अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

सेवायोजक श्रम कानूनों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता हैं

Share

,,मुनेश त्यागी 

       भारत में पूंजीवादी व्यवस्था आने के बाद लाखों करोड़ों की संख्या में मजदूरों ने कारखानों और उद्योग धंधों में काम करना शुरू किया। कई कई साल काम करने के बाद भी मजदूरों को सेवायोजकों और कारखानेदारों द्वारा उन्हें कोई कानूनी सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। उनसे मजदूरों से 12-12 घंटे और 18-18 घंटे काम लिया जाता था। उन्हें नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची, न्यूनतम वेतन नहीं दिया जाता था।

     उनकी कोई यूनियन नहीं थी। उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को उठाकर मालिकों के सामने रखने वाला कोई नहीं था, क्योंकि जो कोई भी मजदूर अपनी मांगों को लेकर मालिक के सामने जाता था, उसको नौकरी से वंचित कर दिया जाता था और अपने अधिकारों की मांग करने वाले मजदूरों पर तरह-तरह के शोषण और बंदिशें लगाई जाती थीं और उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था। इसी डर की वजह से बहुत सारे मजदूर अपनी समस्याओं को मालिकान के सामने नहीं रखते थे।

       आजादी के आंदोलन में भी भगत सिंह और उनके साथियों ने मजदूरों के अधिकारों की और श्रम कानूनों की वकालत की और मालिकान द्वारा हो रहे मजदूरों के स्थाई शोषण का विरोध किया। यह बात धीरे-धीरे बलवती होती चली गई और कांग्रेस ने भी इस ओर ध्यान दिया। आजादी मिलने से पहले भारत के मजदूरों को लगभग कोई श्रम कानून मोहिया नहीं कराया गया था। उनके लिए श्रम कानून नहीं बनाए गए थे। मगर मालिकन के मजदूर विरोधी लगातार शोषण होने के कारण आजाद भारत में कई सारे मजदूर कानून, मजदूरों की हिफाजत के लिए बनाए गए जैसे औद्योगिक विवाद अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, क्षतिपूर्ति अधिनियम, दुकान अधिनियम, यूनियन बनाने का अधिकार, प्रोविडेंट फंड का अधिकार, ईएसआई का अधिकार और उसके बाद बोनस मिलने का अधिकार, ग्रेच्युटी का अधिकार, डबल ओवरटाइम का अधिकार इत्यादि कुल मिलाकर लगभग 44 श्रम कानून बनाए गए।

      धीरे-धीरे मजदूरों ने अपनी मांग पत्र मालिकान के सामने रखें और उन्होंने यूनियन बनाकर अपने हक अधिकारों की रक्षा करने के लिए संघर्षरत रहे। आजादी के 30 साल बाद तक मजदूरों को कुछ कानूनी अधिकार मिले, मगर कुल मिलाकर भारत का पूंजीपति वर्ग, कारखानेदार, उद्योगपति और दुकानदार अधिकांश श्रम कानूनों को मानने के लिए और लागू करने के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने ऐसा ही किया।

      अब से 40 वर्ष पहले भी इन तमाम श्रम कानूनों के बावजूद, मजदूरों को नियुक्ति पत्र नहीं मिलता था, कैटेगरी स्लिप नहीं मिलती थी, हाजिरी रजिस्टर पर उनके दस्तखत नहीं कराए जाते थे, उन्हें कोई आईडेंटिटी कार्ड नहीं मिलता था, उन्हें वेतन पर्चियां भी नहीं दी जाती थी। अधिकांश कारखानों में यूनियनें नहीं थीं और अगर मजदूरों ने यूनियन बना भी ली तो, सबसे पहले यूनियन बनाने वाले मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया जाता था। कई बार तो सेवायोजकों द्वारा इन ट्रेड यूनियन नेताओं को जेल में बंद करा दिया जाता था। इस प्रकार नौकरी से निकलने के डर से मजदूरों ने यूनियन बनाना लगभग बंद कर दिया।

