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पापुलर फ्रण्ट आफ इंडिया पर पाबंदी

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हिसाम सिद्दीकी

भारत सरकार ने पापुलर फ्रण्ट आफ इंडिया यानी पीएफआई और उसकी आठ मुआविन तंजीमों (सहयोगी संगठनों) पर पाबंदी लगा दी है यह पाबंदी अनलाफुल एक्टिविटीज प्रीवेंशन एक्ट (यूएपीए) के तहत अगले पांच सालों के लिए लगाई गई है। पाबंदी लगाए जाने की जो वजूहात होम मिनिस्ट्री ने बताई है उनमें से अगर एक-चैथाई बातें भी सही हैं तो पाबंदी लगाए जाने का फैसला एक सही और अच्छा कदम है। देश का कोई मुसलमान यह नहीं चाहता कि संविधान पर चलने वाले भारत जैसे जम्हूरी मुल्क में कोई भी शख्स या तंजीम यह कहे कि वह भारत को इस्लामी देश बनाएंगे या मुल्क में मुसलमानों की हुकूमत कायम करेंगे ऐसा कहने और ऐसी कोशिशें करने वाले मुसलमानों के हमदर्द और दोस्त नहीं हो सकते। पीएफआई पर पाबंदी लगाए जाने की कार्रवाई की कुछ लोगों ने मुखालिफत भी की है। जम्हूरी मुल्क है किसी भी सरकारी फैसले की मुखालिफत या हिमायत करने का अख्तियार सभी को है। राष्ट्रीय जनता दल के सदर और बिहार के साबिक वजीर-ए-आला लालू प्रसाद यादव ने तो यहां तक कहा कि अगर पीएफआई पर पाबंदी लगाई गई है तो आरएसएस पर भी पाबंदी लगनी चाहिए। लालू का मतालबा अब मुल्क में काबिले कुबूल नहीं हो सकता। अब आरएसएस पर पाबंदी लगना नामुमकिन है, लेकिन आरएसएस की कई बच्चा तंजीमें जिस किस्म की सरगर्मियों में मुलव्विस रहती है उनको कण्ट्रोल करना भी बहुत जरूरी है। भारत सरकार ने पीएफआई पर पाबंदी लगाए जाने की जो वजूहात बताई हैं उनमें से आधी से ज्यादा वजहें उन तंजीमों पर भी पूरी तरह लागू होती है जो सैकड़ों तंजीमें गुजिश्ता आठ सालों में हिन्दुत्व और धर्म की हिफाजत के नाम पर बनी है और उन सभी का ताल्लुक आरएसएस से ही है।

पीएफआई समेत मुल्क में इस वक्त तकरीबन चालीस तंजीमों (संगठनों) पर पाबंदी लगी है। इनमें पंजाब, नार्थ-ईस्ट और तमिल तंजीमें तो हैं लेकिन हिन्दुत्व के नाम पर बनी एक भी तंजीम नहीं है हिन्दुत्व और हिन्दू मजहब की हिफाजत के नाम पर मुल्क में डेढ सौ से ज्यादा तंजीमें काम कर रही हैं मुसलमानों की एक भी नहीं है और अगर कोई तंजीम बनती है तो उसपर दहशतगर्दी का इल्जाम लग जाता है। मोदी से पहले जब मरकज में पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो उस वक्त के होम मिनिस्टर लाल कृष्ण आडवानी ने स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) पर 2002 में पाबंदी लगवा दी थी अब मोदी सरकार ने पीएफआई पर पाबंदी लगाई है। हमने इस मजमून के शुरू में ही कहा कि पीएफआई पर पाबंदी की जो तकरीबन दस वजूहात होम मिनिस्ट्री ने बताई है अगर उनमें दो-चार भी सही हैं तो पाबंदी की कार्रवाई बिल्कुल ठीक है। किसी की समझ में यह नहीं आता कि बीजेपी के जरिए मुल्क में आरएसएस की सरकार है। राष्ट्रपति से चपरासी तक के ओहदों पर हिन्दू समाज के लोग ही बैठे हैं लाखों की तादाद में पुलिस है फिर हिन्दू रक्षा और धर्म रक्षा के नाम पर समाज में दहशत फैलाने वाली सैकड़ों तंजीमों की क्या जरूरत है।

आर्डर में कहा गया है कि पीएफआई और उसकी मुआविन (सहयोगी) तंजीमें एक तबके मुसलमानों में कट्टरता फैला रही है। यह तंजीमें समाज में दहशत पैदा करने की कोशिश कर रही थी तो क्या हिन्दुत्व और धर्म की रक्षा के नाम पर बनी तंजीमें यह दोनों काम नहीं कर रही हैं। एक फिल्म की वजह से दीपिका पादुकोण का सर तन से जुदा करने का करणी सेना का एलान क्या दहशत फैलाना नहीं था। रामनवमी के जुलूसों में तलवारें लहराने और असलहों की नुमाइश क्या दहशत फैलाने की कार्रवाई नहीं है? रही बात कट्टरता फैलाने की तो हिन्दुत्व के फर्जी ठेकेदारों ने समाज में इतनी कट्टरता फैला दी है कि अब अगर सड़क के किनारे किसी मैदान में या किसी खाली जगह पर कोई मुसलमान पांच मिनट में नमाज पढ ले तो उसपर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तो इस तरह नमाज अदा करने वालों पर मुकदमा तक दर्ज करके नमाजियों को गिरफ्तार तक कर लिया जाता है। इस कट्टरपन के खिलाफ भी तो कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि हिन्दुत्व के ठेकेदारों के जरिए फैलाई जा रही कट्टरता से भारतीय जनता पार्टी को सियासी फायदा है ऐसे में सिर्फ पीएफआई की कट्टरता के खिलाफ कार्रवाई और हिन्दुत्ववादी तंजीमों को कट्टरता फैलाने की छूट देना अगर नाइंसाफी नहीं तो और क्या है?

