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 कैसे मुलायम ने ‘मंडल-कमंडल’ के रास्ते खड़ा कर लिया MY समीकरण

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अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव समाप्त हुए हैं। बीजेपी दोबारा सत्ता में लौटी है और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने 47 सीटों से 111 सीटों तक छलांग तो लगाई लेकिन वह विपक्ष का ही सबसे बड़ा दल बन पाई। सपा के इस प्रदर्शन में कहीं न कहीं मुस्लिम और यादव वोट बैंक (MY) समीकरण का अहम योगदान माना जाता है। हालांकि अखिलेश ने कई अन्य क्षत्रपों से गठजोड़ जरूर किया लेकिन उनका फायदा सपा को कुछ खास नहीं हुआ। दिलचस्प बात है कि करीब 3 दशक पहले मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में इस एमवाई समीकरण के बीज बोए थे, जो आज दरख्त बनकर अखिलेश यादव को भी राजनीति ठंडी छांव दे रहे हैं। मुलायम ने कैसे ये समीकरण पैदा किया? इससे समझने के लिए आपको 80 के दशक में ले चलते हैं।

1989 में दसवीं विधानसभा के लिए चुनाव हुए। इसमें चार दलों जनता पार्टी, जनमोर्चा, लोकदल अ और लोकदल ब ने मिलकर जनता दल का गठन किया था। इस चुनाव में जनता दल को 208 सीटों पर जीत मिली थी। उस समय यूपी विधानसभा में 425 सीटें हुआ करती थीं। सरकार बनाने के लिए जनता दल को अभी भी 14 विधायकों की जरूरत थी। उस समय केंद्र में भी जनता दल की ही सरकार थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे। जीत के साथ ही जनता दल ने घोषणा कर दी थी कि अजित सिंह मुख्यमंत्री होंगे और मुलायम सिंह यादव डिप्टी सीएम बनेंगे। ताजपोशी की तैयारी चल रही थी कि अचानक मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद के लिए दावा ठाेक दिया। अब मामला फंस गया। पीएम वीपी सिंह ने घोषणा की कि मुख्यमंत्री पद का फैसला लोकतांत्रिक तरीके से विधायकों के गुप्त मतदान के माध्यम से किया जाएगा।

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सभी को लग रहा था कि अजित सिंह बाजी मार ले जाएंगे। उधर इस गुप्त मतदान के लिए दिल्ली से मधु दंडवते, मुफ्ती मोहम्मद सईद और चिमन भाई पटेल केंद्रीय पर्यवेक्षक बनकर लखनऊ आए। यहां मुलायम को मनाने की कोशिशें भी हुईं लेकिन मुलायम टस से मस न हुए। आखिरकार मुलायम ने सभी को चौंकाते हुए अजित सिंह खेमे के 11 विधायकों को तोड़ लिए और मुख्मयंत्री पद की दावेदारी जीत ली। अजित सिंह सिर्फ 5 वोटों से मुलायम सिंह यादव से पिछड़ गए। यहीं से वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव के बीच तकरार शुरू हो गई।

इसके बाद 1990 में दो प्रमुख घटनाक्रम हुए। वीपी सिंह सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया। इस घोषणा के बाद देश में आरक्षण का विरोध शुरू हो गया। यूपी में मुख्यमंत्री के तौर पर मुलायम सिंह यादव ने इसका खुला समर्थन किया। और आरक्षण विरोधी आंदोलन को सख्ती से कंट्रोल करना शुरू कर दिया। मुलायम एक तरफ यूपी में अपर कास्ट से दूर हो रहे थे, वहीं पिछड़ों खासकर यादवों में उनकी पैठ तेजी से बढ़ रही थी। उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की कुल आबादी की बात करें तो ये 45 फीसदी से ज्यादा मानी जाती है। इसमें भी यादव मतदाता सबसे ज्यादा 9 फीसदी माने जाते हैं।