     इसी प्रकार सेवायोजकों ने बहुत सारे मजदूरों को ठेके पर रखा, उनकी नौकरी को स्थाई नहीं की, वे मजदूरों को 10-10 20-20 सालों तक अस्थाई कर्मचारी के रूप में रखते रहे। आज हालत यह है कि भारत के 85% मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता है। अधिकांश मजदूरों को नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता है। अधिकांश मजदूरों को वेतन पर्चीयां नहीं दी जाती हैं। आज भी उन्हें आईडेंटिटी कार्ड नहीं दिए जाते हैं। 10-10, 15-15 साल कारखाने में काम करने के बाद भी मजदूरों के पास ऐसा कोई सबूत नहीं होता कि जिसमें वे जरूरत पड़ने पर दिखा सकें कि वह फला कारखाने के मजदूर हैं।

    भारत के असंगठित क्षेत्र के 95% मजदूर बिल्कुल शोषण और अन्याय की अवस्था में काम कर रहे हैं। वे अपने हक अधिकार की मांग नहीं कर सकते। हालात इतने गंभीर है कि जो मजदूर अपने कानूनी हक मांगने की जुर्रत करता है, उसे एकदम नौकरी से निकाल दिया जाता है। इस प्रकार डर के मारे बहुत सारे मजदूर लगभग सारे मजदूर अपने कानूनी अधिकारों की मांग ही नहीं करते और वे 20-20, 30-30 साल तक कारखानों में बिना किसी श्रम कानून के अधिकार के काम करने को मजबूर होते हैं।

       यह भी एक अद्भुत और आश्चर्यजनक बात है कि बहुत सारे श्रम कानूनों में, मालिकान द्वारा श्रम कानूनों का उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान है। बोनस न देने पर, ग्रेच्युटी न देने पर पी एफ न काटने पर, उन्हें सजा का प्रावधान किया गया है, मगर सरकारी अमला इतना भ्रष्ट और इतना मजदूर विरोधी है और इतना मालिकानपरस्त हो गया है कि वह मजदूरों की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देता। पूरा का पूरा श्रम कार्यालय और जिला प्रशासन, जैसे पूंजीपतियों की, कारखानेदारों की जेब में बैठ गया है। वे उनके खिलाफ श्रम कानून लागू न करने की वजह से कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करते।

     अनेकों अवसर पर देखा गया है कि जब  मजदूरों की ये सारी समस्याएं श्रम न्यायालय के जज के सामने रखी जाती हैं तो उनमें से अधिकांश इन तथ्यों को, इन बातों को, स्वीकार करने को तैयार नहीं होते कि कैसे किसी मजदूर को नियुक्ति पत्र नहीं दिए जाते हैं, वेतन पर्चियां नहीं दी जाती हैं और हाजिरी रजिस्टर पर उनके दस्तखत नहीं कराए जाते हैं। जब बहुत सारे केसों में वे खुद ही अपनी आंखों से देख लेते हैं और दिमाग से परख लेते हैं तभी वे विश्वास करते हैं। कि हां वाकई में यहां पर तो मजदूरों के साथ भयंकर शोषण और अन्याय हो रहा है और इसके लिए सरकारी और निजी कारखानेदार उद्योगपति और दुकानदार, सब के सब जिम्मेदार हैं।

     आज हालात इतने खराब हैं कि यह अन्याय और शोषण सिर्फ प्राइवेट सेक्टर में ही नहीं है बल्कि यह सरकारी सेक्टर में भी, अनेक सरकारी विभागों,,,,, शिक्षा,न्यायालय, नगर निगम, तहसील,पी डब्लू डी, बिजली में भी बदस्तूर जारी है। वहां पर भी कर्मचारियों को अस्थाई रूप में नौकरी पर रखा जाता है, उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिए जाते, उन्हें वेतन पर्चियां नहीं दी जातीं, उन्हें न्यूनतम वेतन नहीं दिया जाता और कई विभागों में तो यह काम ठेकेदारी प्रथा के आधार पर कराया जाता है। जहां पर उन्हें यह भी पता होता है कि ठेकेदार अपने मजदूरों को न्यूनतम वेतन और दूसरी श्रम सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा रहा है। यह जानकारी होने के बाद भी उन मजदूरों को उनके कानूनी हक नहीं दिलवाई जाते और गैर कानूनी काम करने वाले ठेकेदार के खिलाफ भी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती, क्योंकि यहां अधिकांश सरकारी अधिकारी इन ठेकेदारों से मिले हुए होते हैं, उन से सांठगांठ किये होते हैं।