 अब बात गैरकानूनी या नाजायज फंडिंग की एजेंसियों का कहना है कि पीएफआई को देश और विदेशों से जो करोड़ों की फंडिंग हुई वह टेरर फंडिंग के जुमरे (श्रेणी) में आती है। हमने पहले ही कहा कि अगर इस किस्म की फंडिंग हुई तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। बैंक खाते सीज किए जाने चाहिए और अगर नकदी हो तो उसे भी जब्त किया जाना चाहिए। अगर ईमानदारी और मुंसिफाना तरीके से सरकार यह कार्रवाई करे तो फिर उन तमाम तंजीमों की भी फंडिंग की गहराई से जांच होनी चाहिए जो तंजीमें हिन्दुत्व और धर्म की हिफाजत के नाम पर बनती ही जा रही हैं। कहीं कोई चार-छः लोग इकट्ठा होकर हिन्दू रक्षा दल जैसी तंजीमें बनाते हैं, लेटर पैड और विजिटिंग कार्ड छपवाते हैं गले में भगवा गमछा डालकर हिन्दुओं की ठेकेदारी करने निकल जाते हैं। यह लोग तीस-चालीस लाख तक की लक्जरी गाड़ियों में घूमते हैं कीमती कपड़े और महंगे जूते पहनते हैं क्या इन लोगों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर उनकी आमदनी का जरिया क्या है। उनकी फंडिंग कौन करता है और उन्हें किन हिन्दुओं ने अपना ठेकेदार या नुमाइंदा बनाया है। उनसे कभी नहीं पूछा जाता क्योकि वह आरएसएस के नजदीकी होते हैं।

पीएफआई पर पाबंदी लगाए जाने के लिए दो-तीन सबूत ही काफी थे। लेकिन मामले को ज्यादा संगीन बनाने के लिए एजेंसियों ने कुछ ऐसी बातें भी कह दीं जो सुनने से ही मजहकाखेज (हास्यास्पद) लगती हैं मसलन कहा गया कि पीएफआई का ताल्लुक आईएसआईएस से है जो आईएसआईएस सीरिया और इराक में ही बची उससे मुताल्लिक कोई तंजीम भारत में क्या कर लेगी? पीएफआई पर छापेमारी के दौरान कहा गया कि पटना की पब्लिक मीटिंग के वक्त वजीर-ए-आजम मोदी भी इसके निशाने पर थे यह बहुत बड़ा मजाक लगता है भारत का वजीर-ए-आजम अमरीकी सदर के बराबर की सिक्योरिटी में रहते हैं देश विदेश की किसी भी तंजीम या गरोह की इतनी औकात नहीं है कि वह वजीर-ए-आजम की जानिब बुरी नजर भी उठा सके उनको निशाना बनाना तो किसी भी कीमत पर मुमकिन ही नहीं है। एक बात यह कही गई कि पीएफआई भारत की जम्हूरियत (लोकतन्त्र) को कमजोर करने की साजिश कर रही थी। यह बात भी गलत है क्योकि भारतीय जम्हूरियत को कमजोर करने बल्कि खत्म करने का काम तो भारतीय जनता पार्टी खुद कर रही है। पार्टी सदर जेपी नड्डा पटना में तकरीर कर चुके हैं कि 2024 तक वह इलाकाई पार्टियां खत्म कर देंगे। खुद नरेन्द्र मोदी कह चुके हैं कि उन्हें कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है। कई सालों से मोदी की बीजेपी तोड़फोड़ और खरीद-फरोख्त के जरिए हर उस प्रदेश की चुनी हुई सरकार को गिरवा कर अपनी सरकार बनाने का काम कर रही है जिस किसी भी प्रदेश के अवाम अपने वोट के जरिए कांग्रेस या दूसरी किसी पार्टी को चुनते हैं कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, गोवा और अब महाराष्ट्र इसकी जीती जागती मिसालें हैं। जब एक बरसरे एक्तेदार (सत्ताधारी) पार्टी ही मुल्क में जम्हूरियत कमजोर ओर खत्म करने में लगी हो तो इस काम के लिए पीएफआई जैसी तंजीमों की क्या जरूरत है?

लेखक लखनऊ के प्रसिद्ध उर्दू अखबार जदीद मरकज के संपादक हैं

Ramswaroop Mantri

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