षण करें और बाबरी मस्जिद गिराने वाले अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दे, ताकि संविधान, कानून के शासन और भारत की न्याय व्यवस्था का मान, सम्मान और गरिमा बनी रहे, उसका खुल्लम-खुल्ला मजाक न बने।

Ramswaroop Mantri

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