      यही पर सबसे बड़ा सवाली यह पैदा होता है कि आखिर इतनी सारे कानूनों के बावजूद हर जिले में श्रम कार्यालय और जिला प्रशासन होने के बावजूद, कमिश्नर, विधायक और सांसद होने के बावजूद भी इन श्रम कानून को लागू क्यों नहीं कराया जाता है? और मजदूरों को उनके कानूनी अधिकार उन्हें क्यों नहीं मोहिया कराये जाते है?

इसका सबसे बड़ा कारण है कि पूरी की पूरी पूंजीवादी व्यवस्था मजदूरों के शोषण और अन्याय पर आधारित होती है। यह एक श्रमिक विरोधी और और मानव विरोधी व्यवस्था है। पूंजीवादी व्यवस्था, मानव सभ्यता और संस्कृति के नाम पर एक कलंक है, एक सामाजिक और राजनीतिक कोढ है, यह जंगली है, बर्बर है, असभ्य है और कतई भी कानून को मानने वाली व्यवस्था नहीं है। इस मजदूर विरोधी लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था का भारत के संविधान, उसके सिद्धांतों, उसके प्रावधानों, उसके द्वारा दी गई आजादियों में और कानून के शासन में कोई विश्वास नहीं है।

     यह शोषक और अन्यायी व्यवस्था, मजदूरों के कमाए हुए और मेहनत का पैसा उनको नहीं देती। उनकी मेहनत अतिरिक्त मूल्य को हड़प जाती है और पूरा का पूरा शासन प्रशासन पूंजीपतियों के इशारे पर खेलता है और मजदूर विरोधी इन पूंजीपतियों के खिलाफ समय से कोई कार्यवाही नहीं करता। जिस कारण मजदूरों का शोषण लगातार बढ़ता रहता है और उनके साथ लगातार अन्याय होता रहता है। इसी शोषण, अन्याय और अतिरिक्त मूल्य को हड़पने के कारण पूंजीपति लगातार आर्थिक रूप से फूलता फलता चला जाता है और मजदूर वर्ग अपना पेट पालने के लिए मजबूर होकर ग़रीब होता चला जाता है। इतिहास गवाह है कि पूंजीवादी लुटेरी व्यवस्था के रहते मजदूरों को उनके कानूनी हक और अधिकार नहीं  मिल सकते और उनका लगातार शोषण और अन्याय होता रहेगा।

      इस प्रकार आजादी के 75 वर्ष के बाद हम देख रहे हैं कि भारत में लगभग 44 श्रम कानून हैं। इनमें से अधिकांश को प्राइवेट या सरकारी विभागों में लागू नहीं किया जाता। इनमें से अधिकांश कानूनों को मजदूरों को मोहिया नहीं कराया जाता और भारत का लगभग पूरा का पूरा सरकारी विभाग, पूंजीपति वर्ग, कारखानेदार उद्योगपति और दुकानदार सबसे ज्यादा श्रम कानूनों का उल्लंघन करते हैं और उन्हें किसी का कोई डर या खौफ भी नही रह गया है। अब तो इस मजदूर विरोधी लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था को पलट कर, इसका विनाश करके और इसके स्थान पर किसान मजदूरों और मेहनतकशों की हितैषी और दोस्त, समाजवादी व्यवस्था कायम करके ही किसानों मजदूरों और मेहनतकशों को सच्चा और इ न्याय मिल सकता है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें