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भारत में जम्मूकश्मीर के विलय की असल वजह

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कश्मीर समस्या के पीछे का सच*भाग 5

*अजय असुर

शेख अब्दुल्ला ने हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और भारत-पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने के सवाल को किनारे लगाते हुए घोषणा की कि विलय का सवाल बाद में है। पहले स्वतंत्र कश्मीर और एक जिम्मेदार सरकार की स्थापना है। जिसके लिये 21 अक्टूबर 1947 को ही महाराजा हरि सिंह ने पंजाब उच्च न्यायालय के कार्यमुक्त न्यायाधीश बक्शी टेकचंद को कश्मीर का संविधान बनाने के लिए नियुक्त किया। पर कश्मीर के हालात दिन-प्रतिदिन बिगड़ रहे थे जिसमें पाकिस्तान सरकार द्वारा उकसाये गये पठान कबायली हमलावर श्रीनगर की ओर कूच कर चुके थे। 22 अक्टूबर 1947 को उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कबायलियों और अनेक पाकिस्तानियों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। पाकिस्तान कश्मीर को अपने में मिलाना चाहता था, अतः उसने सीमाओं पर सेना को इकट्ठा कर चार दिनों के भीतर ही हमलाकर आक्रमणकारी श्रीनगर से 25 मील दूर बारामूला तक आ पहुँचे। जिससे महाराजा हरिसिंह के सामने अत्यंत विकट स्थिति आ चुकी थी। इसके मद्देनजर शेख अब्दुल्ला ने अपने दो सहयोगियों को पाकिस्तानी सरकार से बातचीत करने के लिए भेजा परंतु ये पाकिस्तान के दोयम दर्जे के नेताओं से ही मिल सके। जब शेख अब्दुल्ला के ये प्रतिनिधि पाकिस्तानी नेताओं से वार्ता कर रहे थे उसी समय कबायली हमलावर श्रीनगर के पास पहुँच चुके थे और कश्मीर की धरती को अपने पैरों तले रौंद रहे थे। पाकिस्तानी कार्यवाहियों ने कश्मीरी नेतृत्व और महाराजा के पास अन्य कोई विकल्प नहीं छोड़ा था कि वे भारत से ऐसे नाजुक वक्त में मदद मांगे और शेख अब्दुल्ला स्वयं दिल्ली में नेहरू से बातचीत करने चले गये। इस विकल्पहीनता को खत्म किया जा सकता था यदि जनता की शक्ति के विकल्प पर भरोसा किया गया होता तो। शेख अब्दुल्ला और महाराजा हरि सिंह ने जनसंघर्षो पर भरोसा न करके दोनों देशों में से भारत के साथ में जाने का निर्णय किया। कश्मीर स्वतंत्र रहना चाहता था और भारत से मदद चाहता था पर नेहरू ने कश्मीर को मजबूर कर दिया कश्मीर को भारत में शामिल करने के लिये, क्योंकि भारत सरकार द्वारा बिना भारत में विलय के, मदद देने से इन्कार करने के कारण महाराजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला के पास अन्य कोई रास्ता नहीं बचा था (जो रास्ता बचा था उसे उन्होंने अपनाया नहीं क्योंकि हरी सिंह और शेख अब्दुल्ला दोनों ही भारत में विलय चाहते थे। महाराजा हरि सिंह ने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में न केवल दृढ़ता से भारत का पक्ष रखा था, अपितु स्पष्ट तौर पर यह भी कहा था कि जब भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बनेगा तो वे उसका हिस्सा बनेंगें। शेख अब्दुल्ला की स्वीकार्यता केवल कश्मीर घाटी तक ही सीमित होने के बावजूद पण्डित जवाहर लाल नेहरू उन्हें बिना किसी चुनावी प्रक्रिया के प्रधानमंत्री बनाने की हठधर्मिता कर प्रधानमंत्री क्यूँ बनाया? और शेख अब्दुल्ला को भारतीय संविधान को बनाने वाली संविधान सभा में क्यूँ भेजा?) और अन्ततः 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ जम्मू & कश्मीर के अस्थायी विलय की घोषणा कर दी और “Instruments of Accession of Jammu & Kashmir to India” पर जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महामहाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए अस्थाई विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी और शेख अब्दुल्ला द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया गया। इस नये समझौते के तहत जम्मूकश्मीर ने भारत के साथ सिर्फ तीन विषयों: रक्षा, विदेशी मामले और संचार को भारत के हवाले कर दिया था। समझौते के बाद भारतीय सेना आक्रमणकारियों के विरूद्ध कार्यवाही के लिए पहुंची। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मूकश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया। 

विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते हुए महाराजा हरि सिंह ने प्रतिरक्षा, विदेशी मामलों एवं संचार के क्षेत्रों में केन्द्रीय सत्ता को स्वीकार किया था। भारत सरकार ने विलय को स्वीकार हुए यह सूचना जारी की कि एक बार जब कश्मीर में कानून और व्यवस्था पहले जैसे बहाल हो जायेगी, तब कश्मीर के जनता से जनमत संग्रह करा ली जायेगी। तब और सिर्फ तभी विलय को निर्णयात्मक माना जायेगा। लार्ड माउंटबेटन ने 23 अक्टूबर 1947 के पत्र में महाराजा को राज्य के भारतीय संघ में शामिल होने की अपनी सरकार की ओर से स्वीकृति देते हुए लिखा “इस नीति के अनुसार कि जहाँ किसी भी राज्य के विलय पर विवाद हो वहाँ पर इसका निर्णय उस राज्य की जनता के मन के मुताबिक होना चाहिए, “मेरी सरकार” (लार्ड माउंटबेटन के इस शब्द पर ध्यान दीजियेगा कि ये अभी भी अंग्रेजों की ही सरकार है क्योंकि अंग्रेज भारत से भगाये नहीं गये थे, वह अपनी मर्जी से छोड़ कर गये थे और जाने से पहले सत्ता अपने चहेतो यानी नेहरू-सरदार पटेल को सौंप कर गये थे। यहाँ यह भी ध्यान दीजियेगा कि भारत का पहला आम चुनाव 1952 में होता है और जनता पहली बार सरकार चुनती है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद होता है तो जो अंग्रेजों, सामंतों, नवाबों द्वारा 1946 में अन्तरिम सरकार बनती है उसी को मान्यता अंग्रेज दे देते हैं।) की यह इच्छा है कि जैसे ही कश्मीर में कानून व्यवस्था बहाल हो और वहाँ से हमलावरों को खदेड़ दिया जाये, इस राज्य की समस्या का निर्णय जनता की राय से किया जाय।”

ऐसे में इस पूरे विवाद का निपटारा तभी हो सकता था जब इस रियासत की जनता अपने भाग्य का निर्धारण करती 1 नवंबर 1947 को लार्ड माउंटबेटन के साथ इस पूरे मामले में लाहौर में बातचीत हुई। माउंटबेटन द्वारा कश्मीर में जनमत संग्रह का प्रस्ताव रखा गया परंतु पाकिस्तानी नेताओं को इस बात का विश्वास नहीं था कि जनमत संग्रह जीत जायेंगे। इसीलिए जिन्ना ने जनमत संग्रह की कार्यवाही को निरर्थक, बेकार और किसी काम का नहीं बताया। इधर भारत में नेहरू और सरदार पटेल ने भी जनमत संग्रह की कार्यवाही को निरर्थक, बेकार और किसी काम का नहीं बताया। भारत और पाकिस्तान दोनों ही के शासक स्वतंत्र कश्मीर को स्वीकार नहीं करना चाहते थे और दोनों ही भारत-पाकिस्तान के शासक सेना के दम और बंदूक के नोंक पर कश्मीर पर शासन करना चाहते थे। साथ में भारत के शासक दाँव-पेचों खेलकर “कश्मीरी भावना” का इस्तेमाल कर इस पूरे विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गया ताकि कश्मीर के लोगों को भावनात्क लगाव लगे भारत के प्रति।

*शेष अगले भाग में…*

*अजय असुर

Ramswaroop Mantri

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