जो लोग ये तर्क दे रहे हैं कि एक महीने का 300 सौ रुपए ही तो लग रहा है, ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय हर महीने किस्त में ही फीस जमा कराती है। एक रुपया भी कम होने या छुट्टे पैसे न होने पर कितनी बार छात्रों को यहाँ-वहाँ भटकना पड़ता है। हर साल B.Sc, MA, M.Sc करने वालों के लिए 1000-1500 के बदले एक मुश्त में 4500-5000 रुपए देना उनकी स्थिति के अनुपात में कितना तकलीफदेय होगा। दलीलें तो डंके की चोट पर आ रही हैं कि फीस वृद्धि वापस नहीं होगी, जैसे लगता है इनके यहाँ से बढ़ी फीस में डिग्री लेते ही सभी को ज्वाइनिंग लेटर पकड़ा दिया जाएगा। कम फीस होने की वजह से ही बहुत से लड़कों और लड़कियों का घर से बाहर निकलकर शहर में पढ़ाई के लिए आना संभव होता है। ज़्यादातर लड़के/ लड़कियाँ पैसे न होने या खर्च बचाने के लिए घर से चावल, आटा, दाल और तेल तक लाते हैं। वे बस इस समझौते पर आते हैं कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए उनकी फीस नहीं लगनी है या लगती भी है तो बहुत थोड़ी। ये बात छोटी सी है लेकिन कुछ स्वघोषित बड़े दिमाग वाले लोग जानबूझकर नजरंदाज़ करके उन्हें अनपढ़ बना कर फिर से उसी गुलामी और दासता में भेजना चाहते हैं। ये बात उनके लिए छोटी है, लेकिन जिस घर में सभी सदस्यों को काम करना पड़ता हो वहाँ से अगर कोई निकल पर पढ़ने आ जा रहा है ये उसके लिए बहुत बड़ी बात है। जहाँ का जीवन रोज़ खाने और काम करने तक ही सीमित है।
विश्वविद्यालय पॉलिसी की फीस वृद्धि के साथ सत्ता बहुत चालाकी कर रही है। यह मुद्दा अब केवल इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नहीं रह गया। दरअसल उन्हें पता है, एक साथ सभी विश्वविद्यालयों की फीस बढ़ा देंगे तब सब एक साथ सर पर चढ़ जाएंगे इसलिए हर जगह की फीस अलग-अलग समय में बढ़ाई जाएगी। ध्यान रहे अगर आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फीस बढ़ गई तो आने वाले दिनों में सभी विश्वविद्यालयों की फीस बढ़ाई जाएगी और ऐसे ही सब अपनी-अपनी बारी का इंतज़ार करते रहेंगे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय राजनीतिक लड़ाई का एक गढ़ है। यहाँ से हार हुई तो उत्तर भारत में जितनी भी यूनिवर्सिटीज़ हैं उन पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ-साथ देश भर के सभी संस्थानों में भी। इसलिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय को लेकर इतना घमसान मचा हुआ है। प्रशासन को पता है, यहाँ अगर फीस बढ़ गई तो बाकी जगहों पर इतनी मुश्किल नहीं आएगी, क्योंकि सबसे ज्यादा दिक्कत यहीं है। हॉस्टल की फीस 7000 हुआ करती थी, उसके बाद 15000 हुई, फिर 22000 अब 42000 की तैयारी है। इतना बड़ा अमाउंट छात्रों को बहुत भरी पड़ेगा यह बात प्रशासन को पता है, वे तो चाहते ही हैं कि छात्र ज़्यादा पैसा होने के कारण हॉस्टल लेना बंद कर दें, इस मंहगाई का फायदा शहर के मकान मालिक उठाएंगे लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा विश्वविद्यालय उठाएगा। प्रशासन चाहता है सब छोड़ दें। सिर्फ़ पैसे वाले ही विश्वविद्यालयों में पढ़ें। प्राइवेटाइजेशन के बाद उस जगह का क्या होगा आप सोचिए, क्योंकि इतनी फीस में तो कोई रह नहीं पाएगा। शिक्षा को पूरी तरह से प्राइवेटाइजेशन की ओर ले जाना ही मुख्य उद्देश्य है। सरकार अपने आकाओं का पेट हर तरह से भरना चाहती है ताकि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए फंड मिल सके और अनपढ़ लोगों के बीच प्रचार करके चुनाव जीतते रहें। देश में शिक्षा का बजट 10 प्रतिशत होना चाहिए, बचा कितना है आप सब जानते हैं। लेकिन कुछ साल में कोई भी प्रतिशत नहीं रह पाएगा। इस पर कोई बातचीत नहीं होती। गुलाम मीडिया को यह सब दिखाने के लिए समय ही नहीं है।
विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारी तो ऐसे हैं कि वो छात्रों पर कब क्या आरोप लगा देंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। अगर गलती से कोई छात्र पत्र लिख दे कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, कुछ आर्थिक समस्या है तो इसके जवाब में विश्वविद्यालय के अधिकारी कह सकते हैं कि जब पैसे नहीं हैं तो पढ़ाई करने की क्या जरूरत हैं। जब किसी के अंदर मानवता इस कदर खत्म हो सकती है तो उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है। विश्वविद्यालय के कई सारे ऐसे पदाअधिकारी हैं/थे जो सीधे छात्रों को धमकी देते हैं, तुमको गुंडा एक्ट में अंदर करा देंगे, तुम जानते नहीं हो हमको। ये नौटंकी करने के लिए हर समय कोई न कोई मौजूद ही रहता है। बढ़ी हुई फीस की सूची में मनमाने तरीके से पैसे जोड़े गए हैं जिन्हें नए प्रवेश में आने वाले छात्र जानते ही नहीं हैं क्योंकि कई सुविधाएं बंद हो चुकी हैं, और जो हैं भी वो सदियों से उसी तरह से घिसती आ रही हैं। पैसे हर साल लिए जाएंगे लेकिन सुधार और सुविधा के नाम पर इनसे बात करो तो कहते हैं ये हमारे अंडर में नहीं आता, ये उनके अंडर में है उनके पास जाओ तो वो भी यही ज्ञान दे देते हैं। अब भटकते रहो। सिर्फ़ पैसा, पैसे के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है, कितना चूस लें, विश्वविद्यालय न हो कर प्राइवेट हॉस्पिटल हो गया है।
कहीं भी कुछ घटाया या बढ़ाया जाता है तो थोड़ा- थोड़ा करके, अति किसी भी कार्य के लिए ठीक नहीं है, वह अपच ही हो जाता है। क्या यह नियम लागू करने वाले अधिकारियों को देश की स्थिति नहीं पता है। क्या वे लोग इन खबरों से अंजान है कि देश में कोविड के बाद कितने करोड़ लोगों ने नौकरियाँ खोई हैं। जैसे-तैसे तो आम लोगों का घर चल रहा है। युवाओं को हर साल मिलने वाली सरकारी नौकरियों के अनुपात में कितने लोगों को रोज़गार मिल पाया है? सरकार अपने वादों को किस हद तक पूरा कर पाई है! ये सारी बातें यह नियम लागू करने वाले प्रशासकों को क्यों नहीं दिखाई पड़ता। इस बात से पूरा देश वाक़िफ है कि कोविड महामारी के बाद लोगों का जन- जीवन बहुत मुश्किल हो चुका है, किसी तरह से तो उनका गुज़ारा हो रहा है। ऊपर से यह फ़रमान किस ओर इशारा करता है। देश के ऐसे तमाम बच्चे जो ग़रीब हैं, जो गाँवों, देहतों में निवास करते हैं उन्हें पूरी तरह से शिक्षा से वंचित करने की पूरी प्लानिंग चल रही है। सरकारें ऐसी आबादी को जुमलों के आधार पर मॉनिटर करती हैं, जिनके पास खुद का विवेक नहीं होता। इसीलिए उन्हें अनपढ़ बनाए रखना चाहती हैं, ताकि हिंदू- मुस्लिम के नाम पर, जातिवाद के नाम पर, क्षेत्रवाद के नाम पर लड़ाया जाता रहे और चुनावी राजनीति चलती रहें। एक बड़े समुदाय को अनपढ़ बना कर उसे गुलामी की ओर ढ़केलने में आसानी होगी है।
सबसे अहम बात विश्वविद्यालय में छात्रों के पठन- पाठन की सुविधा के नाम पर कमरे, कुर्सियाँ, लाइट, पंखे, कर्मचारी, कॉमन हॉल, किताबें, लाइब्रेरी, टॉयलेट, पानी, कैंटीन, ये सब फालतू माना जाता है। इससे कुछ नहीं होता, न ही इन सब से पढ़ाई का कोई वास्ता है। इसके लिए आप देते रहिए ज्ञापन, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। दशकों पहले साइंस फैकल्टी में एक कैंटीन चलती थी, अब उसका पता रता नहीं है। आर्ट फैकल्टी में भी एक चाय समोसे की दुकान चलती थी जो कोविड के बाद से कभी खुली ही नहीं। कानून गिनाने के लिए तमाम है, व्यवस्था के नाम पर ज़ीरो। बिना लड़े कुछ नहीं मिलने वाला। कुछ नहीं बोलने पर/ चुप्पी साधे रहने पर एक दिन आपकी भी बरी आयेगी और आप तब भी यही सोचते रहेंगे कि ये उन लोगों का काम है जो आए दिन नारे लगाते रहते हैं।
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