एक तरफ आरक्षण का मामला चल रहा था, वहीं दूसरी तरफ यूपी में राम मंदिर आंदोलन भी जोर पकड़ चुका था। सितंबर, 1990 में लालकृष्ण आडवाणी रथयात्रा लेकर निकल चुके थे। राम मंदिर आंदोलन को लेकर मुलायम सिंह यादव का स्टैंड साफ था वह भाजपा के विरोध सेक्युलरिज्म की वकालत में खड़े थे। सियासी जानकारों की राय में रणनीति साफ थी, एक तरफ भाजपा राम मंदिर आंदोलन के रास्ते हिंदुत्व को जोड़ने का प्रयास कर रही थी तो दूसरी तरफ मुलायम उसका खुला विरोध कर बाबरी पक्ष में आ गए थे, जो कहीं न कहीं यूपी में करीब 19 फीसदी मुस्लिम वोट बैंक के लिए भी भावनात्मक मुद्दा था। मुलायम ने किसी भी तरह के आयोजन पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी। यही नहीं आडवाणी का यूपी में रथ प्रवेश करते ही देवरिया में उन्हें गिरफ्तार करने की पूरी तैयारी थी। लेकिन वीपी सिंह ने लालू यादव को संदेश भेजकर 23 अक्टूबर को आडवाणी की रथयात्रा रुकवा दी और आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया।

वीपी सिंह ने इस कदम से मुलायम सिंह यादव के धर्म निरपेक्षता के चैंपियन बनने की चाहत की हवा निकाल दी। उस समय तक अकेले मुलायम ही थे, जो बीजेपी के खिलाफ खुले तौर पर खड़े थे। अब लालू भी आ गए। लेकिन मुलायम ने हार नहीं मानी और अयोध्या की सीमाओं को सील करवा दिया। सभी डीएम को निर्देश दिया गया कि अपने-अपने जिलों से निकलने वाले कारसेवकों को रोकें। मध्य प्रदेश और राजस्थान जहां उस समय भाजपा की सरकारें थीं, वहां यूपी बॉर्डर पर सुरक्षा और कड़ी कर दी गई। इसके बाद 30 अक्टूबर को अयोध्या में रक्त रंजित गोलीकांड हुआ, जिसने मुलायम सिंह यादव को रामभक्तों का दुश्मन बना दिया और ‘मुल्ला मुलायम’ के नारे लगने लगे।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखते हैं कि अयोध्या के गोलीकांड को मैंने अपने आंखों से देखा। अयोध्या की सड़कें कारसेवकों के खून से लाल हो गई थीं। मंदिरों में घंटा-घड़ियाल बंद हो गए। मंदिरों में शाम का भोग नहीं लगा। फायरिंग के बाद का दृश्य हिला देने वाला था। अयोध्या में चारों तरफ शोक और उत्तेजना थी। फैजाबाद के आम नागरिक सड़कों पर थे। अगली सुबह सरकारी अफसरों और सैन्य अधिकारियों की पत्नियां कश्मिनर आवास को घेरे खड़ी थीं। वे निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाए जाने को लेकर कमिश्नर से तीखे सवाल पूछ रही थीं। पूरी अयोध्या बगावत पर उतर आई थी। फैजाबाद और लखनऊ के बीच का रास्ता बंद हो चुका था। कमिश्नर मधुकर गुप्ता अपना आवास छोड़कर भाग चुके थे।

उधर अयोध्या में इस गोलीकांड के फौरन बाद ही दिल्ली में बड़ा सियासी घटनाक्रम हुआ। एक तरफ आडवाणी की गिरफ्तारी और अयोध्या मसले पर बीजेपी ने जनता दल सरकार से समर्थन वापस ले लिया और दूसरी तरफ वीपी सिंह के विरोधी चंद्रशेखर ने जनता दल ही तोड़कर अलग समाजवादी जनता पार्टी बना ली। यहां मुलायम सिंह यादव ने वीपी सिंह से हिसाब बराबर करते हुए चंद्रशेखर का साथ दिया और उनके पास खड़े हो गए। इसके बाद चंद्रशेखर को केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने और यूपी में मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने रहे।

इसके बाद 1991 के चुनाव में भाजपा को राम लहर का लाभ मिला और उसने बहुमत सरकार बनाई। लेकिन साल भर बाद ही 1992 में बाबरी विध्वंस हुआ और कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया। बीजेपी ने इस उम्मीद में सत्ता छोड़ी कि राम लहर उसे वापस सत्ता दिला देगी। लेकिन अब तक मंडल कमीशन अपना असर दिखाने लगा था। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी दलितों की बड़ी पार्टी बनकर उभर रही थी, वहीं मुलायम सिंह यादव अब अपनी समाजवादी पार्टी के मुखिया थे, जिसके लिए यादव के साथ मुस्लिम वोट बैंक बैंक बड़ा आधार बन रहा था। इसी मुस्लिम यादव गठजोड़ को आगे एमवाई समीकरण कहा गया, जो आज तक समाजवादी पार्टी की रीढ़ माना जाता है।

Ramswaroop Mantri

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